सफाई से दिल का रिश्ता

शिखर चंद जैन

इन दिनों टेंशन,डिप्रेशन व एंग्जायटी जैसी मानसिक बीमारियां हर कोई को परेशान कर रही हैं। हम अक्सर झुंझलाहट, तनाव और गुस्से में रहने लगे हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में इसकी मूल वजह तक नहीं पहुंच पाते। इसकी एक बड़ी वजह है घर का अव्यवस्थित माहौल। वह घर में रखा कचरा ही है जो हमारे अंदर नेगेटिव एनर्जी भरता है।

कबाड़ से मूड ऑफ कोलकाता मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. अमरनाथ मल्लिक का कहना है कि बेतरतीब वार्डरोब, जूठे बर्तनों से भरा सिंक, बाथरूम में इधर-उधर फैले कपड़े या साबुन शैंपू आदि देखकर सुबह सवेरे ही हमारा दिमाग भन्ना जाता है। इधर-उधर बिखरा सामान, किताबें, अखबार और कपड़े दिमाग को भारी कर देते हैं, जिससे हमें चिड़चिड़ाहट, गुस्सा, झुंझलाहट और थकान सी महसूस होने लगती है। इसका सीधा, नकारात्मक असल उन लोगों पर पड़ता है जो हमारे साथ रहते हैं। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि यह कबाड़ वैवाहिक संबंधों में खटपट और यहाँ तक कि तलाक का सबब भी बन जाता है।

नकारात्मक प्रभाव यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया द्वारा की गई एक स्टडी के मुताबिक अव्यवस्थित सामान का हमारे मूड और आत्मसम्मान पर काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने भी अपने अध्ययन में कुछ ऐसा ही पाया। इन शोधकर्ताओं के मुताबिक घर या ऑफिस में फैला कबाड़ दिमाग की एकाग्रता और सूचनाओं को प्रोसेस करने की क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। ‘हाई ओक्टेन वीमन- हाऊ सुपरएचीवर्स कैन अवोएड बर्नआउट’ के लेखक और साइकोलोजिस्ट डॉ. शेरी बोर्ग कार्टर कहते हैं, ‘क्लटर हमारे दिमाग पर अतिरिक्त उत्तेजना या उद्दीपन की बमबारी सी कर देता है। हमारे दिमाग अनुपयोगी चीजों पर ज्यादा काम करने लगता है औऱ उसे रिलैक्स करने का मौका नहीं मिलता। इससे हमारे मन में ऐसी भावना आती है कि हमारा काम जिंदगी भर पूरा नहीं होगा और फिर हम चिड़चिड़े और गुस्सैल हो जाते हैं।

स्टफोकेशन न हो हावी ट्रेंड फोरकास्टर और लेखक जेम्स वॉलमैन ने अपनी पुस्तक के शीर्षक के लिए नया शब्द गढ़ा-स्टफोकेशन। इसमें स्टफ और सफोकेशन दो शब्द मिले हुए हैं। यानी जब चीजें घुटन पैदा करने लगती हैं। इनका मानना है कि जब आप तमाम चीज़ों के ढेर में अपने काम की एक भी चीज नहीं पाते, तो आपको झुंझलाहट आता है। यही स्टफोकेशन है।

कबाड़ की आदत है पुरानी कोलकाता के फोर्टिस अस्पताल में कंसलटैंट सीनियर साइकैट्रिस्ट डॉ. संजय गर्ग कहते हैं, ‘हम भारतीयों में चीजों के प्रति इमोशनल लगाव की आदत हैं। इस वजह से हम बहुत सारी चीजों को मां, पिता, दादी, दादा, नाना, नानी आदि की याद से जोड़कर इकट्ठा करते चले जाते हैं, और उन्हें फेंकने में हिचकिचाते हैं। अगर कबाड़ से दिल का गहरा रिश्ता है तो ज़रूरी है कि सफाई से इससे भी करीबी संबंध जोड़ा जाये। कई लोग हॉबी या सनक के तौर पर कई चीजें इकट्ठी करते रहते हैं औऱ उन्हें कभी फेंकते नहीं हैं। कई लोग इन्हें अपने बचपन, किशोरावस्था, सगाई के दिन या अन्य से जोड़कर देखते हैं। पुरानी चीज़ें बेकार भले ही नहीं हैं लेकिन इन पर जमी गंदगी तो किसी भी काम की नहीं हो सकती, सिवाय बीमारियों को न्योता देने के अलावा। आज के दौर में जब बड़े शहरों में जगहें सिकुड़ती जा रही हैं और लोग छोटे-छोटे दड़बेनुमा फ्लैटों में रह रहे हैं, तब हम अपनी नित्य उपयोगी वस्तुएं ही ठीक से रख पाएं तो काफी हैं। ऐसी स्थिति में अनुपयोगी चीजें घर में रखने की आदत अव्यवस्था फैला देती है और घर घर वक्त बिखरा-बिखरा दिखने लगता है। अगर आप एक सुकून भरा जीवन चाहते हैं तो आपको इस कबाड़ से मुक्ति पानी होगी। बेहतर होगा कि अनुपयोगी चीजों को या तो स्टोर में पटक कर ताला लगाएं या फिर किसी कबाड़ी को बेच डालें। किचन, बेडरूम, बाथरूम और वार्डरोब एक दम साफ सुथरी हो और व्यवस्थित हो।’

कौन किस कबाड़ का शौकीन महिलाएं अक्सर ज्वेलरी, स्टोल, कपड़े, ग्रीटिंग कार्ड, फोटोफ्रेम, रजाइयां, स्टफ टॉयज, शूज, बैग, कॉस्मेटिक्स, किताबें, गिफ्ट रैपर (जो कभी काम नहीं आएंगे) इकट्ठा करती हैं जबकि पुरूष इन चीजों के दीवाने होते हैं , जैसे पेन, सिक्के, स्टाम्प, इलेक्ट्रॉनिक सामान, फर्नीचर, स्पोर्ट्स इक्विपमेंट, घड़ियां,सनग्लास, किताबें, पुराने अखबारों की कटिंग, तरह-तरह के लाइटर्स रेडियो, टेपरेकॉर्डर, सीडी आदि। इनमें कुछ सहेजें लेकिन सब कुछ नहीं।

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