वायरोलॉजिस्ट बन संवारे करियर

हाल ही में वायरोलोजिस्ट मीनल ने देश को मायलैब नाम की कोरोना टेस्ट किट बनाई तो वह सुर्खियों में आ गई। साथ ही वायरोलॉजी टर्म की तरफ भी लोगों का ध्यान गया। अब जानते हैं कि आखिर वायरोलॉजी क्या है और यह कैसे काम करती है....दरअसल वायरोलॉजी भी विज्ञान की ही एक शाखा है, जिसमें वायरस के स्ट्रक्चर, फंक्शन और इससे फैलने वाली संक्रामक बीमारियों की स्टडी की जाती है। वायरस से लड़ाई पिछले 10 सालों में सार्स, मर्स, जीका और अब कोविड-19 यानी कोरोना जैसे मामले लगातार सामने आ रहे हैं। जानकारों की मानें, तो आने वाले दिनों में दुनिया में नए-नए वायरस और बैक्टीरिया के और भी मामले सामने आ सकते हैं, जो पशु-पक्षियों से इंसान में आएंगे। इसके लिए बड़ी संख्या में वायरोलॉजिस्ट यानी विषाणुविज्ञानियों और बायोमेडिकल इंजीनियर्स की ज़रूरत पड़ेगी, जो लाइफ साइंस और इंजीनियरिंग के बीच किसी पुल की तरह कार्य करते हैं, जो नई-नई एंटी माइक्रोब्रियल दवाएं और मेडिकल रिसर्च को आसान बनाने के लिए उपकरणों, प्रणालियों तथा प्रक्रियाओं को विकसित करते हैं। वायरोलॉजिस्ट के रूप में कोरोना वायरस के चलते इन दिनों वायरोलॉजी का फील्ड चर्चा में है। ऐसे में साइंस पढ़ने वाले युवाओं की इस विषय में रुचि बढ़ती देखी जा रही है। यह माइक्रोबायोलॉजी से जुड़ा हुआ ही फील्ड है। इसके जानकारों को वायरोलॉजिस्ट कहते हैं, जो मुख्य रूप से वायरोलॉजी लैब्स में सेवाएं देते हैं। इसके अलावा वे यूनिवर्सिटीज़ में टीचिंग और रिसर्च कार्य करते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी रिसर्च सेंटर में भी ऐसे प्रोफेशनल्स की भारी मांग है। केंद्र सरकार ने ताज़ा संकट को देखते हुए अब इस तरह की और लैब बनाने की दिशा में पहल शुरू कर दी है। देशभर में ज्यादा संख्या में लैब खुलने से वायरोलॉजिस्ट के रूप में करियर की संभावनाएं बढ़ने की उम्मीद भी इसी से बढ़ी है। क्या करते हैं वायरोलॉजिस्ट का काम इंडस्ट्री रिसर्च भी है। नई-नई दवाएं विकसित करने के लिए फॉर्मा कंपनियां भी इनकी सेवाएं लेती हैं। ऐसे प्रोफेशनल्स हॉस्पिटल, मेडिकल कॉलेज, मेडिकल रिसर्च कंपनीज, फॉर्मा कंपनीज़, गवर्नमेंट एजेंसीज, लैब टेस्टिंग कंपनी, रिसर्च कंपनीज में जॉब तलाश सकते हैं। अपना क्लीनिक खोल सकते हैं। वायरोलॉजी में करियर बनाने के लिए बायोलॉजी या माइक्रोबायोलॉजी पृष्ठभूमि का होना आवश्यक है यानी कैंडिडेट के पास 10वीं- 12वीं कक्षा में बायोलॉजी विषय रहा हो। इसी विषय से आपकी ग्रेजुएशन, मास्टर या पीएचडी भी होनी चाहिए। शैक्षणिक योग्यता बायोमेडिकल इंजीनियरिंग के चार वर्षीय कोर्स के अंतर्गत ही जेनेटिक्स, बायोकेमिस्ट्री, बायोप्रॉसेस इंजीनियरिंग के अलावा माइक्रोबायोलॉजी, इम्यूनोलॉजी, वायरोलॉजी और केमिकल रिएक्शन जैसे विषयों के बारे में भी पढ़ाया जाता है। आप वायरोलॉजी एक्सपर्ट और इंजीनियर के रूप में अपना करियर शुरू कर सकते हैं। इस पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए न्यूनतम योग्यता भौतिक, रसायन विज्ञान और गणित विषयों में बारहवीं पास होना होगा। चौथे विषय के रूप में बायोलॉजी अनिवार्य है। बायोमेडिकल इंजीनियर नई तकनीक के आ जाने से इन दिनों देश-विदेश के हेल्थ एक्सपर्ट तकनीक की सहायता से भी मरीजों का इलाज कर रहे हैं। इसके लिए उन्हें बायोमेडिकल इंजीनियर्स और मेडिकल साइंटिस्ट की ज़रूरत पड़ रही है। बायोमेडिकल इंजीनियर मेडिकल प्रोफेशनल्स से अलग होते हैं। ये खुद उपचार नहीं करते हैं, बल्कि डायगनॉज़ और उपचार के साधन तैयार करते हैं। ये मेडिकल रिसर्च को आसान बनाने के लिए उपकरणों, प्रणालियों तथा प्रक्रियाओं को विकसित करते हैं। फार्मास्युटिकल्स कंपनियों के रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट विभाग में भी इनके लिये काफी संभावनाएं हैं।

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