शीर्ष कथावाचक और रंगकर्मी पंडित राधेश्याम

कथामर्मज्ञ

कृष्ण प्रताप सिंह

रामकथा के गायन, वाचन या मंचन से आप किसी भी रूप में जुड़े हुए हैं तो पंडित राधेश्याम कथावाचक का नाम आपने जरूर सुना होगा। लेकिन क्या यह भी जानते हैं कि 25 नवम्बर, 1890 को उत्तर प्रदेश में बरेली के बिहारीपुर गली कामारथियान मोहल्ले में पिता पंडित बांकेलाल के कच्चे, खपरैल व छप्परों वाले घर में उनका जन्म हुआ तो  भयानक गरीबी के दिन थे। कई बार तो चूल्हा जलने की भी नौबत नहीं आती थी। पौत्री शारदा भार्गव बताती हैं कि बाबा के होश सम्भालने तक कमोबेश यही स्थिति रही। एक बार बाबा को भजन गाने के एवज में अठन्नी मिली  तो उसी से एक वक्त के भोजन की व्यवस्था हुई। छुटपन में गरीबी के इतने दारुण दाह झेलने वाले राधेश्याम पर बाद में लक्ष्मी व सरस्वती दोनों ने जी भरकर नजर-ए-इनायत की। 1907-08 तक वयस्क होते-होते हिन्दी, उर्दू, अवधी और ब्रजभाषा के प्रचलित शब्दों के सहारे अपनी खास गायन शैली में उन्होंने जो 'राधेश्याम रामायण' रची, वह शहरी-कस्बाई व ग्रामीण धार्मिक लोगों में इतनी लोकप्रिय हुई कि उनके जीवनकाल में ही उसकी हिन्दी-उर्दू में कुल मिलाकर पौने दो करोड़ से ज्यादा प्रतियां छप व बिक चुकी थीं। उनके निधन के पचास वर्षों बाद भी यह सिलसिला थमा नहीं है। बाद में उन्होंने 'कृष्णायन', 'महाभारत', 'शिवचरित' और  'रुक्मिणी मंगल' वगैरह की भी रचना की। यह बात और है कि उन्हें वैसी लोकप्रियता नहीं प्राप्त हो पायी। रामकथा वाचन की उनकी विशिष्ट शैली का प्रताप तो ऐसा था कि पंडित मोतीलाल नेहरू ने अपनी पत्नी स्वरूपरानी की बीमारी के दिनों में पत्र लिखकर उन्हें 'आनंद भवन' बुलाया, चालीस दिनों तक कथा सुनी और बेशकीमती भेंटें आदि देकर विदा किया था। तब नन्ही विजयलक्ष्मी  पंडित उनसे प्राय: रोज ही भजन सुनती थीं-माया तेरी अपार भगवन, माया तेरी अपार! उनके प्रशंसकों में पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी थे, जिन्होंने राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित कर उनसे पंद्रह दिनों तक रामकथा का रसास्वादन किया। एक समय उनसे अभिभूत नेपाल नरेश ने उन्हें अपने सिंहासन से ऊंचे आसन, स्वर्णमुद्राओं की कई थैलियों और चार बाल्टियों में  भरे चांदी के सिक्कों के साथ 'कीर्तन कलानिधि' की उपाधि दी थी। 'साहित्यवाचस्पति' और 'कथाशिरोमणि' जैसी उपाधियां भी उनके पास थीं।  अलवर नरेश ने महारानी के साथ उनकी कथा सुनी तो एक स्मृति पट्टिका प्रदान की, जिस पर लिखा था-समय समय पर भेजते संतों को श्रीराम, वाल्मीकि तुलसी हुए, तुलसी राधेश्याम! रावलपिंडी में तो उन्होंने बिना माइक के पचास हजार लोगों की भीड़ को शांत व एकाग्र रखकर कथा सुनाने का करिश्मा कर दिखाया था। 1922 में लाहौर में हुए विश्व धर्म सम्मेलन का श्रीगणेश पंडित राधेश्याम के गाये मंगलाचरण से हुआ और बौद्धगुरु दलाईलामा ने दुशाला, तलवार व वस्त्रादि भेंट करके उनका सम्मान किया था। संभवत: इसी साल लाहौर में ही हिंदी साहित्य सम्मेलन के बारहवें अधिवेशन में 'वर्तमान नाटक तथा बायस्कोप कंपनियों द्वारा हिंदी प्रचार' विषय पर अपना बहुचर्चित व्याख्यान दिया था। लाहौर की एक सड़क को उनके नाम पर 'राधेश्याम कथावाचक मार्ग' कहा जाता था। हालांकि कथावाचक भर कहने से रामायण से लेकर पारसी शैली के नाटकों की रचना व मंचन करने वाले उनके बहुआयामी रचनाकार के व्यक्तित्व का पूरा परिचय नहीं मिलता। वे पारसी रंगमंच के शीर्षपुरुष थे  तो स्वतंत्रता, भाषायी स्वाभिमान, स्त्री सुधार व स्त्री शिक्षा आदि से जुड़ी तत्कालीन चेतनाओं के प्रतिनिधि भी। नारायण प्रसाद 'बेताब' व आगाहश्र 'कश्मीरी' के साथ वे पारसी रंगमंच की उस त्रयी में शामिल थे, जिसने अंधविश्वासों, पाखंडों, कुरुचियों, कुरीतियों व रूढिय़ों के खिलाफ अपने श्रोताओं, पाठकों व दर्शकों का मानस बनाने में अविस्मरणीय योगदान दिया । उनके पास देशभर में दर्शकों, श्रोताओं व पाठकों का ऐसा बड़ा वर्ग था  जो सीधे जनता से आता और सीधा संवाद स्थापित करता था। उनके गृहनगर बरेली में आर्य समाज के अनाथालय में उनके नाटक होते तो केवल 'माउथ पब्लिसिटी' की जाती थी और बिना किसी विज्ञापन के भरपूर दर्शक जुट जाते थे। उनसे कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। उनके प्रमुख नाटकों में वीर अभिमन्यु -1915,  श्रवणकुमार -1916,  परमभक्त प्रह्लाद -1917 परिवर्तन -1917, श्रीकृष्ण अवतार -1926,  रुक्मिणी मंगल -1927, मशरिकी हूर -1927,  महर्षि वाल्मीकि -1939,  देवर्षि नारद -1961,  उद्धार  और  आजादी शामिल हैं। इनमें अन्तिम दो, जिनकी वे पांडुलिपियां छोड़ गये थे, अभी तक अप्रकाशित हैं। कहते हैं कि प्रख्यात गायक व अभिनेता मास्टर फिदा हुसैन 'नरसी' को नाटकों की दुनिया में राधेश्याम जी ही  लाये। एक  दौर में 'वीर अभिमन्यु' में भैरोंसिंह शेखावत ने, जो बाद में  उपराष्ट्रपति बने, अभिमन्यु की और कर्पूरचंद्र कुलिश ने, जो 'राजस्थान पत्रिका' के संस्थापक-संपादक होने के नाते जाने जाते हैं, उत्तरा व द्रोणाचार्य की दोहरी भूमिका निभाई थी। राधेश्याम जी ने कुछ फिल्मों के लिए भी अपनी सेवाएं दी हैं। 'महारानी लक्ष्मीबाई' और 'कृष्ण-सुदामा' फिल्मों के गीत उनके ही लिखे हैंं। महामना मदनमोहन मालवीय उनके गुरु थे  तो पृथ्वीराज कपूर अभिन्न मित्र, जबकि घनश्यामदास बिड़ला भक्त! गांधी जी को अफसोस था कि वे दूसरे कार्यभारों के चलते न पंडित राधेश्याम की कथा सुन पाये और न नाटक ही देख पाये। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु धन जुटाने मालवीय जी बरेली आए तो राधेश्याम जी ने उनको अपनी साल भर की कमाई दे दी थी। 26 अगस्त, 1963 को इस संसार को अलविदा कहने से पहले उन्होंने 'मेरा नाटककाल' नाम से अपनी आत्मकथा भी लिख डाली थी, जिसे अब पारसी रंगमंच की विकास यात्रा बयान करने वाला ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है। दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में रंग प्रशिक्षार्थियों को उसका अध्ययन कराया जाता है। जाने-माने समीक्षक मधुरेश ने हाल में ही उन पर एक मूल्यांकनपरक पुस्तक लिखी तो 'संदर्श' के संपादक सुधीर विद्यार्थी ने पत्रिका की एक पुस्तिका 'पंडित राधेश्याम कथावाचक : कुछ जीवन, कुछ रंग' नाम से छापी है।

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