शिक्षा की अहमियत

स्कूल में पहला दिन

विजय अंगरीश कुछ यादें ताउम्र साथ रहती हैं। उनमें स्कूल के दिन सबसे निराले होते हैं। मुझे अपने स्कूल के सब दिन तो याद नहीं लेकिन जिस दिन पहली बार स्कूल गई, आज भी वो दिन याद है। स्कूल ही नहीं ट्यूशन का पहला दिन भी खास जगह रखता है मेरे लिए। मेरे लिए ट्यूशन क्लास भी कम नहीं थी। बात लगभग 40 साल पुरानी है। आज तो लड़कियों को स्कूल भेजना, उन्हें पढ़ाना हर तबके में अनिवार्य माना जाता है, लेकिन मेरे स्कूल के वक्त में लड़कियां इससे अछूती रहती थीं। कारण पैसे की तंगी हो या तंग सोच। यह दिन मेरे लिए इसलिये भी विशेष क्योंकि मेरे पिता जी, मेरी सरोज मैडम और पीपल का पेड़ आज भी मेरे जेहन की यादों में ताज़ा हैं। पाकिस्तान और पंजाब वाला मेरा परिवार नया-नया दिल्ली आया था। लोगों ने पिता जी को काफी मना किया कि लड़की को स्कूल न भेजो। यहां तक कि करीबी रिश्तेदारों ने भी दबाव डाला। मेरे पिता कुछ अलग ही सोच रखते थे। उनका मानना था कि लड़कियां को लड़कों जैसी उच्च शिक्षा मिलनी चाहिए। पिता जी ने किसी की नहीं सुनी और मुझे दिल्ली के किशनगंज में सरकारी स्कूल में दाखिल करवा दिया। मेरे पहले स्कूल की पहली मैडम जिन्होंनेे हमें पांच साल तक पढ़ाया वो भी खास थीं। नाम था सरोज मैडम। वो पढ़ाई के लिए मारती भी थीं, हौसला अफज़ाई के लिए पुचकारती भी थीं और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी करती थीं। आज भी याद हैं सरोज मैडम। पहले दिन आंसुओं से लाल थी मेरी आंखें। उन्होंने मुझे पुचकारा और गोद में बिठाए रखा दिनभर। एडमिशन लेने के बाद स्कूल नहीं गई। पिता जी कहते तो मैं कहती नहीं जाउंगी, वहां मैडम मारती है। मेरी झूठी बात को माता-पिता सच मान लेते और मैं स्कूल जाने से बच जाती। लेकिन ये सिलसिला दो-चार दिन ही चला। इस बात से मां तो खुश थी कि चलो लड़की नहीं पढ़ेगी, पर पिता जी सख्त नाराज़ थे। कुछ दिन बाद कहा कि मैं तुम्हें स्कूल छोड़कर आउंगा, टीचर से बात करूंगा और क्लास में साथ रहूंगा। मेरा भोला मन खुश हो गया कि वे साथ चलेंगे। लेकिन मैं झूठी तब पड़ी जब सरोज मैडम घर आ गईं। उन्होंने कहा कि बेबी नहीं स्कूल आई तो मैं उसे लेने आई हूं। इसके बाद पिताजी ने मुझे घर के पास पीपल वाले पेड़ के नीचे चलने वाले एक ट्यूशन स्कूल में भी एडमिशन दिलवा दिया। उनकी चाहत थी कि लड़की को और अच्छी शिक्षा मिले। उस दौर में पढ़ाई के लिए माता-पिता की सोच और कोशिशें सभी लोग सोच भी नहीं सकते थे। बाद में उन्हीं की बदौलत मैने एमए और बीएड की डिग्री हासिल की।

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