सही दिशा में छोटे कदम

भरत झुनझुनवाला वित्त मंत्री ने स्वीकार किया है कि भारत में 15 से 65 वर्ष की कार्यशील जनसंख्या अधिक है और इसमें वृद्धि होने को है और इन्हें उत्पादक बनाना एक बड़ी चुनौती है। इस दिशा में उन्होंने घोषणा की है कि एक ऑनलाइन डिग्री कार्यक्रम कुछ संस्थाओं द्वारा शुरू किये जायेंगे। दूसरे, विदेशी छात्रों को भारत में प्रवेश दिलाने के लिए आई-सैट नाम की एक अंतर्राष्ट्रीय परीक्षा व्यवस्था स्थापित की जायेगी, जिससे कि हम अधिक संख्या में बाहरी छात्रों को ला सकें। तीसरे, टीचरों और नर्सों की अंतर्राष्ट्रीय जरूरतों को पूरी करने के लिए उनकी ट्रेंनिंग और भाषा की योग्यता को मेजबान देश के अनुसार बनाने के प्रयास किये जायेंगे। चौथे, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी शिक्षा को बढ़ावा दिया जाएगा। ये चारों प्रयास अत्यंत सराहनीय और सही दिशा में हैं, लेकिन इन तमाम कार्यक्रमों पर खर्च की जाने वाली राशि नगण्य है। जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विकास और पंचायतों तक ब्रॉडबैंड पहुंचाने के लिए क्रमशः मात्र 8 हजार करोड़ रुपये और 6 हजार करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गयी है। इसकी तुलना में बुनियादी संरचना जैसे सड़क और एयरपोर्ट के लिए 103 लाख करोड़ रुपये की रकम आवंटित की गयी है। यह जो सड़क जैसी बुनियादी संरचना है, वह मुख्यतः मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी होती है। सेवा क्षेत्र जैसे ऑनलाइन डिग्री और बाहरी छात्रों को लाने जैसे कार्यक्रमों के लिए सड़क और एयरपोर्ट से ज्यादा जरूरी है कि हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में ज्यादा निवेश करते। लेकिन जो सूर्याेदय (उभरते) सेवा क्षेत्र के लिए जरूरी निवेश है, वह बहुत ही कम है और इसकी तुलना में मैन्युफैक्चरिंग संबंधित बुनियादी संरचना में निवेश ज्यादा है। मै ये नहीं कह रहा हूं कि सड़कों पर निवेश ठीक नहीं है। मै यह कह रहा हूं कि जो इस समय रोजगार उपलब्ध कराने की प्राथमिकता है उसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और पंचायतों तक ब्रॉडबैंड पहुंचाने में बहुत अधिक रकम आवंटित की जानी चाहिए थी। यदि हम हाईवे पर कुछ कम खर्च करते तो भी काम चल जाता। कृषि पर जो बातें हम पिछले 20 साल के बजटों में सुनते आये हैं, उन्ही को दोहराया गया है। कोल्ड स्टोरेज आदि को बढ़ावा दिया गया है, जो कि सही दिशा में है। लेकिन कृषि की मूल समस्या यह है कि कृषि उत्पादों के अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों में लगातार गिरावट आ रही है। विकास के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान भी कम होता जाता है। जैसे यूरोप और अमेरिका जैसे विकसित देशों में आज कृषि का योगदान एक प्रतिशत से भी कम है, इसलिए कृषि की बुनियादी सुविधाओं को हम सुधार भी देंगे, जैसे सिंचाई के लिए सोलर पंप सेट को लगा लेंगे तो भी वैश्विक मूल्यों की गिरावट को देखते हुए कृषि लाभप्रद नहीं हो जायेगी। हम देख चुके हैं कि वर्ष 2014 से एनडीए सरकार लगातार किसानों की आय को बढ़ाने के वादे करते आ रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर एक प्रतिशत भी वृद्धि हुई हो, ऐसा मुझे नहीं लगता है। इसका कारण है कि कृषि मूलतः लाभप्रद नहीं रह गयी है। सरकार को इस सूर्यास्त क्षेत्र में अपनी ताकत लगाने के स्थान पर सूर्योदय वाले सेवा क्षेत्र पर विशेष ध्यान देना चाहिए था। कृषि का मामला कठिन है और इसको मेरे हिसाब से हल किया ही नहीं जा सकता। यही परिस्थिति लगभग मध्यम और छोटे उद्योगों की है। जिस प्रकार पिछले 20 साल में इन्हें ऋण उपलब्ध कराने की बार-बार बात की जा रही है और इन्हें ऋण उपलब्ध कराया भी गया होगा, लेकिन इससे इनकी हालत में तनिक भी सुधार नहीं हो रहा है। कारण यह है कि इन्हें ऋण उपलब्ध कराने के साथ-साथ सरकार ने खुले व्यापार को अपना रखा है और मेक इन इंडिया के तहत बड़े उद्योगों को बढ़ावा दे रही है। देशी और विदेशी बड़े उद्योगों की उत्पादन लागत कम आती है, इसलिए चुनिंदा क्षेत्रों जैसे फुटबाल और फर्नीचर को छोड़ दें तो बाकी तमाम क्षेत्रों में छोटे उद्योग बड़े उद्योगों के सामने टिक ही नहीं रहे हैं। जैसे अनपढ़ को आप कितनी भी पुस्तक दें, उसका कोई लाभ नहीं होता उसी प्रकार छोटे उद्योगों को आप कितना भी ऋण दें उसका कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि उनके माल का बाजार ही हम साथ-साथ छोटा कर रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संदर्भ में वित्त मंत्री ने सरकारी शिक्षा तंत्र के सुधार पर कुछ भी नहीं कहा है। आज हमारे कॉलेजों में युवा केवल डिग्री प्राप्त करने के लिए प्रवेश लेते हैं। उन्हें शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं होता है। वित्त मंत्री ने, जो यह कहा है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में लड़कियों की शिक्षा का अनुपात अधिक हो रहा है, यह बहुत सुखद है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि लड़कों को यह भरोसा नहीं है कि शिक्षा प्राप्त करने से वे रोजगार कर सकेंगे अथवा अपने परिवार को पाल सकेंगे। इसलिए लड़कों में शिक्षा के प्रति अरुचि है। उस मूल समस्या को वित्त मंत्री ने दरकिनार कर दिया है। जरूरत यह थी कि वित्त मंत्री हमारे विश्वविद्यालय एवं कॉलेज की व्यवस्था को सुधारने के कदम उठातीं। जैसे वित्त मंत्री कह सकती थीं कि जितने भी सरकार द्वारा पोषित विद्यालय और यूनिवर्सिटी हैं, उनके बजट में क्रमशः हर वर्ष 10 प्रतिशत की कटौती की जायेगी और इस रकम को सीधे छात्रों के हाथ में दिया जाएगा, जिससे कि वे अपनी फीस को अदा कर सकें। ऐसा करने से संविधान द्वारा जो शिक्षा आदि का अधिकार स्थापित किया गया है, उसकी पूर्ति भी हो जाती और यूनिवर्सिटियों को अपने शिक्षा तंत्र में सुधार भी करना पड़ता। लेकिन वित्त मंत्री ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। इसलिए मै समझता हूं कि देश की मूल शिक्षा व्यवस्था वर्तमान की तरह लचर बनी रहेगी और हमारी शिक्षा तंत्र से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी नयी तकनीकों को हासिल करने वाले कम ही युवा पैदा होंगे। पर्यावरण की दृष्टि से बजट में पूरा ध्यान पानी के अधिक दोहन पर है। यद्यपि भूमि के पुनर्भरण के प्रति भी कुछ आस्था दिखाई गयी है। जैसे सोलर पैनल से चलने वाले सोलर पंप सेट बनाने की बात की गयी है, जो कि सही दिशा में है। लेकिन जब भूमिगत पानी का स्तर पूरे देश में गिर रहा है, उस समय पंप सेटों को प्रोत्साहन देने का कोई औचित्य नहीं है। चाहे वे सोलर उर्जा से ही चलने वाले हों। जरूरत थी कि हम साथ-साथ पानी के पुनर्भरण पर विशेष ध्यान देते, लेकिन वित्त मंत्री ने इस दिशा में बहुत छोटा कदम उठाया है। साथ-साथ अर्थव्यवस्था को गति देने के नाम पर सरकार द्वारा थर्मल बिजली प्लांटों द्वारा जहरीली गैसों के उत्सर्जन, जंगलों के कटान, बिजली बनाने के लिए नदियों का सर्वनाश आदि के ऊपर वित्त मंत्री ने नकेल कसने की तनिक भी बात नहीं की है। इन पर्यावरणीय दुष्प्रभावों का प्रभाव आम आदमी पर पड़ता है, इसलिए इस बजट में यद्यपि कुछ अच्छी बातें कही गयी हैं, जिनका मैं समर्थन करता हूं, लेकिन मूल रूप से जो सूर्योदय का सेवा क्षेत्र है, उसके ऊपर कम ध्यान है और जो घिसा पिटा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर है, उसी के लिए बुनयादी संरचना बनाने के प्रयास किये गए हैं, जो कि अंततः निष्फल होते दिखाई पड़ रहे हैं।

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