लड्डू की मिठास

राजबीर वर्मा

बात बहुत पुरानी है। जब मुझे विद्यालय में भेजा गया तो उस समय मेरी उम्र लगभग 6 साल की थी। इसके दो कारण थे। एक तो मैं घर पर बहुत लाडला था, दूसरा उन दिनों स्कूल में मास्टर जी के बैंत से बच्चे बहुत डरते थे। अप्रैल 1959 में मेरे परिवार ने मुझे स्कूल में दाखिल करवाने के बारे में सोचा, जिसे अगस्त में अंजाम दिया गया। पहली बार अगस्त 1959 में मैं स्कूल गया। मेरी मां ने सुबह मेरी पीठ पर तख्ती और बस्ता टांग कर ढेर सारी हिदायतें दी। आखिर में कहा कि अगर तुमने एक भी बात नहीं मानी तो मास्टर जी की बैंत से पिटवाऊंगी। डरते-डरते दूसरे बच्चों के साथ ही पहले दिन मैं स्कूल गया था। प्रार्थना के बाद मुख्याध्यापक ने छोटे बच्चों को एक पंक्ति में खड़ा कर दिया। उन्होंने एक-एक ईंट सबको पकड़ने के लिये कहा। दरअसल उन दिनों स्कूल में एक बड़े हॉल का निर्माण कार्य चल रहा था, जिसके लिये मिस्त्री तक ये ईंटें पहुंचानी थी। मेरे काम को देखकर मास्टर जी ने मुझे गोद में उठा लिया। वे बोले-अरे पहलवान, क्या आप 2 ईंटे एक साथ उठा सकते हो? मैने हां कह दी। बड़ी कोशिशों के बावजूद मैं ईंटें नहीं उठा पाया तोे सारे बच्चे हंसने लगे। इसके बाद मास्टर जी ने हम सब बच्चों को 2-2 लड्डू खाने को दिये। मैंने एक लड्डू खा लिया और एक घर में मां को देने के लिये लाया। मैंने मां से कहा कि तुम तो कहती थी कि मास्टर जी बैंत से मारते हैं। वे तो लड्डू भी देते हैं और पहलवान भी कहते हैं। यह सुनकर मां हंस दी। बाद में किस्मत की बदौलत मैं इसी स्कूल में प्राध्यापक रहा। जितनेे साल भी रहा, जानें कितनी बार मुझे उन लड्डुओं की मिठास का अहसास होता रहा। वह स्वाद मुझे आज भी याद है।

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