व्यवसायीकरण रोकना होगा और परंपरागत जल-स्रोत बचाने होंगे

वीणा भाटिया

पृथ्वी की सतह का 70 फीसदी भाग पानी से भरा है। लेकिन इसमें से सिर्फ 2 फीसदी ही हमारे उपयोग के लायक है। काफी जल बर्फ के रूप में जमा हुआ है। नदियों, तालाबों और झरनों से मिलने वाला जल महज एक प्रतिशत है। लगातार बढ़ते प्रदूषण के कारण इनका उपयोग करना भी खतरे से खाली नहीं रह गया है। हमारे उपयोग करने लायक जल-भंडार में लगातार कमी आ रही है। यह कमी पूरी दुनिया में हुई है। नदियों में बढ़ता प्रदूषण मानव-सभ्यता के लिए खतरे की घंटी है। अगर इस खतरे को समय रहते नहीं समझा गया और जल-स्रोतों को प्रदूषण से बचाने के प्रयास नहीं किये गये तो आने वाले समय में मनुष्य के साथ ही तमाम जीव-जंतुओं के अस्तित्व को नष्ट होने से बचा पाना कठिन हो जाएगा। जल एक ऐसा प्राकृतिक संसाधन है, जो जीवन के लिए हवा के बाद सबसे जरूरी है। उल्लेखनीय है कि पानी की कमी की समस्या पूरी दुनिया में उत्पन्न हो गई है। इसका एक बड़ा कारण आधुनिक उद्योग-धंधों में पानी का बेशुमार उपयोग किया जाना है, दूसरे इन उद्योगों से बड़े पैमाने पर जो कचरा निकलता है, उसे नदियों में बहा दिया जाता है, जिससे उनका पानी प्रदूषित हो जाता है और उपयोग के लायक नहीं रहता। पानी की इस कमी से पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर पेयजल के व्यापार का तंत्र खड़ा हो गया है। जो पानी प्रकृति प्रदत्त और सबके लिए सुलभ है, उसे मुनाफे का जरिया बना लिया गया है। शुद्ध पेयजल की कमी और अनुपलब्धता के कारण ही आज हर बड़े-छोटे शहरों में पानी का व्यवसाय फल-फूल रहा है। पानी का एक बड़ा स्रोत भू-जल के रूप में उपलब्ध है। दुनिया भर में करीब 28 प्रतिशत खेतों की सिंचाई इसी जल-स्रोत से होती है, लेकिन अब यह जल-स्रोत भी खतरे में है। दुनिया में हर जगह भू-जल का स्तर गिरता जा रहा है। भारत में केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट में ऐसे कई इलाकों का उल्लेख किया गया है, जहां भू-जल का स्तर पिछले 20 वर्षों में चार मीटर से भी ज्यादा नीचे चला गया है और यह बढ़ता जा रहा है। कहा गया है कि प्रति वर्ष इसका स्तर 20 सेंटीमीटर से अधिक नीचे जा रहा है। ऐसा भू-जल के अत्यधिक दोहन से हो रहा है। खेतों की सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता के लिए बड़े पैमाने पर बहुत ही गहरे बोरवेल लगाए जा रहे हैं, जिनसे काफी मात्रा में पानी का दोहन किया जाता है। यही नहीं, पानी का व्यवसाय करने वाले भी अवैध तरीके से गहरे बोरवेल लगाते हैं और जम कर पानी का दोहन करते हैं। दूसरी तरफ, अब पहले की तरह वर्षा का जल धरती के अंदर नहीं जा पाता, क्योंकि बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई की गई है। रोज हो रहे आधुनिक निर्माणों के चलते भी वर्षा का जल धरती के अंदर नहीं जा पाता है। बड़े से लेकर छोटे शहरों में भी खुली मिट्टी वाली जगहें नहीं के बराबर रह गई हैं। दूसरे, जलवायु-परिवर्तन के कारण हर जगह बारिश भी पहले की तुलना में कम हो रही है। भू-जल की कमी वैसे तो देश के हर क्षेत्र में हुई है। जहां तक दिल्ली का सवाल है तो यहां 5 इलाके विशेष रूप से चिह्नित किए गए हैं। ये हैं केंद्रीय दिल्ली, उत्तर-पश्चिमी दिल्ली, दक्षिणी दिल्ली, दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली और पश्चिमी दिल्ली। इसी प्रकार, हरियाणा के कई इलाकों में भू-जल के अत्यधिक दोहन से इसमें भारी कमी आई है। इससे आने वाले दिनों में पेयजल का संकट बढ़ सकता है, क्योंकि अब पेयजल के लिए प्रमुख स्रोत भू-जल ही रह गया है। देश के दूसरे हिस्सों में भी पानी की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है। पेयजल और सिंचाई के लिए जल, दोनों की कमी बनी हुई है। भू-जल का स्तर लगातार नीचे चले जाने के कारण हर साल किसानों को अपने कुओं को और भी गहरा खुदवाना पड़ता है। गांवों में परंपरागत कुएं, तालाब, पोखर, जोहड़ आदि सूख गए हैं और उनका अस्तित्व मिटता जा रहा है। भू-जल का स्तर नीचे चले जाने के कारण अब हैंडपंप से भी उन्हें पानी नहीं मिल पाता। बहुत गहराई तक बोरवेल खुदवाने के लिए उन्हें बड़ी मशीनों का सहारा लेना पड़ता है, जिसके लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं, पर इससे भी समस्या का समाधान नहीं होता, क्योंकि कुछ ही समय में जल का स्तर और नीचे चला जाता है। जहां तक पारिवारिक जरूरत के लिए पानी की उपलब्धता का सवाल है, कहा जाता है कि एक औसत परिवार को रोज कम से कम 200 लीटर पानी की जरूरत होती है, लेकिन जहां अमीर लोग हजारों लीटर पानी खर्च कर देते हैं, वहीं गरीबों को बहुत ही कम पानी से गुजारा करना पड़ता है। बड़े शहरों में जहां पानी की बहुत कमी है, उन्हें निजी टैंकरों से पानी खरीदना पड़ता है। यह पानी दो तरह का होता है। एक घरेलू कामों के लिए और दूसरा पीने के लिए। कॉलोनियों में जब भी पानी के ये टैंकर आते हैं, लोग पानी खरीदने कैन और दूसरे बर्तन लेकर दौड़ पड़ते हैं। सुबह-शाम पानी बेचने वाले टैंकर मोहल्लों और गलियों में आवाज लगाते देखे जा सकते हैं। ये जल व्यवसायी गहरे बोरवेल से भू-जल का दोहन करते हैं। कुछ साल पहले पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इस तरह से भू-जल के दोहन पर रोक लगा दी थी, जिसका परिणाम हुआ कि हरियाणा के शहरों में पानी के लिए लोग तड़पने लगे। देश की तमाम नदियों में प्रदूषण इस हद तक बढ़ चुका है कि उनका जल पीने क्या, किसी भी उपयोग के लायक नहीं रह गया है। इससे समझा जा सकता है कि जल-संकट कितना गहरा है और यह कितने स्तरों पर है। इसका कोई आसान समाधान नहीं है। जब तक पर्यावरण-सुरक्षा के उपायों को नहीं अपनाया जाएगा, बड़ी संख्या में पेड़ नहीं लगाए जाएंगे और जंगल का क्षेत्र नहीं बढ़ाया जाएगा, जल-संकट गहराता ही जाएगा। इसे दूर करने के लिए परंपरागत जल-स्रोतों को प्रदूषण-मुक्त करने के साथ उनका संरक्षण करना होगा।

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