समय से संवाद करती पत्रों की विरासत

समय से संवाद करती पत्रों की विरासत

पुस्तक समीक्षा

सुभाष रस्तोगी

पुस्तक : मेरे प्रिय संपादक : अशोक वाजपेयी प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली पृष्ठ : 259 मूल्य : रु. 295.

हिन्दी के मूर्धन्य कवि अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित सद्य: प्रकाशित कृति ‘मेरे प्रिय’ में भारतीय चित्रकला के दो दिग्गज चित्रकार सैयद हैदर रज़ा और कृष्ण खन्ना का हुआ पत्र-व्यवहार दर्ज़ है। दोनों दिग्गज कलाकारों के बीच यह पत्र-व्यवहार मूलत: अंग्रेजी में हुआ था जिसका अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद प्रभात रंजन ने किया है। वास्तव में ये पत्र अपने समय का दस्तावेज़ बन कर सामने आए हैं। अशोक वाजपेयी का यह अभिमत काबिलेगौर है, ‘इस पत्राचार को क्रमश: कुछ पुस्तकों में प्रकाशित करने का इरादा है। इस सीरीज़ में पहली पुस्तक सैयद हैदर रज़ा और कृष्ण खन्ना के पत्राचार की है। सौभाग्य से इन दोनों ने एक-दूसरे के पत्र संभाल कर रखे। दो मूर्धन्य कलाकारों के बीच यह पत्र-संवाद निराला है।’ कलाओं में भारतीय आधुनिकता के एक मूर्धन्य सैयद हैदर रज़ा अपनी तरह के एक अद‍्भुत चित्रकार तो थे ही, कविता और विचार में भी उनकी गहरी रुचि थी। हालांकि उन्होंने फ्रांस में साठ वर्ष बिताये और उनका फ्रेंच और अंग्रेजी का ज्ञान अत्यंत गहरा था, लेकिन हिन्दी में ही रमे रहे। कला जीवन के उत्तरार्द्ध में उनके सभी चित्रों के शीर्षक हिंदी में होते थे। वे विश्व के चित्रकारों में 20-21वीं सदियों में शायद अकेले हैं, जिन्होंने अपने सौ से भी अधिक चित्रों में देवनागरी में संस्कृत, हिन्दी और उर्दू कविता में पंक्तियां अंकित कीं। कृष्ण खन्ना को पेरिस से 27 अगस्त, 1956 को सैयद हैदर रज़ा के लिखे इस पत्र की ये पंक्तियां यह तथ्य उद‍्घाटित करती हैं कि प्रारंभ में उन्हें भी अपनी पहचाने बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा, ‘याद है मैं जो क्रिसमस काड‍्र्स बना रहा था? कुछ भी काम नहीं आया। क्यों? मुझे अभी नहीं पता खासकर तब जब 1952 और 53 में शुरुआत इतनी अच्छी हुई थी। मुझे जीने के लिए दूसरे साधन अपनाने पड़े। मैंने कई तरह के काम करने की कोशिश की। आखिरकार ऐसा लगा कि किताबों के लिए चित्रांकन बनाने का काम चल पड़ा। यह बहुत मेहनत का काम था और महीने में सिर्फ 15 पाउंड की आय होती थी। यह करीब एक साल तक चला। मैंने कम पेंटिंग बनायी लेकिन मैं खुद को सम्मानित आदमी के रूप में महसूस करता था।’ सैयद हैदर रज़ा के कृष्ण खन्ना को पेरिस से 14 सितंबर, 2000 को लिखे इस पत्र की अंतिम पंक्तियां इस बात का साक्ष्य हैं कि जीवन के उत्तरार्द्ध में उन्हें अौर उनकी पत्नी ज़ानीन को स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्यायें रहने के बावजूद सैयद हैदर रज़ा की कला के प्रति अथक प्रतिबद्धता और एक-निष्ठता में रंच मात्र की कमी नहीं आई थी, ‘इस छोटी-सी चिट्ठी के साथ मेरे हाल के कामों की कुछ तस्वीरें हैं और जून 1999 में न्यूयार्क में मेरी पेंटिंग की जो प्रदर्शनी लगी थी।’ उसका एक कैटलाॅग भी है। फिलहाल मैं सफेद कैनवास के साथ हूं हालांकि मैंने अभी तक संन्यास नहीं लिया है। मुझे अभी भी फूल, सुन्दर चीजें, अच्छा खाना और वह सब पसंद है जो अच्छे समाज को बनाता है, और जाहिर है मैं रंगों के प्रति अपने आकर्षण को रोक नहीं सकता, जो पेंटिंग का अंतर्निहित अवयव है।’

महानगरीय जीवन की रातों का अक्स जीतेंद्र अवस्थी पुस्तक : कलकत्ता नाइट्स (अंग्रेजी) मूल बांग्ला लेखक : हेमेंद्र कुमार रॉय अंग्रेजी रूपांतर : रजत चौधुरी प्रकाशक : नियोगी बुक्स, नयी दिल्ली पृष्ठ : 140 मूल्य : रु. 295.

मशहूर बांग्ला लेखक हेमेंद्र कुमार राय की एक पुस्तक ‘रातेर कोलकाता’ प्रथम बार 1923 में छपी और बहुत चर्चित हुई थी। इसमें कोलकाता महानगर की रातों की पिछली सदी के पहले दो दशकों की जिंदगी उकेरी गयी है। हेमेंद्र बहुविध लेखक थे। उन्होंने साहस-रोमांचपूर्ण जासूसी, सुपर नेचुरल व विज्ञान लेखन में खूब नाम कमाया। कोलकाता में ही जन्मे और अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं से जुड़े रहे। ‘कलकत्ता नाइट्स’ (अंग्रेजी) ‘रातेर कोलकाता’ ही का अनुवाद है जो रजत चौधरी ने किया है। बांग्ला में यह पुस्तक वास्तव में मेघनाथ गुप्ता का देखा-भोगा यथार्थ है जो हेमेंद्र कुमार राय ही का छद्म नाम है। उन्होंने कई रातें कोलकाता की गलियों की खाक छानी। महानगर की रातों का जीवन करीब से देखा। उसे ही बहुधा संस्मरणात्मक शैली में लिख डाला। सुना-सुनाया नहीं, आंखों देखा। कोलकाता में उस समय भी देश ही नहीं, विदेश के अनेक हिस्सों के लोग भी रहते थे। कुछ इस महानगर की जिंदगी व संस्कृति का हिस्सा बन गये। उस कालखंड में ही देश की राजधानी कोलकाता से दिल्ली ले जायी गयी थी। तात्पर्य यह कि यह महानगर उस समय राजनीतिक, व्यापारिक व सांस्कृतिक गतिविधियों से अटा पड़ा था। प्रथम विश्वयुद्ध और विश्वकवि रवींद्र नाथ ठाकुर को नोबेल भी तभी की घटनाएं है। कोलकाता की जिंदगी खूब रंग-रंगीली थी। दिन के अपने रंग थे, रात के अलग। अमीरी थी; गुरबत थी और औसत आमदनी वाले लोगों का ठाठें मारता समंदर था। ये सब अपनी-अपनी हैसियत-औकात के लिहाज से जीते थे। मौज-मस्ती करते थे और ऐश-परस्ती भी। वेश्यालय थे; मदिरालय थे; रंगमंच की अपनी मौजूदगी थी। अभावों व मुश्किलों का दौर भी था और धोखाधड़ी, लूट-खसूट और जुर्म-जरायम का अपना संसार था। इसी स्याह घटाटोप के बीच चमचमाती रातों की रंगीन जिंदगी भी थी। ‘मेघनाद गुप्ता’ को रातोंरात घूम-घूमकर इस रंगीले-सपनीले जीवन से दो-चार होना गवारा हुआ। यह निरूपण या निस्सरण आंखों देखा हाल ही नहीं है मात्र; एक भोगा हुआ यथार्थ भी है। यह ‘पर-कथन’ नहीं, ‘आंखिन देखी’ है। कोलकाता की रातों का रेखांकन बहुत सजीव है, आकर्षक व ग्राह्य है और औत्सुक्य तत्व से परिपूर्ण भी। पूर्व के पेरिस के रूप में विख्यात कोलकाता का जनमानस तब पुनर्जागरण के दौर में था। उसी को किताब में उकेरा गया है। विदेशी महिलाओं का चकाचौंधी जीवन, बाबुओं की अय्याशी और गुंडे-बदमाशों की हरकतें--सब इस किताब में समेटे गये हैं। इनके निरूपण में लेखकीय संयम भी सामने आता है। यह रंगत अंग्रेजी में अनुवाद करते समय रजत चौधरी ने भी बनाये रखी है। उन्होंने कुछ मूल बांग्ला शब्दों को भी अंग्रेजी रूप में बनाये रखा है जो कोलकाताई अथवा बांग्ला फ्लेवर को बढ़ाने में सक्षम है।

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