वोटतराशों पर भारी पड़ते जेबतराश

तिरछी नज़र

पीयूष पांडे

मैं जेबकतरों के पेशेवर रवैये का मुरीद कॉलेज के दिनों से हूं। कॉलेज के दिनों में दिल्ली में पहाड़गंज से जनकपुरी जाते वक्त डीटीसी की बस में मेरी जेब कटी। लेकिन भाई ने रकम के अलावा कॉलेज के आईकार्ड समेत बाकी सब कागज-पत्तर डाक से वापस भेज दिए। मैंने मन ही मन जेबकतरे को धन्यवाद दिया। लेकिन ये बात करीब 25 साल पुरानी है। मुझे लगा था कि इस दौर में जब राजनीति का स्तर गिर गया, रुपये का मूल्य गिर गया, चरित्र का सेंसेक्स गिर गया, जेबकतरों के पेशेवर रवैये में भी भारी गिरावट आई होगी। लेकिन दिल्ली के जेबकतरों ने एक बार फिर ऐसा कारनामा किया, जिससे मेरे मन में उनके प्रति सम्मान बढ़ गया है। दिल्ली के जेबकतरों ने स्वर्गीय अरुण जेटली के अंतिम संस्कार में मंत्री-संतरी समेत एक दर्जन लोगों के मोबाइल उड़ा दिए। इतनी भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच जेबकतरों ने अगर जेबतराशी का साहस किया तो संदेश कई हैं। पहला, जेबकतरों के लिए कर्म ही पूजा है। वे विवाह समारोह से लेकर अंतिम संस्कार तक सब जगह एक ही मनोभाव से काम करते हैं। दूसरा, एक्स-वाई-जेड टाइप की तमाम सुरक्षा व्यवस्था का कोई मतलब नहीं है। इस देश में बंदे सिर्फ भगवान भरोसे हैं। तीसरा, जो मंत्री अपनी जेब में रखा मोबाइल नहीं बचा सकता, वो संकटकाल में कुर्सी क्या बचाएगा? इस घटना के जरिए जेबकतरों ने तीसरा और अहम संदेश यह दिया कि मोबाइल को मोबाइल की तरह इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि एक जेबतराशी तुम्हारे तमाम ‘कांड’ ब्रह्मांड में चुटकियों में प्रसारित कर सकती है। पॉकेटमारी आसान काम नहीं है। देश में कहीं किसी यूनिवर्सिटी में पॉकेटमारी का कोई कोर्स नहीं है। डिग्री तो बहुत दूर की बात है, सर्टिफिकेट कोर्स तक नहीं। बंदे को अपना हुनर खुद तराशना पड़ता है। इस तराशा-तराशी में करियर के शुरुआती दौर में भीड़ ट्रेनी पॉकेटमार का सर तराश देती है। फिर, आजकल पॉकेटमारी पहले सरीखा चोखा धंधा नहीं रहा। पहले लोग जेब में ही खासी नकदी लेकर चलते थे। आजकल कैशलैस का जमाना है। डिजिटल इंडिया का जमाना है। इस मुश्किल वक्त में दिल्ली के जेबकतरों का साहस और समर्पण नयी उम्मीद पैदा करता है। बहुत संभव हो कि चंडीगढ़, बठिंडा, शिमला, कुल्लू जैसे तमाम शहरों के जेबकतरे भी दिल्ली के जेबकतरों जैसे ही पेशेवर हों। लेकिन ऐसा न हो तो उन्हें दिल्ली की पॉकेटमार एसोसिएशन से संपर्क साध कुछ जेबकतरों को डेपुटेशन पर अपने शहर बुलाना चाहिए। दिल्ली के पॉकेटमार इन शहरों में युवा पॉकेटमारों की वर्कशॉप भी ले सकते हैं। कुल मिलाकर दिल्ली के जेबकतरों से देश के तमाम जेबकतरों को सीखने की जरूरत है। वैसे, सच ये भी है कि कई पुराने जेबतराश आजकल वोटतराश बन चुके हैं।

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