हिंदी फीचर फिल्म : गंवार

शारा वैजयंती माला के साथ राजेंद्र कुमार की अंतिम फिल्म थी और वैसे भी वैजयंती माला ने इस फिल्म के बाद फिल्मों से संन्यास ले लिया था। सत्तर के दशक के शुरुआती साल तथा उससे पूर्व का दशक राजेंद्र कुमार का मानो अपना ही दशक था। इन दस सालों में उन्होंने जुबली स्टार का तमगा हासिल कर लिया था। उनकी फिल्में साठ के उत्तरार्द्ध से लेकर सत्तर के आरंभ में मनोरंजन की गारंटी होती थी। सिनेमा हॉल खचाखच, प्रोड्यूसर मालामाल। सब जुबली कुमार की कद-काठी और सुंदर मुखड़े की बदौलत था कि लड़कियां उनकी बला की दीवानी थीं। खुद हीरोइनें भी उनके साथ घर बसाने के लिए लालायित रहती थीं। पाठकों को तो पता ही होगा कि सायरा बानो भी जुबली कुमार से शादी करना चाहती थी कि उनकी मां नसीम बानो को तब के स्थापित एक्टर दिलीप कुमार को एप्रोच करना पड़ा ताकि वह उनकी बेटी के दिमाग से एक्टरों का भूत निकाल सके लेकिन दिलीप कुमार सायरा बानो को समझाते-समझाते स्वयं ही उनसे शादी करने का वादा कर बैठे। हालांकि सायरा बानो की उम्र दिलीप कुमार से आधी थी। हर दौर में रोमांटिक हीरो हुआ करते हैं। इनका अलग दर्शक वर्ग होता है। धीर-गंभीर भूमिकाएं अभिनीत करने वाले चेहरे भी अपना अलग दबदबा बनाए हुए थे। उनमें दिलीप कुमार एक थे। इसके प्रोड्यूसर नरेश कुमार ने स्वयं ही फिल्म निर्देशित की है। नरेश कुमार हल्की-फुल्की ग्राम्य माहौल पर फिल्में बनाते थे, सो उन्हें राजेंद्र कुमार सही लगते थे। हल्की-फुल्की फिल्मों की बजाय उनके हिट होने की पूरी गारंटी होती थी, उनका रोमांटिक फेस जब गीत गाता था तो हर महिला दर्शक को अपना ब्वॉय फ्रेंड लगता था। नरेश कुमार ने 'गंवार' के सुपरहिट होने के बाद जुबली कुमार के साथ गोरा और काला जैसी फिल्में बनायीं, जो कमर्शियली सुपरहिट रहीं। इनकी फिल्में आम होती थी लेकिन गाने बड़े हिट होते थे। शादियों में गाने वाले अधिकतर गाने राजेंद्र कुमार की फिल्मों से हुआ करते थे। 'बहारों फूल बरसाओ' तो बाराती बैंड बजाकर हर दुल्हन के लिए गाते हैं। फ्लैश बैक के पाठकों को चलते-चलते यह भी बता दूं कि इसी फिल्म के गीतों से साबित हुआ था कि संगीतकार नौशाद का शास्त्रीय संगीत के अलावा आधुनिक संगीत में खासा दखल है। अपनी शास्त्रीय बंदिशों से फिल्म को ऊंचाइयों पर ले जाने वाले नौशाद से हल्की-फुल्की फिल्में बनाने वाला प्रोड्यूसर भला संगीत क्योंकर बनाएगा? इसी तरह इसी फिल्म से बॉलीवुड को हरफनमौला संगीतकार भी मिला, नौशाद के रूप में। सोचिये, जिसने मुगले आज़म सरीखी फिल्मों के लिए धुनें बनाई हों, वह ‘महका-महका रूप तुम्हारा बहकी-बहकी चाल’ जैसे गीतों को सुर दे? अब बात फिल्म की हीरोइन की। भरतनाट्यम की इस कलाकार वैजयंती माला के साथ सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। लव ट्रायंगल पर चल संगम बन रही थी तो दिलफेंक राजकपूर को वैजयंती माला दिल दे बैठी। बात इतनी बढ़ गयी कि राजकपूर की पत्नी कृष्णा ने बच्चों समेत पति का घर छोड़ दिया और मुंबई चली गयी थीं—ऐसी बातें तत्कालीन अखबारों/पत्रिकाओं में भी खूब प्रकाशित हुई थीं। हालांकि, वैजयंती माला ने बाद में इसे फिल्मी गॉसिप बताया था जो राजकपूर ने संगम फिल्म हिट करने के लिए उड़ाई थी। ढेरों पुरस्कार जीतने वाली इसी नायिका ने नृत्य की सम्मानजनक तरीके से फिल्मों में एंट्री करायी थी। पद्मश्री वैजयंती माला 13 साल की उम्र में फिल्मों में आयी थी। म्यूजिकल ड्रामा जॉनर की यह फिल्म 1970 में रिलीज हुई थी। यह भी राजेंद्र कुमार की बनी फिल्मों की तरह सुपरहिट रही थी। फिल्म में राजेंद्र कुमार के दो चेहरे दिखाये हैं, एक शहरी बाबू गोय, जो विलायत में पढ़ता है और एक भदेस गरीबदास जो किसानों की लड़ाई लड़ता है। तरुण बोस एक रियासत के मालिक हैं। इस राजा साहब के साथ एक त्रासदी यह होती है कि युवावस्था में उनकी पत्नी का निधन हो जाता है। वह अपने छोटे बच्चे गोपालराय को विलायत पढ़ने के लिए भेज देते हैं और खुद दूसरी शादी कर लेते हैं। दूसरी दुल्हन राजा साहब से युवा होने के कारण घर और व्यवसाय का सारा प्रबंधन अपने हाथों में ले लेती है और अपने भाई विजय बहादुर (प्राण) को इसका कर्ताधर्ता बना देती है। विजय बहादुर अपनी मनमानियां करता है (वैसे प्राण और क्या कर सकता है)। उसके आतंक से गांववासी सताए हुए हैं। वह मनमाने लगान वसूलता है और उसकी बहन उसे शह देती है। उसकी इन क्रूर गतिविधियों को चुनौती देती है—पारो (वैजयंती माला), जो अपने संबंधी के घर में रहने के लिए आयी है। वह किसानों का प्रतिनिधिमंडल लेकर राजा साहिब के पास जाती है लेकिन राजा साहिब को असहाय देखकर किसान वापस मुड़ आते हैं। वे नयी मालकिन से वार्ता करने को तैयार नहीं क्योंकि उनके भाई विजय बहादुर से वे परेशान हैं। ऐसे में सीन में आता है गोपालराय। लेकिन मां-बेटे के जुल्मों के आगे वह भी बेबस है। वह किसानों की रक्षार्थ गरीब किसान का भेष बनाकर उन्हीं के साथ रहता है और उनका विश्वास जीतता है। इसी बीच गरीबदास नामक इस किसान की आंख गांव की लड़की पारो (वैजयंती माला) से लड़ जाती है। निर्देशक ने गरीब किसान की भाषा में दोनों से रोमांटिक गाने गवाए हैं—ये साॉन्ग सिचुएशन देखने वाली है। किसानों की हमदर्दी में उतरे गरीबदास के साथ विजय बहादुर क्या-क्या करता है, पाठक बाकी की कहानी पर्दे पर ही देखें तो ज्यादा आनंद आयेगा क्योंकि हल्के-फुल्के कथानक में ऐसा कुछ भी नहीं है सिर्फ यह रोमांटिक मूवी देखने वली है।

निर्माण टीम प्रोड्यूसर व निर्देशक : नरेश कुमार पटकथा : ध्रुव चटर्जी सिनेमैटोग्राफी : बाबूभाई उदेशी गीतकार : राजेंद्र कृष्ण संगीतकार : नौशाद सितारे : राजेंद्र कुमार, वैजयंती माला, प्राण आदि

गीत दुनिया हंसती हंसाती रहे : मोहम्मद रफी महका महका रूप तुम्हारी : मोहम्मद रफी हमसे तो अच्छी तेरी पायल गोरी : आशा भोसले, मोहम्मद रफी ऐ किसानो यह धरती तुम्हारी : महेंद्र कपूर तेरा चिकना रूप है ऐसा : आशा भोसले, मोहम्मद रफी पीकर शराब : मोहम्मद रफी

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