वाह अन्ना जी!

गोविंद शर्मा स्वर्ग में किसी स्थान पर। गांधी जी बेचैनी से इधर उधर टहल रहे हैं। ऐसा प्राय: होता रहा है। गांधी जी जब भी नीचे धरती की तरफ झांकते, बेचैन हो जाते, खासकर भारत नाम के देश पर नजर पडऩे पर। लेकिन यह बेचैनी क्षणिक होती। बा उन्हें याद दिला देती हैं कि अब वे स्वर्ग में हैं। यहां आत्मा को बेचैन करना मना है। पर आज तो हद हो गई। बेचैनी दूर हो ही नहीं रही थी। आखिर बा ने पूछ ही लिया—आज ऐसा क्या देख लिया? आपको कितनी बार कहा है कि यह आईपीएल हमारे लिये नहीं है। हमें तो बीपीएल को देखना है। गांधी जी बेचैनी से इधर-उधर घूमते हुए बड़बड़ाने लगे—मुझे यह क्यों नहीं सूझा? मैं अन्ना से ज्यादा पढ़ा-लिखा था। मैंने दुनिया के कई देशों की यात्रा की थी। फिर भी अन्ना मेरे से आगे क्यों निकल गया? गुरु गुड़ ही क्यों रह गया, चेला शक्कर क्यों हो गया? 'हुआ क्या?' 'मुझे यह पहले सूझता तो मैं भी ऐसा ही करता। खुद आमरण अनशन करना छोड़कर नेहरू-पटेल से करवाता। खुद दूर बैठकर उनकी मॉनीटरिंग करता। दोनों भूल जाते प्रधानमंत्री पद को। किसी तरह जिन्ना को भूख हड़ताल पर बैठा देता। वह पाकिस्तान बनाने की बात छोड़ देता। पर अब पछताने के सिवा क्या हो सकता है। अन्ना के व्रतों ने दो चार मंत्रियों से इस्तीफे ही लिये, मेरे व्रतों ने ताकतवर अंग्रेजों को भारत से भगा दिया था, फि र भी आज अन्ना मेरे से आगे निकल गया।' हां, अन्ना के नये दांव से पैदा हुई बेचैनी। उन्होंने फै सला किया कि अब व्रत करेंगे टीम अन्ना के केजरीवाल और सिसोदिया। अन्ना वहां मौजूद रहेंगे, खाना खाएंगे, कुल्ला करेंगे, हाथ धोएंगे, डकार मारेंगे और केजरीवाल-सिसोदिया ग्लूकोज लेंगे चम्मच दो चम्मच। अब तक के ये बयान-वीर चुपचाप गले में पड़ी फू लमाला सूंघेंगे। अन्ना बयान देंगे। अन्ना फ्र ी होंगे। बाबा रामदेव जैसों से यारी निभाने के लिए उन्हें फ्र ी हैंड मिल जायेगा। चमक उठेगा आंदोलन स्थल। क्योंकि वहां केजरीवाल होंगे जंतर, सिसोदिया होंगे मंतर और अन्ना होंगे स्वतंत्र। यह भी अच्छा हुआ कि अन्ना ने दो को एकसाथ अनशन पर बैठाने का निर्णय लिया। टीम बड़ी है। एक-एक कर बैठते तो सबकी बारी पता नहीं कब आती। इस जोड़ी के बाद किरण बेदी और प्रशांत भूषण को बैठाया जा सकता है। अब यदि किसी उग्रवेश को टीम से निकालना हुआ तो जासूसी-गद्दारी आदि के आरोप थमाने की जरूरत नहीं होगी, शायद व्रत का फरमान जारी करना कारगर साबित होगा। दूसरे भी इससे प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। बाबा रामदेव को दुनिया भर के योगासन आते हैं, पर भूखासन और धरनासन में कुछ कमजोर साबित हुए। अब यह काम खुद करने की जरूरत ही नहीं। इसके लिए चार-पांच योगियों की ड्यूटी लगा दी जाए। वे अनशन करें और धरना भी दें। इन्हें भूखासन की बजाय अनशनासन और स्थिरासन कहा जा सकता है या किसी संस्कृतज्ञ से नामकरण संस्कार करवाया जा सकता है। स्वयं बाबा जनता को जगाते फि रें या टीवी पर प्रकट होकर न्यूज सुनने वालों को जगाएं। हंसोड़ बाबा भी डुप्लीकेटों का सहारा लेकर अज्ञातवास से बाहर आ सकते हैं। सरकार का विरोध करने वालों के खिलाफ मनमोहन सिंह कहां बोलते हैं। यह काम खुर्शीद, मनीष आदि के हवाले कर रखा है। यही काम अन्ना ने किया। बहुत दिन हो गये बड़बड़ाते, चीखते चिल्लाते, सरकार, सांसदों को बुरा बताते, अब थोड़ा अनशन का स्वाद चखो टीम अन्ना जी। पेट साफ हो जायेगा, आत्मा शुद्ध। लोकपाल तो पता नहीं कब बनेगा, अभी सरकार राज्यपाल बनाने में व्यस्त है। पर आंदोलन के इस नये रूप का हाल... जैसा कि मैंने एक बार सोचा—मुक्केबाज बनूंगा। प्रशिक्षक से बात की तो मामूली फीस पर सौ पाठों के द्वारा मुक्केबाज बनाने का वायदा किया। पहले पाठ के रूप में मुंह पर कोच का घंूसा पड़ा तो मैंने पाठ बदलने के लिए क हा यानी शेष निन्यानवे पाठ डाक द्वारा भेजने को कहकर अखाड़े से बाहर आ गया था। गांधी जी की आत्मा चाहे बेचैन रहे, पर अभी तो वाह अन्ना जी!

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