संयम नहीं खोना

अनंत अमित

जीवन हमें बहुत कुछ सिखाता है। हर कदम पर एक सीख देकर जाता है। छड़ी पकड़कर नहीं, परिस्थितियों से। और जीवन की यही सीख व्यक्ति को फौलादी बनाती है। यह किताबी बात नहीं, सच है सौ फीसदी। मेरी मां कहा करती थी कि संयम से बड़ा गुण कोई नहीं है। हम जितना खुशियों का स्वागत करते हैं, अगर उतना ही सकारात्मक नज़रिए से विकट परिस्थितियों का मुकाबला करेंगे तो उदासी, निराशा आसपास नहीं फटकेंगी। नतीजतन विषम से विषम माहौल में जीना असान हो जाएगा। यह मैंने जीवन से सीखा है। स्कूल जीवन में कई प्रेरक कहानियां पढ़ीं, जिनका सार भी यही होता था। उस समय मुझे नहीं पता था कि जीवन मेरी परीक्षा लेने के लिये तैयार था। मेरे जीवन में एक ऐसी घटना घटी, जिसने जीवन के प्रति मेरा नज़रिया बदल दिया। कुछ साल पूर्व मेरी मां का निधन हो गया था। घर में ऐसे वक्त में जो माहौल होता है, उसे शब्दों में बयां कर पाना किसी के लिये भी आसान नहीं होता। मुझे याद है कि उनका शव अभी अंतिम संस्कार के लिये जाना था लेकिन घर में एक और विपदा आन पड़ी। उस समय मैं बहुत पररिपक्व नहीं था। मां की मौत के सदमे से तभी मेरे पिता को ब्रेन हैम्रेज हो गया। उस वक्त मेरे सामने ऐसी विकट स्थिति थी कि मां के शव को अंतिम संस्कार के लिये लेकर जाएं या पहले पिता को अस्पताल लेकर जाएं। इन परिस्थितियों में मेरी मन: स्थिति का अंदाज़ा लगा पाना आसान नहीं है। खैर उस समय मुझे मां की सीख काम आई कि परिस्थिति कैसी भी हो, हमेशा संयम से काम लो। जो है उसे जीओ। जो नहीं है, उस पर हाय-तौबा मत मचाओ। तब मैंने इन मुश्किल परिस्थितियों में मां के शव को आंगन में ही छोड़ा और पहले पिताजी को अस्पताल ले गया। यकीनन उस वक्त लोगों ने मुझे बहुत बुरा-भला कहा था। लेकिन मैं अपनी मां को खो चुका था, मैंने पिताजी को बचाना ज़रूरी समझा। आप बताएं यदि मैं ऐसा नहीं करता तो पिता का प्यार भी खो देता। वह आत्मसंयम ही था, जिसने मुझे यह करने की शक्ति दी। आज भी मां की सीख को दिल से दिमाग में मैंने बड़ी जगह दी है।

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