व्यापक परिप्रेक्ष्य में जीवन के सरोकार

प्रेम चंद विज

वरिष्ठ कवि, आलोचक डॉ. हरमहेन्द्र सिंह बेदी रचित ‘एकान्त में शब्द’ उनका नवीनतम काव्य-संग्रह है। अभी तक वे हिंदी साहित्य को सात कविता संग्रह दे चुके हैं। संग्रह में 44 कविताएं हैं। इनमें प्रकृति, प्रेम, नारी चेतना परिवार, व्यवस्था की विसंगतियों और मानवीय संबंधों को परिभाषित किया है। नारी ने शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के पश्चात अपनी स्थिति और परिस्थिति को बदला है। वे अर्थहीन मान्यताओं का त्याग करते हुये प्रगति पथ पर चल रही हैं। वे किसी भी साहूकार के इशारे पर काम नहीं करतीं बल्कि अपने बनाये रास्तों पर चलती हैं। यही भावावेग कविता ‘वे अब नहीं तोड़ती पत्थर’ में व्यक्त किये गए हैं। ‘वह अब नहीं तोड़ती पत्थर/वह अब तोड़ती है अंधविश्वासों के दुर्ग/बनाती है चट्टानों का जरा-जरा/मथती है समुद्र को बूंद बूंद’। घर की याद को ‘देवगीत’ कविता में बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जब व्यक्ति बहुत दिनों के बाद लौट रहा होता है तो उसकी व्याग्रता को अनुभूति मिलती है। घर की याद उसके उस पवित्र स्थान की तरह है, जिसके समक्ष उसका अपना व्यक्तित्व ‘देवगीत’ बनकर सामने आ जाता है। ‘देवगीत’ कविता में यही स्मरण मिलता है। ‘उल्लास से भरा/घर लौटता आदमी/देवगीत गाता है/सब की खैर मनाता है/उसके शब्दकोष में केवल/घर, पत्नी, बेटा/अर्थबोध ही जीवित रहता है।’ जीवन में गति का बहुत महत्व है। मंजिल या गंतव्य का किसी को मालूम नहीं। सभी इस दुनिया के रंगमंच पर अपनी भूमिका निभा रही है। इन सबके प्रश्न, जिज्ञासा, उत्तर, निरुत्तर की यात्रा जारी है। यही एहसास ‘जाना कहां’ कविता में मिला है। ‘कोई नहीं जानता/बस निरन्तरता में घूमता है/पृथ्वी की तरह दिन भर/इधर-उधर सब कहीं/जाना कहां है/नहीं मालूम अभी तक/न ठहरने का पता/न चलने का/बस अपने ही ईद-गिर्द मंडराते हैं।’ हमारे बुजुर्ग अपनी भावी पीढ़ी को शिक्षा, अनुशासन, व्यवहार की मर्यादा, ऊंचे लक्ष्य जैसे वरदान देना चाहते हैं। ‘पांच सितारों वाला जन्मदिन’ कविता में इसी बात का प्रमाण मिलता है। ‘सुनहरे पलों की दास्तां/हम हर रोज करेंगे तेरे नाम/तुम हो रोशन कारवां हमारा/‘रसजाप’ तुहारा नाम/इसी नाम के साथ/शुभ वरदान पांच/पढ़ो लिखो आगे बढ़ो।’ ‘बुद्धम‍् शरणम‍् गच्छामी’ एक महत्वपूर्ण कविता है, जिसमें लंबी कविता के भी गुण हैं। यह मनुष्य को आगे बढ़ने का साहस प्रदान करती है। अपनी परिस्थितियों में जीते हुये अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिये प्रेरित करती है। ग्रंथों में प्रदान ज्ञान से अनभिज्ञ होकर कविता का नायक अपने ही कर्म में लीन रहता है। कुल मिलाकर इन कविताओं में जिंदगी और समाज के सरोकारों को व्यापक परिपेक्ष में देखा गया है। पुस्तक : एकान्त में शब्द कवि : डॉ. हरमहेन्द्र सिंह बेदी प्रकाशक : आस्था प्रकाशन, लाडोवाली रोड, जालंधर, पंजाब पृष्ठ : 87 मूल्य : रु. 260.

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