हरे कांच की चूड़ियां हिंदी फीचर फिल्म

शारा

वर्ष 1967 में रिलीज इस फिल्म को बीते दिनों के एक्टर और डायरेक्टर किशोर साहू ने अपनी बेटी नैना साहू को सिल्वर स्क्रीन पर बतौर नायिका प्रस्तुत करने के लिए निर्देशित किया। सिर्फ उन्होंने इस फिल्म को निर्देशित ही नहीं किया, बल्कि इसकी कहानी भी लिखी और स्वयं इसे प्रोड्यूस भी किया। बेटी को सितारा बनाने के लिए इस फिल्म में सारा परिवार जुट गया, कोई निर्देशन में सहायक बन गया तो किसी ने प्रोडक्शन में मदद का ज़िम्मा संभाल लिया। भले ही वह काम उन्होंने अपनी अन्य बेटियों से करवाया, हसरत जयपुरी व शैलेंद्र से उन्होंने गीत लिखवाए और शंकर जयकिशन ने संगीतबद्ध किया। उन्होंने गीतों को गवाने के लिए भी उम्दा गीतकारों का सहारा लिया। मोहम्मद रफी से लेकर आशा भोसले ने गीतों को आवाजें दीं। बीते ज़माने की गायिका शारदा, जिसने कभी लता मंगेशकर को ताल ठोंकी थी, उन्होंने इस फिल्म में तीन गीत गाये। लेकिन फिल्म के एक ही गीत ने दर्शकों को खींचा वह था ‘हरे कांच की चूड़ियां’। कई लोगों ने फिल्म इसलिए देखी क्योंकि उन्होंने रेडियो पर यह गीत सुना था। हीरो ‘बीस साल बाद’ फिल्म के नायक विश्वजीत थे। फिर भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास नहीं कर पायी। यह डेब्यू कलाकारों के लिए निहायत दुख की बात होती है कि उनकी पहली ही फिल्म पिट जाए। फ्लैश बैक के पाठकों को किशोर साहू के बारे में याद दिला दूं कि वह बीते ज़माने के एक्टर थे और जितेंद्र की तरह उन्होंने बहत सारी फिल्मों में अभिनय किया था। उन्होंने कई फिल्में प्रोड्यूस भी कीं और निर्देशित भी। मीना कुमारी की यादगार फिल्म ‘दिल अपना और प्रीत परायी’ किशोर कुमार की ही फिल्म थी, जिसमें वह मीना कुमारी के पति बने थे। पाठकों को देवानंद की ‘गाइड’ फिल्म का मार्को तो याद होगा, वह किशोर साहू ही थे। उन्होंने ‘नदिया के पार’ में दिलीप कुमार के साथ कामिनी कौशल को भी निर्देशित किया था। कुल मिलाकर वह हरफनमौला कलाकार थे। यह फिल्म भी उनकी चर्चित फिल्मों में से एक थी। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में भी भाग लिया था। उनके पिता विभाजन से पूर्व राजनंद गांव रियासत के प्रधानमंत्री थे। इस फिल्म में ड्रैग एक्ट को फिल्मों में शुरू करने वाले विश्वजीत भी हैं। फिल्मों में काम करने से पूर्व विश्वजीत पहले रेडियो कलाकार थे। फिर बांगला फिल्मों में कूद पड़े और उसके बाद बॉलीवुड फिल्मों में एंट्री की। यह फिल्म बेशक बॉक्स ऑफिस पर उम्मीदों को लेकर खरी नहीं उतरी, लेकिन फिल्म का विषय समय से काफी आगे था। पचास साल पहले इस बात की कोई सोच भी नहीं सकता कि कोई स्त्री अविवाहित होते हुए भी बच्चे की मां बने और समाज के तानों-उलाहनों से उलट वह अपने बच्चे को अपने गरूर, आत्मसम्मान का प्रतीक माने। उसे अपने प्यार पर शर्मिंदगी तो हो सकती है लेकिन मां बनने पर नहीं। इस प्रगतिशील सोच के लिए भी यह फिल्म याद की जाती है। फिल्म की कहानी मोहनी (नैना साहू) जो कि मेडिकल विद्यार्थी है, उसके इर्दगिर्द घूमती है। वह अपने पिता किशनलाल सक्सेना जो कॉलेज में प्रोफेसर हैं तथा बीमार मां के साथ रहती है। मोहिनी को मिलना रवि मेहरा (विश्वजीत) से होता है और दोनों में प्यार हो जाता है। मगर रवि के पिता उनके प्यार के खिलाफ हैं। चूंकि वह शहर के बहुत बड़े व्यापारी हैं, इसलिए रवि को विदेश भेज देते हैं जबकि जाते हुए रवि मोहनी से वादा करता है कि लौटकर वह उसे हरे कांच की चूड़ियां लायेगा, वह उसका इंतज़ार करे। लेकिन रवि के विदेश जाते ही मोहिनी रवि के बच्चों की मां बन जाती है। उसे कॉलेज से निकाल दिया जाता है। वह कैसे हालातों से गुज़रती है, यह फिल्म देखने पर ही पता चलेगा। जब बच्चा जन्म ले लेता है, रवि स्वदेश लौट आता है लेकिन अपने पिता द्वारा पैदा की गयी गलतफहमी के कारण वह मोहनी से नहीं मिलता। किसी दोस्त की शादी में जब दोनों मिलते हैं तो गलतफहमी दूर हो जाती है और वे सुखी दाम्पत्य बिताने लगते हैं। कोई फिल्मी मसाला नहीं, लड़ाई-मारकाट नहीं, सस्पेंस नहीं लेकिन कहानी में जो प्रगतिशील विचारधारा का विषय है, वही इस फिल्म को फ्लैशबैक में शामिल करवाने के लिए काफी है। फिर आशा भोसले का गीत ‘धानी चुनरी पहन सजके बने दुल्हन जाऊंगी उनके घर, जिनसे लागी लगन, आएंगे जब सजन, जीत लें मेरा मन, कुछ न बोलूंगी मैं—बज उठेंगी सदा कांच की चूड़ियां’ लाजवाब गीतों में से एक था।

प्रोड्यूसर, लेखक, निर्देशक : किशोर साहू सिनेमैटोग्राफी : केएच कपाड़िया गीत : हसरत जयपुरी, शैलेंद्र संगीत : शंकर जयकिशन सितारे : नैना साहू, विश्वजीत, शिव कुमार, हेलेन, नाजिर हुसैन आदि। गीत हरे कांच की चूड़ियां : आशा भोसले पंछी रे ओ पंछी : मोहम्मद रफी, आशा भोसले ए जाने-मन ले गया दिल : मोहम्मद रफी कहां चला रहे : शारदा मिलन की रात है : शारदा ले जा दिल है तेरा : शारदा

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