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भगवद‍्गीता : द्वितीय अध्याय में धर्म का स्वरूप

लीना मेहेंदले गीता का प्रसंग क्या है, यह इतिहास सर्वविदित है। संजय के वर्णन से हमें ज्ञात होता है कि कौरवों के सेनापति व सबके पितामह भीष्म के शंखनाद से उत्साह में भरकर अर्जुन भी शंखध्वनि करते हैं। और अत्यंत अधीरता से दोनों सेनाओं को देखने हेतु श्रीकृष्ण से निवेदन करते हैं कि रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले चलें। मैं देखूं तो सही कि मुझे जीतकर दुर्योधन का प्रिय करने की इच्छा से यहां कौन-कौन आया है। लेकिन, वही अर्जुन क्षण मात्र में ही यह देखकर गलित गात्र हो जाते हैं कि दोनों ओर तो मुझे अपने गुरु, पूजनीय एवं संबंधी ही दिख रहे हैं। यदि युद्ध में ये ही मारे जाने वाले हैं, तो हम युद्ध जीत कर भी क्या पा लेंगे? स्वजनों के मोह में अर्जुन ऐसा डूबते हैं कि पृथ्वी अथवा स्वर्ग का राज्य भी उन्हें नहीं चाहिए, वरन‍् शत्रु के हाथों मारा जाना भी चलेगा, परंतु युद्ध नहीं करूंगा, ऐसी उनकी मनःस्थिति हो जाती है। कई बार कुछ संशयात्मा प्रश्न उठाते हैं कि क्या धर्म का विवेचन युद्धभूमि पर किया जा सकता है और वह भी इतने विस्तार से? क्या वह उचित समय है? मेरे विचार में यह शंका अनुचित है। युद्ध ऐसी घटना है जिसके विषय में अविवेकी को अधिक विचार नहीं करना पड़ता। केवल विवेकशील व्यक्ति ही उसे टालने के विषय में सोचता है। वह पांडवों ने भी किया था और जब हर प्रयास के बावजूद यह पाया कि युद्ध को नहीं टाला जा सकता, तब वे युद्ध में उतरने को विवश हुए। अर्थात‍् विवेक व विचार को आजमाने का समय बीत चुका था और अब अटल हो चले युद्ध को लड़ने का समय आ चुका था। उस क्षण युद्ध में पूरी एकाग्रता से उतरना ही धर्म था। वही करने के लिए अर्जुन को समझाना आवश्यक था कि किसी दूरस्थ भविष्य की संभावना पर विचार अवश्य करो, परंतु जब कर्म का क्षण सम्मुख उपस्थित हो जाए, तो उस क्षण द्वारा व्याख्यायित कर्म को करना ही धर्म है। निर्णायक काल में मीनमेख करना धर्म नहीं है। लेकिन, श्रीकृष्ण को तत्काल यह भान भी हो जाता है कि अर्जुन का अवसाद अत्यंत गहरा है। उसे धर्म का पूरा रूप समग्रता से समझाए बिना धर्म चैतन्य का उदय नहीं होगा। इसी कारण पहले झटके में इसे डांट फटकार लगाते हुए भले ही कृष्ण ने उसकी शंका को अकीर्तिकर या क्लैब्य कहा हो, भले ही उसे हृदय की दुर्बलता त्यागकर ‘उत्तिष्ठ’ का आदेश दिया हो, पर कृष्ण ने जान लिया कि यह जो अपना दोष छुपाने के लिए बड़ी-बड़ी प्रज्ञा की बातें कर रहा है, उसे तर्क शुद्धता से धर्म का सही स्वरूप समझाना होगा। उसे बताना होगा कि वह जिस धर्म का बखान कर रहा है, सच्चा धर्म उससे कुछ अलग ही है। आगे चौथे अध्याय में श्री कृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा बताई है- धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे। इसलिए भी आवश्यक है कि अर्जुन के सम्मुख धर्म का पूरा ही विवेचन रखा जाए, आधा-अधूरा रखने पर अर्जुन भी स्वीकार नहीं करेगा। किसी से आज्ञापालन करवाना और किसी के मन की गहराई में अपनी बात उतारना, ताकि वह उसे आत्मसात करे, दोनों में अंतर है। आज्ञा हो तो संशय की स्थिति बनी रहती है। लेकिन युद्ध विजय के लिए अर्जुन के अंतर्मन तक यह स्पष्टता से पहुंचाना होगा कि धर्म क्या है और उस क्षण युद्ध करना ही धर्म है। इसीलिए इतना विस्तार और वह भी उसी क्षण, वहीं पर दोनों सेनाओं के मध्य में अर्जुन को समझाने हेतु आवश्यक था। गीता का दूसरा अध्याय सांख्य योग धर्म संबंधी कई सूत्र बताता है। श्रीकृष्ण ने प्रथमतः धर्म का तत्व कहा कि विगत और अनागत दोनों क्षणों का विचार और उनका शोक छोड़कर वर्तमान क्षण को निभाओ। जो भूतकाल में घट गया और जो अभी तक भविष्य के कोहरे में है, दोनों के विषय में सोचना पंडिताई नहीं है, धर्म नहीं है। हे अर्जुन, जिस धर्मसंकल्पना के आधार से तुम इस युद्ध को अधर्म कह रहे हो, वह संकल्पना ही गलत है। युद्ध करना या न करना, स्वजनों की हत्या करना या न करना, इससे धर्म का निर्णय नहीं होता, वरन‍् सम्मुख उपस्थित क्षण द्वारा व्याख्यायित कर्म करना ही धर्म है। यहां एकत्रित हुए योद्धाओं को मारने वाले तुम कौन है? जो आघात-प्रत्याघात होने वाले हैं, वे शरीर के साथ होने वाले हैं, आत्मा तो अविनाशी है। आत्मा अपने देह रूपी वस्त्र को उसी प्रकार बदलती रहती है, जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र को त्यागकर नए अपनाता है। भूतकाल में ऐसा कोई भी समय नहीं हुआ, जब मैं या तुम नहीं थे और भविष्य में भी कभी ऐसा समय नहीं आएगा। आत्मा की इस अविनाशिता को तुम धर्म जानो। आगे श्रीकृष्ण ने धर्म की सारभूत तीन बातें कहीं- पहली यह कि मनुष्य सुख-दुःख, लाभालाभ या जय-पराजय को स्थिर बुद्धि से देखे, क्योंकि ये सारे केवल शरीर के व्यापार हैं, आत्मा के नहीं। श्रीकृष्ण ने मात्रास्पर्श शब्द का प्रयोग किया है। सुख-दुःख आदि मानसिक भावों से इंद्रियों में जो विभ्रम होते हैं, वह मात्रास्पर्श हैं, अनित्य हैं, क्षणिक हैं, इसलिए हे अर्जुन, उनकी तितिक्षा करना सीखो और उनके प्रति समत्व बुद्धि रखो। तभी तुम्हारी बुद्धि स्थिर रहेगी। स्थितप्रज्ञ की व्याख्या में श्रीकृष्ण कहते हैं- नाभिनंदति न द्वेष्टि। अर्थात‍् शरीर में उठने वाले मात्रास्पर्श से जो आनंदित भी नहीं होता और उद्वेलित भी नहीं होता, वह स्थितप्रज्ञ है और स्थितप्रज्ञता ही धर्म है। सुख-दुःख या लाभालाभ की भावना मनुष्य में क्यों आती है? क्योंकि वह जब कर्म करता है, तब उसके फल की इच्छा भी रखता है। परंतु इच्छित फल की प्राप्ति अथवा अप्राप्ति होते ही, वह सुख या दुख का अनुभव करता है। इसलिए हे अर्जुन, तू केवल कर्म पर अपना अधिकार मान, परंतु कर्मफल को अपना अधिकार मत समझ। तभी तू सुख और दुख के प्रति स्थिर बुद्धि रख पाएगा। परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि तू कर्म के प्रति उदासीन और अकुशल हो जाए। कर्म को पूरी श्रद्धा और पूरी कुशलता से करना, यही धर्म है, यही योग है। अपने कर्मों को कुशलता से करो, उत्कृष्ट कर्म करो। अच्छा फल मिले, उत्तम से उत्तम फल मिले, इसके लिए प्रयत्नपूर्वक व स्वाध्यायपूर्वक कर्म करो, यही धर्म है। बस इतना ध्यान रहे कि फल के प्रति तुम्हें निष्काम भाव रखना है। फल जैसा भी है, उसे प्रसन्न मन और स्थिर बुद्धि से स्वीकारना है। उत्तम कर्म, निष्काम कर्म और फल को निष्काम भाव से स्वीकारने के लिए ज्ञान की आवश्यकता है, अभ्यास और वैराग्य की आवश्यकता है। इनके साधन-वर्णन के बिना धर्मचिंतन पूरा नहीं होगा। उसी को अगले अध्यायों में समझाया है।

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