वैदिक गणित अंकों से सीखें खेलना

सुभाष चन्द्र

वैदिक मैथ्स को उदाहरण के रूप में आप ऐसे समझें। 1 गुणे नौ 171 होता है। एकबारगी आपको यह गलत लगेगा। चौंकिए नहीं। हम समझाते हैं वैदिक गणित के आधार पर। आपको पता होना चाहिए कि वैदिक गणित में सिर्फ नौ तक का पहाड़ा ही याद करने की जरूरत है। 1 गुणे नौ के लिए वैदिक गणित का सूत्र बताता है कि 1 अंक 10 और योग है। इसलिए 1 को दो भागों में बांटिए। पहले भाग में 10 गुणे बराबर 0, दूसरे भाग में गुणे बराबर 81, दोनों को जोड़ दीजिए तो 171 होगा। शून्य और दशमलव तो भारत की देन हैं ही, कहते हैं कि यूनानी गणितज्ञ पाइथागोरस का प्रमेय भी भारत में पहले से ज्ञात था। लेकिन, यह ज्ञान समय की धूल के नीचे दबता गया। उसे झाड़-पोंछ कर फिर से निकाला पुरी के शंकराचार्य रहे स्वामी भारती कृष्णतीर्थजी महाराज ने 1911 से 1918 के बीच। बता दें कि गोवर्धन पुरी के परम पावन जगद‍्गुरु शंकराचार्य श्री भारतीकृष्णतीर्थ जी महाराज ने वैदिक गणित या वेदों के सोलह सरल गणितीय सूत्र नाम का ग्रन्थ लिखा है। यह ग्रंथ आधुनिक पश्चिमी पद्धति से बिलकुल अलग पद्धति का अनुसरण करता है। इसमें यह बताया गया है कि प्राचीन भारतीय पद्धति एवं उसकी गुप्त प्रक्रियाएं गणित की विभिन्न समस्याओं को हल करने की क्षमता रखती हैं। इसमें कहा गया है कि जिस ब्रह्माण्ड में हम रहते हैं, उसकी रचना मैथेमेटिकली है तथा गणितीय माप यानी मैथेमेटिकल मेज़रमेंट और संबंधों में व्यक्त नियमों का अनुसरण करती है। इस ग्रंथ के चालीस अध्यायों में गणित के सभी कोटेंस, पार्ट, डिविज़न, इक्वेशन और फंक्शन का समावेश हो गया है। साथ ही उनसे संबंधित सभी प्रश्नों को स्पष्ट रूप से समझाकर आसान तरीके यानी सिंपलेस्ट प्रोसेस प्रक्रिया से हल किया गया है। सोलह फॉर्मूले हैं जिन पर यह आधारित है, अथर्ववेद के परिशिष्ट में आते हैं।

वैदिक गणित के 16 सूत्र वैदिक गणित में मूल रूप से 16 सूत्र हैं। वैदिक गणित, गणित सीखने की पुरानी विधा है। यह गणित को हल करने का सबसे सरल उपाय है। भारत में कम ही लोग जानते हैं कि वैदिक गणित नाम का भी कोई गणित है। जो जानते भी हैं, वे इसे विवादास्पद मानते हैं कि वेदों में किसी अलग गणना प्रणाली का उल्लेख है। पर विदेशों में बहुत-से लोग मानने लगे हैं कि भारत की प्राचीन वैदिक विधि से गणित के हिसाब लगाने में न केवल मजा आता है बल्कि उससे आत्मविश्वास मिलता है और स्मरण शक्ति भी बढ़ती है। मन ही मन हिसाब लगाने की यह विधि भारत के स्कूलों में शायद ही पढ़ाई जाती है। मौजूदा दौर में बहुत से स्कूलों में हालत यह है कि बच्चों को जोड़, घटाना, गुणा, भाग जैसे मामूली सवालों को हल करने में दिक्कत होती है। इसलिए आठवीं तक के बच्चों को इसके बारे में अपडेट किया जाता हैे। शिक्षाविदों का कहना है कि अभी मैकाले, अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के कोर्स इतने मुश्किल और उबाऊ हैं कि बच्चों में गणित पढ़ने के प्रति रुचि तो दूर की बात, डर बना रहता है, लिहाजा वे गणित में फिसड्डी होते जा रहे हैं। वैदिक गणित से बच्चों की न केवल गणितीय प्रतिभा विकसित होगी, बल्कि उनकी रुचि भी बढ़ेगी। उदाहरण के लिए मान लें कि हमें 889 में 998 का गुणा करना है। प्रचलित विधि में इसमें समय लगेगा। लेकिन वैदिक गणित में ऐसे करेंगे- दोनों का सबसे नजदीकी पूर्णांक एक हजार है। उन्हें एक हजार में से घटाने पर मिले 2 और 111 अंक । इन दोनों का गुणा करेंगे तो मिलेंगे 222 अंक । अपने मन में इसे दाहिनी ओर लिखें। अब 889 में से उस दो को घटा दें। जो 998 को एक हजार बनाने के लिए जोड़ना पड़ा। मिला 887 अंक । इसे मन में 222 के पहले बाईं ओर लिखें। यही, यानी 887222, सही गुणनफल है।

अभी प्रचार-प्रसार की ज़रूरत वर्तमान में समय का महत्व बढ़ गया है तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में सवालों को हल करने की ऐसी तकनीक की आवश्यकता है जो जल्द हल निकाले तथा विद्यार्थियों से लेकर प्रतिभागियों को तनाव मुक्त रख सके। उबाऊ तरीकों से गणना करने में समय व कागज तीनों की बर्बादी है। कई संस्थाओं ने केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारों से मांग की है कि वैदिक गणित का सरकारी स्तर पर भी प्रचार-प्रसार हो। कई राज्यों में ट्रायल के दौर पर वैदिक गणित की कक्षाओं की शुरुआत की गई है।

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