विश्वसनीय खरीद व मूल्य व्यवस्था की जरूरत

यह समय ऐसा है, जहां एक ओर भारत का कृषि क्षेत्र गहरे संत्रास से जूझ रहा है तो वहीं विश्व भूख-सूचकांक सूची में दर्ज कुल 120 देशों में भारत 102वें स्थान पर है, तिस पर तुर्रा यह कि देश के खाद्यान्न भंडार फटने की कगार पर हैं क्योंकि जुलाई, वर्ष 2019 के आंकड़ों के मुताबिक सरकारी गोदामों में 7.21 करोड़ टन गेहूं-चावल ठुंसा पड़ा है और जुलाई, 2020 तक इसमें 1 करोड़ टन और खाद्यान्न जुड़ जाएंगे, जिससे यह कुल मात्रा रिकॉर्ड 8.47 करोड़ टन तक पहुंच जाएगी। इसका मतलब कि हमारे आधिकारिक अन्न भंडारों में जुलाई 2020 में सुरक्षित रखने योग्य अन्न की मात्रा में 4.63 करोड़ टन खाद्यान्न फालतू होगा। लिहाजा केंद्र सरकार को पंजाब, हरियाणा और अन्य ज्यादा उत्पादन करने वाले राज्यों से और अधिक खरीद न करने को कहना पड़ा है। जहां एक तरफ प्रधानमंत्री कार्यालय अन्न पर दी जाने वाली सब्सिडी का बोझ लगातार घटाने पर जोर दे रहा है, शायद इसलिए ताकि अगले साल के स्टॉक में जुड़ने वाला व्यय घटाया जा सके, वहीं दूसरी तरफ ‘लागत एवं मूल्य निर्धारण आयोग’ उस ‘मुक्त-छोर खरीद नीति’ की पुनः समीक्षा की बात कह रहा है, जिसके अंतर्गत बाजार में बेचने योग्य अतिरिक्त गेहूं और चावल उत्पादक किसान मंडी में लाते हैं और सरकार इनको न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने को प्रतिबद्ध है। हो सकता है सरकारी खरीद की मात्रा की ऊपरी सीमा तय करके उक्त आयोग निजी क्षेत्र को मंडियों से खाद्यान्न की सीधी खरीद करने की अनुमति देने की सलाह दे रहा है। कृषि उत्पाद मंडी कमेटी कानून में आखिरी मर्तबा वर्ष 2006 में बदलाव किया था, जिसके तहत निजी कंपनियों को सीधे किसानों से फसल खरीदने की अनुमति दी गई थी, लेकिन इसके नतीजे में हमारा देश विश्वभर में सबसे ज्यादा गेहूं आयात करने वाला मुल्क बन गया था। हुआ यह कि निजी व्यापारियों ने तुरंत मौका भुनाते हुए बड़े पैमाने पर खाद्यान्न की खरीद तो कर ली, लेकिन कितनी मात्रा में कहां भण्डारण किया है, इसको नहीं बताया था। नतीजतन ऐसे साल में जब फसल उत्पादन में कोई प्रत्यक्ष कमी नहीं देखी गई थी, उस वर्ष सरकारी खरीद की दर कम रही थी। लिहाजा वर्ष 2007-08 में जनवितरण के अंतर्गत दिए जाने वाले खाद्यान्न की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को 55 लाख टन गेहूं आयात करना पड़ा था, वह भी उस कीमत से दोगुने दाम पर जो स्थानीय किसानों की फसल का लगाया गया था। उस वक्त भारत की विशाल गेहूं आपूर्ति जरूरतों की खबर लगते ही अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तुरंत इजाफा हो गया था। इससे काफी विवाद था और उस वक्त विपक्ष में रही भाजपा ने मामले की सीबीआई जांच करवाने की मांग की थी। इसे ‘गेहूं आयात घोटाला’ ठहराया था। लिहाजा कृषि उत्पाद मंडी कमेटियों को दरकिनार कर गेहूं-चावल की खरीद सीधे किसानों से करने की अनुमति निजी क्षेत्र को देने के अपने खतरे भी निहित हैं। किसी भी सूरत में कोई भी सरकार देश की आपातकालीन खाद्य सुरक्षा जरूरतों को सुनिश्चित करने को नजरअंदाज नहीं कर सकती है और उसे अकाल या अन्य देखी-अनदेखी स्थितियों के लिए यथेष्ट मात्रा में खाद्यान्न का भण्डारण करना ही पड़ता है। लेकिन फालतू अन्न का क्या किया जाए? फिर जब देश में इतनी बड़ी संख्या में भूखे पेट लोग मौजूद हैं, तब इसका सदुपयोग न करना क्या खाद्य-प्रबंधन में कमी को नहीं दर्शाता है? वर्ष 2006 में जब पहली बार विश्व भूख-सूचकांक रिपोर्ट जारी हुई थी, उस वक्त भी कुल 119 देशों में भारत शोचनीय 96वें स्थान पर था। अनेक अध्ययन दर्शाते हैं कि ग्रामीण भारत में (और शहरी इलाकों में भी) लोगों की अपनी खुराक संबंधी खर्च करने की समर्था में लगातार कमी आती जा रही है। उपभोक्ता व्यय सर्वे की लीक हो चुकी रिपोर्ट में साफ बताया गया है कि कैसे देश के ग्रामीण अंचल में परिवारों के खुराक व्यय में वर्ष 2011-12 से लेकर 2017-18 के बीच लगातार 10 प्रतिशत की कमी होती गई है। इसलिए भण्डारों में पड़े फालतू खाद्यान्न का इस्तेमाल प्रभावशाली ढंग से करके देश की बड़ी जनसंख्या की पौष्टिकता संबंधी कमी की भरपाई की जा सकती है। यहां मैं ‘लागत एवं मूल्य आयोग’ की उस सिफारिश की ताईद करता हूं, जिसमें कहा गया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत अन्‍त्‍योदय अन्‍न योजना या इस जैसी जनभलाई योजनाओं के लिए अतिरिक्त अन्न की मात्रा जारी की जानी चाहिए। ‘मुक्त-छोर खरीद’ व्यवस्था को खत्म करने के मुद्दे पर यहां समझने की जरूरत है कि बेशक वर्तमान न्यूनतम समर्थन मूल्य वाला समीकरण खेती की लागत तक को पूरा करने में नाकाफी है, फिर भी यह एक ‘तयशुदा वायदा-कीमत’ तो सुनिश्चित करता ही है। किसान के लिए यह ‘वायदा-भाव’ और ‘वायदा-खरीद’ उन्हें मंडी व्यापारियों की बेलागम मनमर्जी से कुछ हद तक सुरक्षा देते हैं। इसीलिए किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की मांग अक्सर किया करते हैं। फिलहाल दीगर आर्थिक माहिरों पर कृषि उत्पाद विपणन मंडी कमेटी (एपीएमसी) आधारित व्यवस्था को भंग करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य वाली प्रणाली को हटाने की सोच हावी हो गई है। विश्व बैंक भी लगातार यही कहता आया है और विश्व व्यापार संगठन ने तो जनता के लिए रखे जाने वाले अन्न भण्डारण के औचित्य पर ही सवाल खड़े किए हैं, यहां तक कि कुछ आर्थिक सर्वेक्षणों और मुख्यधारा के आर्थिक विशेषज्ञ लगातार कहते आए हैं कि आधिकारिक फसल मूल्य निर्धारित करना उस राह में अड़चन में बनता है, जिसे ये लोग ‘प्राइस डिस्कवरी’ कहते हैं। अलबत्ता किसी बाजार दखलअंदाजी से अगर ‘प्राइस डिस्कवरी’ की जा सकती है तो वह खुद न्यूनतम समर्थन मूल्य ही है, बशर्ते इसे ढंग से दिया जा सके। ऐसे देश में जहां केवल 6 प्रतिशत किसानों को ही न्यूनतम समर्थन मूल्य का फायदा मिलता हो, वहां मंडी व्यवस्था शेष 94 प्रतिशत कृषकों को बेहतर मूल्य देने में बुरी तरह नाकामयाब सिद्ध हुई है, लिहाजा यह तौर-तरीका इस तथाकथित ‘प्राइस डिस्कवरी’ की मददगार ज्यादा है। किसानों को फसल का बेहतर मूल्य दिलवाने में ‘ई-नैम्स’ (इलैक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्किट सिस्टम) नामक व्यवस्था लागू करने का प्रयास भी विफल रहा है।

देविंदर शर्मा

इसलिए हम लोगों के लिए खरीद व्यवस्था को मजबूत करना ही उत्तर है। गेहूं-चावल की ऊपरी खरीद सीमा को निर्धारित करने के सिलसिले में व्यक्तिगत अथवा जिला स्तर पर तय की जाने वाली कोटा व्यवस्था पर अमल करने की बजाय वैकल्पिक फसलों की खरीद के लिए एक प्रभावशाली खरीद-तंत्र बैठाने की जरूरत है। उदाहरणार्थ गेहूं की देशव्यापी खरीद में पंजाब के मौजूदा हिस्से को 37.1 प्रतिशत से घटाकर इसकी जगह दूसरी फसलें जैसे कि बाजरा, ज्वार, दालें और तिलहन इत्यादि की खरीद पहले करना सुनिश्चित किया जाए। किसानों को हालांकि अहसास है कि अन्य फसलों की ओर जाने की जरूरत है, लेकिन एक विश्वसनीय खरीद एवं मूल्य व्यवस्था के अभाव में वे वर्तमान ढर्रे से निकलने को तैयार नहीं हैं। किसानों को एक व्यवहार्य विकल्प दिया जाए, बाकी काम वह खुद कर लेंगे। लेकिन दूसरी ओर ‘वायदा-खरीद’ और ‘वायदा-मूल्य’ वाली व्यवस्था जिसे डॉ. एमएस स्वामीनाथन ने एक बार ‘अकाल से बचने’ का दोहरी रणनीति कहा था-इसको योजनागत ढंग से खत्म करने वाले कदम का गंभीर राजनीतिक नतीजा होगा।

लेखक खाद्य एवं कृषि विशेषज्ञ हैं।

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