सुलगते सवाल

सुनिश्चित हो कारगर उपायों का क्रियान्वयन

पंजाब में सिर्फ दो दिनों में खेतों में पराली जलाने की पंद्रह सौ घटनाएं बताती हैं कि गंभीर होते संकट के बावजूद न प्रशासन जागा है और न किसान जवाबदेह हुए हैं। किसान अपनी सुविधा से इसे जलाने में लगे हैं। यही वजह है कि सुप्रीमकोर्ट को कहना पड़ा कि लोगों को यूं ही वायु प्रदूषण से मरता नहीं छोड़ा जा सकता। यह भी कि पराली जलाने वालों से किसी तरह की हमदर्दी नहीं हो सकती। वहीं दूसरी खबर हरियाणा से है कि सुप्रीमकोर्ट के निर्देशानुसार किसानों को प्रति क्विंटल पराली के लिए सौ रुपये के अलावा प्रति एकड़ एक हजार रुपये देने की घोषणा की गई है। मकसद यही कि किसान खेतों में पराली न जलाएं। यहां जरूरत सिर्फ घोषणा करने की ही नहीं है बल्कि किसान को भरोसे में लेकर उसे प्रेरित करने की भी है। दरअसल, यह समझने की जरूरत है कि वक्त के साथ खेती व पशुपालन के तौर-तरीकों में बदलाव आया है, जिसके चलते पराली फालतू की चीज बन गई है। दूसरे खरीफ व रबी के फसल चक्र में समय का अंतर कम हुआ है। तीसरे न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ने से धान की खेती प्रचुर मात्रा में होने लगी है। इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई रोजगार योजनाओं के चलते पंजाब-हरियाणा में अन्य प्रदेशों के श्रमिक आने कम हो गये हैं, फलत: किसान धान की फसल काटने के बाद पराली खेत में ही जलाना मुनासिब समझता है। दरअसल, हम पराली के विकल्प तब जोर-शोर से प्रचारित करते हैं जब दिल्ली व अन्य शहरों में वायु प्रदूषण की मात्रा खतरनाक स्तर तक जा पहुंचती है। हालांकि, इसमें दिल्ली शहर के वाहनों, एयरकंडीशनर व निर्माण तथा उद्योगों का भी प्रदूषण शामिल होता है। फिर हवा सुधरने के बाद साल भर के लिये खामोशी समस्या को विकराल बनाती है। सही मायनो में पराली संकट शासकों-प्रशासकों की व्यापक अनदेखी का नतीजा है। लगातार सुप्रीमकोर्ट की फटकार और एनजीटी की नसीहतों के बावजूद सरकारें व नौकरशाही गंभीर नजर नहीं आतीं। यही वजह है कि तमाम कोशिशों के बावजूद पंजाब में पिछले साल के मुकाबले रिकॉर्ड पराली जलायी गयी है। शीर्ष अदालत की पहल के बावजूद यदि हालात नहीं बदलते तो यह सरकारों की काहिली ही दर्शाती है। अब समय आ गया है कि उन अधिकारियों के खिलाफ सख्ती बरती जाये, जिन्हें किसानों को पराली जलाने से रोकने की जिम्मेदारी दी गई है। इस समस्या का कारगर हल निकालना सरकारों की जवाबदेही तो है ही, साथ ही योजना का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना भी जरूरी है। समाधान ऐसा हो जो किसान को सुविधाजनक लगे। इसके लिये किसानों को प्रेरित करने की भी जरूरत है। सरकारी व गैर सरकारी संगठन रचनात्मक भूमिका निभा सकते हैं। उद्योग जगत भी पराली से ऊर्जा पैदा करने तथा उपयोगी निर्माण के विकल्प तलाशे। नि:संदेह साल-दर-साल बढ़ता वायु प्रदूषण हमारी सामूहिक नाकामी का ही ज्वलंत उदाहरण है, जिससे जनता के जीवन से खिलवाड़ जारी है। यह देश की छवि खराब करने वाली स्थिति भी है, जिसके लिये युद्धस्तर पर प्रयास किये जायें। हमें सोचना होगा कि हम नई पीढ़ी के लिये कैसा परिवेश तैयार कर रहे हैं। सवाल हमारे नीति-नियंताओं पर भी है कि वे कैसे शहरों को स्मार्ट बनाने के थोथे दावे करते रहते हैं, जबकि हम लोगों को साफ हवा-पानी तक उपलब्ध कराने में अक्षम हैं। पराली के अलावा उन कारकों पर भी विचार करने और समाधान की जरूरत है जो हवा को जहरीली बनाने में  भूमिका निभाते हैं। इसके निवारण के लिये स्पष्ट और कारगर नीति बनाने की जरूरत है। अन्यथा साल-दर-साल यह संकट गहराता ही जायेगा। मगर विडंबना यही है कि घोषणाएं ज्यादा हो रही हैं और काम कम हो रहा है।

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