संतान की मंगलकामना का व्रत अहोई अष्टमी

योगेश कुमार गोयल

करवा चौथ के चार दिन बाद और दिवाली से एक सप्ताह पहले मनाई जाती है ‘अहोई अष्टमी’। कार्तिक कृष्ण अष्टमी को महिलाएं अपनी संतान की दीर्घायु, जीवन में समस्त संकटों से उनकी रक्षा के लिए इस दिन व्रत रखती हैं। नि:संतान महिलाएं भी संतान की कामना के लिए यह व्रत करती हैं। इस दिन अहोई माता के रूप में अपनी-अपनी पारिवारिक परंपरानुसार लोग माता पार्वती की पूजा करते हैं। अहोई अष्टमी व्रत के संबंध में कुछ कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथानुसार प्राचीन काल में किसी नगर में एक साहूकार की पत्नी दिवाली से पहले घर की लीपा-पोती के लिए मिट्टी लेने गई। मिट्टी खोदने के लिए उसने जहां कुदाल चलाई, वहां एक सेह की मांद थी। सहसा उस स्त्री के हाथ से कुदाल सेह के बच्चे को लग गई, जिससे वह मर गया। साहूकार की पत्नी को जीव हत्या से बहुत दुख हुआ, परन्तु अब क्या हो सकता था? वह पश्चाताप करती हुई घर लौट आई। कुछ दिनों बाद उसके एक बेटे का निधन हो गया। फिर अकस्मात दूसरा, तीसरा और इस प्रकार वर्ष भर में उसके सभी सात बेटे मर गए। महिला अत्यंत व्यथित रहने लगी। एक दिन उसने अपने आस-पड़ोस की वृद्ध महिलाओं को विलाप करते हुए बताया कि उसने जानबूझकर कभी कोई पाप नहीं किया। अनजाने में उससे एक सेह के बच्चे की हत्या अवश्य हुई है। यह सुनकर वृद्ध औरतों ने उसे दिलासा देते हुए कहा कि यह बात बताकर तुमने जो पश्चाताप किया है, उससे तुम्हारा आधा पाप नष्ट हो गया है। तुम उसी अष्टमी को भगवती माता की शरण लेकर सेह और सेह के बच्चों का चित्र बनाकर, उनकी आराधना करो और क्षमा-याचना करो। ईश्वर की कृपा से तुम्हारा पाप धुल जाएगा। साहूकार की पत्नी ने ऐसा ही किया। वह हर वर्ष नियमित रूप से ऐसा करने लगी। उसे सात पुत्रों की प्राप्ति हुई। देवी पार्वती को अनहोनी को होनी बनाने वाली देवी माना गया है। इसलिए अहोई अष्टमी पर माता पर्वती की पूजा की जाती है और संतान की दीर्घायु एवं सुखमय जीवन की कामना की जाती है।

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