हिंदी फीचर फिल्म इत्तेफाक़

फ्लैशबैक

शारा वर्ष 1969 के हाथ से 9 महीने निकल चुके थे और राजेश खन्ना की इस दौरान न कोई हिट फिल्म ही रिलीज हुई और न कोई नयी फिल्म ही साइन की गयी। अजब डिप्रेसिंग दौर था। उनके पिता ने उन्हें बुलाकर अपने करिअर संबंधी फैसले पर दोबारा सोचने की ताकीद भी कर डाली। दरअसल, 1968 से राजेश खन्ना के पास कोई भी फिल्म नहीं थी। जब अगला वर्ष भी खत्म होने को आया तो पिता को चिंता हुई। क्योंकि इससे पहले की फिल्मों ने कोई खास बिजनेस नहीं किया। बेशक 1966 में रिलीज आखिरी खत जो उनकी पहली फिल्म थी बेस्ट फॉरेन लेंग्वेज अवॉर्ड के लिए नामांकित हो चुकी थी तो उसका कारण चेतन आनंद के बेहतरीन निर्देशन को माना गया। 1969 में रिलीज राव के निर्देशन में बनी ‘डोली’ फिल्म ने शुरू में तो अच्छा बिजनेस किया लेकिन बाद में धड़ाम से गिर गयी। इससे पूर्व 1967 में रिलीज जीपी सिप्पी की राज़ और इसी वर्ष रिलीज हुई नासिर हुसैन की ‘बहारों के सपने’, एसएस वासन की ‘औरत’ पिट चुकी थी। लेकिन इत्तेफाक़ ने राजेश खन्ना की बॉलीवुड में डूबती नैया को किनारे पर ला दिया, जिसे निर्देशित किया फिल्मों को हिट बनाने की गारंटी के लिए मशहूर निर्देशक यश चोपड़ा ने। बहुत ही कम लागत से बनी इस फिल्म को सिर्फ 28 दिनों में शूट किया गया। बीआर चोपड़ा के बैनर तले बनी यश चोपड़ा की यह अंतिम फिल्म थी, जिसमें कानून की तरह न कोई गीत था न किसी बड़े सितारे का आइटम डांस। इसके बाद राजेश खन्ना ने लगातार 17 सुपर-डुपर हिट दी। इत्तेफाक़ के तुरंत बाद ‘आराधना’ फिल्म आयी जो शक्ति सामंत की पेशकश थी। इस फिल्म से राजेश खन्ना सही मायने में युवाओं की पहली पसंद बन गये। वैसा ही हेयरकट, वैसी ही ड्रैस, वैसे ही चलने-फिरने का अंदाज़ सब पर राजेश खन्ना तारी हो गये। मज़ेदार बात यह है कि इस इत्तेफाक़ फिल्म से कमाई के रूप में उन्हें 2000 रुपये महीने की तनख्वाह, ऊपर से 500 रुपये का अलाउंस मिला लेकिन जो लोकप्रियता की सीढ़ी इस फिल्म से शुरू हुई, उसे राजेश खन्ना चढ़ते ही चले गये। आकाश जितनी ऊंची थी यह सीढ़ी, तभी तो वे सितारा बन गये। उसके बाद ‘दो रास्ते’ आयी और ब्लॉक बस्टर साबित हुई। दरअसल, 1970 और 1971 के साल राजेश खन्ना की सुपर हिट मूवीज के साल थे। अब बात इत्तेफाक़ के निर्माण की। हुआ यूं कि ‘आदमी और इंसान’ फिल्म के समय सायरा बानो इतनी बीमार हो गयीं कि उन्हें इलाज के लिए इंग्लैंड जाना पड़ा। अब बेकार बैठी फिल्म के निर्माण में जुटी यूनिट क्या करती? उन्हीं दिनों चोपड़ा भाई गुजराती नाटक ‘घुम्मस’ देख रहे थे जो फ्रेंच से अनूदित था। इसके मूल नाटक पर पहले ही हॉलीवुड ‘साइन पोस्ट टू मर्डर’ फिल्म बना चुका था। बस वहीं से आइडिया आया, इत्तेफाक़ फिल्म बना डाली, जिसके हीरो के तौर पर पहले शशि कपूर को संपर्क किया गया जो ‘अभिनेत्री’ फिल्म में मशगूल थे। यश चोपड़ा फटाफट फिल्म बनाना चाहते थे, ऐसे में राजेश खन्ना उन्हें बेहतर च्वॉइस लगे। फिल्म समय पर रिलीज़ हुई। ऐसा सस्पेंस, ऐसा थ्रिलर दर्शकों ने बॉलीवुड मूवीज़ में कभी नहीं देखा। दर्शक कुर्सी से चिपके रह गये। राजेश खन्ना ने अपने अभिनय से विषय वस्तु को लाजवाब कर दिया। इस फिल्म के लिए हीरोइन के रूप में नंदा चोपड़ा भाइयों की तीसरी पसंद थी लेकिन लगता है वह पहली पसंद ही होनी चाहिए थी क्योंकि साधारण से चेहरे के भावों से उन्होंने मूवी के सस्पेंस को जो गति दी है, कोई अन्य हीरोइन नहीं कर सकती थी। इत्तेफाक़ 4 अक्तूबर, 1969 को रिलीज़ हुई और राजेश खन्ना जुलाई तक बेकार बैठे थे। देने वाला जब देने पर आया तो छप्पर फाड़कर दिया। इत्तेफाक़ ने उस समय 1.7 करोड़ की कमाई की जो आज 71 करोड़ के बराबर है। इस फिल्म के संगीतकार थे सलिल चौधरी। उन्होंने ही इसी प्रोडक्शन हाउस की पेशकश ‘कानून’ फिल्म को संगीत दिया था। इस फिल्म को मिलने वाले पुरस्कारों का ढेर लग गया। गल्ले भरे सो अलग। इत्तेफाक़ फिल्म शुरू होती है एक तूफानी रात में रेडियो अनाउंसमेंट से...अनाउंसमेंट यह थी कि दिलीप नामक पागल एक पागलखाने से भाग गया है। नंदा जो रेखा बनी है, रेडियो को सुनते-सुनते घर के सारे दरवाजे बंद करती है कि दिलीप आश्रय के लिए उसी के घर में आ घुसता है। बंदूक की नोक पर दिलीप उसे खुद को छिपाने को मजबूर करता है। जब पुलिस पता लगाने के लिए आती है तो वह मुकर जाती है। बाद में दिलीप के माफी मांगने पर वह दोस्ताना बर्ताव करने लगती है। यहां तक कि दोनों ड्रिंक भी शेयर करते हैं। रेखा के व्यवहार से खुश होकर दिलीप हॉल में सो जाता है लेकिन आधी रात अजीब आवाजों से उसकी आंख खुल जाती है। जब वह रेखा को ढूंढ़ने जाता है तो देखता है कि बाथरूम में किसी व्यक्ति का शव पड़ा है। वह पुलिस को बुला लेता है। पता चलता है कि यह रेखा के पति जगमोहन की लाश थी। पुलिस इसमें दिलीप का हाथ मानती है क्योंकि जगमोहन के कपड़ों का एक टुकड़ा दिलीप के उन कपड़ों से बरामद होता है जो पागलखाने में थे। लेकिन दिलीप को लगता है कि पुलिस इंस्पेक्टर दीवान (सुजीत कुमार) रेखा की मदद कर रहा है ..जिसे वह प्रमाणित करता है सुजीत के लाइटर से। इस लाइटर को दीवान पहली बार रेखा के घर में भूल आया था, जबकि रेखा को दीवान ने पहचानने से इनकार किया था। अब रेखा दीवान से अपने अवैध संबंध मानते हुए खुद को गोली मार लेती है। दिलीप की पत्नी का पति से लड़ाई के बाद कत्ल होने पर ही दिलीप को पुलिस ले गयी थी। खुद को बेकसूर साबित करते-करते वह पागल करार दे दिया जाता है। घर में मौजूद उसकी पत्नी की बहन रेनु के गवाह बनने पर दिलीप को गिरफ्तार कर लिया जाता है। लेकिन रेनु का ब्रेसलेट घटनास्थल से मिलने पर पुलिस दिलीप को निर्दोष करार देती है। उस वक्त इस फिल्म की टीम को कई पुरस्कार मिले। इनमें 1970 के फिल्म फेयर का सर्वश्रेष्ठ निर्देशक यश चोपड़ा, सर्वश्रेष्ठ ध्वनि पुरस्कार एमए शेख, सर्वश्रेष्ठ एक्टर के लिए राजेश खन्ना, हीरोइन नंदा, सहायक कलाकार बिंदु का नामांकन शामिल है। इसी फिल्म को बाद में 2017 में बनाया गया। सितारे थे सिद्धार्थ मल्होत्रा, सोनाक्षी सिन्हा और अक्षय कुमार, लेकिन यह फिल्म फ्लॉप हो गयी थी। निर्माण टीम प्रोड्यूसर : बी.आर. चोपड़ा निर्देशक : यश चोपड़ा पटकथा : जी.आर. कामथ संवाद : अख्तार उल इमान संगीतकार : सलिल चौधरी सिनेमैटोग्राफी : के.जी. सितारे : राजेश खन्ना, नंदा, बिंदु, सुजीत आदि

सब से अधिक पढ़ी गई खबरें

मुख्य समाचार

101 रक्षा उपकरणों के आयात पर रोक, स्वदेशी को बढ़ावा

101 रक्षा उपकरणों के आयात पर रोक, स्वदेशी को बढ़ावा

आत्मनिर्भर भारत : रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बड़ा ऐलान

कोरोना मामले 21 लाख के पार

कोरोना मामले 21 लाख के पार

एक दिन में रिकॉर्ड 64399 नये मरीज, 861 की मौत

शहर

View All