सहारा बनो

मधु गोयल

हम पांचों के ग्रुप में रोहन बहुत शैतान था। वह अपने साथ-साथ बाकी बच्चों को वही करने को कहता, जो वह चाहता। अगर कोई बच्चा नहीं मानता तो उससे झगड़ा करता। कभी किसी के घर की लाइटें तोड़ देना, भागते हुए के टांग अड़ा देना और कभी-कभी किसी बच्चे के कपड़े ज्यादा सफेद हुए तो इंक छिड़क देना, उसका रोज़ का काम था। धीरे-धीरे सब बच्चों ने उसका साथ छोड़ दिया। रोहन को कभी अपनी गलती का अहसास ही नहीं हुआ। उसको ऐसा करने में बहुत मजा आता था। एक दिन एक बूढ़ी मां, जो बाहर बैठी अपना समय व्यतीत कर रही थी, ने रोहन को पास बुलाकर कहा, ‘बेटा रोहन, आपके कपड़े तो बहुत साफ और चमकदार हैं, आपकी मम्मी कौन-सा वाशिंग पाउडर इस्तेमाल करती हैं।’ इतना कहकर उसने रोहन की शर्ट पर हाथ फेरा। अम्मा के हाथ फेरने से शर्ट गन्दी हो गई। रोहन को यह अच्छा नहीं लगा, और गुस्से से बोला, ‘आपने मेरी शर्ट गन्दी कर दी।’ अम्मा ने कहा, ‘हां-हां, तो क्या हुआ? आप भी तो यही करते हो, वही मैंने दोहराया, तो आपको क्यों बुरा लगा? बेटा, जो किसी के लिए गड्ढा खोदते हैं, बह एक ना एक दिन गड्ढे में गिरते हैं? ऐसा कर मैंने आपको समझाया है, आगे से ऐसा मत करना, ऐसा कर तुम आपने साथ-साथ दूसरों का समय भी खराब और नुकसान भी करते हो। अपनी प्रतिभा का सही उपयोग करो बेटा, अच्छा करेंगे, अच्छा पाएंगे, अभी तो तुम बच्चे हो, जिन्दगी में बहुत कुछ सीखना है। बेटा, हमें जिंदगी में कोई भी काम ऐसा नहीं करना चाहिए, जिससे दूसरों को तकलीफ हो, हमें तो एक-दूसरे का सहारा बनना चाहिए।’  रोहन चुपचाप अम्मा की बात सुनता रहा, अपनी गलती समझकर आगे से ऐसा न करने का वादा किया और चला गया।

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