रेलवे को निजीकरण नहीं, सरकार की मदद की जरूरत

जाहिद खान अपने दूसरे बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने परिवहन अवसंरचना परियोजनाओं के लिए 103 लाख करोड़ रुपये मुहैया कराने का प्रस्ताव रखा है। इन नयी परियोजनाओं में आवसीय, साफ पेयजल, स्वच्छ ऊर्जा, स्वास्थ्य, आधुनिक रेलवे, एयरपोर्ट, मेट्रो बस, लॉजिस्टिक्स शामिल हैं। वित्त मंत्री का कहना था कि ‘नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन’ (एनआईपी) से नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार होगा और इससे बड़े स्तर पर रोजगार के नये मौके तैयार होंगे। रेलवे को आधुनिक बनाने का सरकार का वादा कैसे पूरा होगा और इसके लिए बजट में क्या प्रावधान हैं? यदि इसे जाने, तो इस साल रेल बजट पिछले साल 69,967 करोड़ रुपये के मुकाबले 72,216 करोड़ रुपये रखा गया है। यानी पिछले साल के मुुकाबले 5 फीसदी भी बढ़ोतरी नहीं की गई है। जाहिर है कि इतने बजट में भारतीय रेल कितना आधुनिक बनेगी यह सवालों के घेरे में है। वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में रेलवे के लिए प्रमुख घोषणाएं करते हुए कहा कि स्टेशनों का पुनर्विकास किया जाएगा। रेलवे के स्वामित्व वाली जमीन पर पटरियों के साथ-साथ एक बड़ी सौर ऊर्जा चालित क्षमता स्थापित की जाएगी। अभूतपूर्व डिजाइनों के साथ रेलवे ट्रैक पर और ज्यादा ट्रेनें दोड़ेंगी। रेलेवे स्टेशनों को हाईटेक बनाया जाएगा। इसके लिए 550 रेलवे स्टेशनों पर वाई-फाई सुविधा दी जाएगी। किसानों के नाम पर रेल मंत्रालय ‘किसान रेल’ नाम से एक नयी ट्रेन चलाएगा। यह रेल, फल और सब्जी जैसे जल्दी खराब होने वाले कृषि उत्पादों की ढुलाई के लिये होगी। किसान रेल में इन उत्पादों को रेफ्रिजरेटेड डिब्बों में ले जाने की सुविधा होगी। 27 हजार किलोमीटर रेलवे ट्रैक का विद्युतीकरण किया जाएगा। 148 किलोमीटर बेंगलूरू ऊपनगरीय ट्रेन सिस्टम बनेगा। जिसके लिए केंद्र सरकार, अपनी ओर से 25 फीसदी पैसा देगी। यही नहीं मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड ट्रेन (बुलेट ट्रेन) का काम आगे बढ़ाया जाएगा। इन सब परियोजनाओं और उपायों पर सरकार तकरीबन 18 हजार 600 करोड़ रुपये खर्च करेगी। रेल बजट की इन घोषणाओं के अलावा बाकी पहलुओं पर यदि गौर करें तो सरकार ने रेलवे में निजी निवेश को बढ़ावा दिया है। सरकार ने बजट में नयी ट्रेनों के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल की बात की है। इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए, सरकार ने घोषणा की है कि वह आने वाले दिनों में 150 ट्रेनें पीपीपी मॉडल पर चलेंगी। पिछले साल तेजस ट्रेन की शुरुआत हो गई है। तेजस ट्रेनों की संख्या और बढ़ाई जाएंगी। ट्रेनों के अलावा रेलवे स्टेशनों का भी विकास पीपीपी माॅडल के तहत होगा। जिसमें देश के चार बड़े स्टेशनों को निजी क्षेत्र की मदद से पुनः विकसित किया जाएगा। किसान रेल भी पीपीपी के तहत चलेगी। सार्वजनिक क्षेत्र के इस सबसे बड़े उपक्रम का निजीकरण किसी के गले नहीं उतरता, जबकि जरूरत ऐसे विजन और योजनाओं की थी, जो रेलवे आय के लीकेज बंद करतीं। रेलवे का राजस्व पहले के मुकाबले और बढ़ता। कहने को रेलवे परिवहन में सरकारी एकाधिकार है। यात्री और माल यातायात पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ा है। बावजूद इसके सरकार का कहना है कि यात्री मद में रेलवे को 55 हजार करोड़ रुपये का सालाना घाटा हो रहा है। यह घाटा क्यों हो रहा है, समस्या की असल जड़ क्या है?, सरकार इस पर ध्यान देती, इसके उलट वह हर समस्या का समाधान निजीकरण में खोज रही है। भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्क में से एक है। बजट में इसे लेकर जो घोषणाएं होती हैं, वे काफी अहमियत रखती हैं। देशवासियों का इन पर ध्यान रहता है। खास तौर पर इसलिए कि उनके क्षेत्र को कौन-सी नयी ट्रेनें मिलीं?, टेªन किराए में कितनी कमी हुई और कितना इजाफा हुआ?, रेलवे भाड़े में कितनी बढ़ोतरी हुई? लेकिन पिछले कुछ बजट से लगातार यह देखा जा रहा है कि सरकार ने इस परिपाटी को बिल्कुल तोड़ दिया है। इस बजट में भी न तो नयी ट्रेन शुरू करने का ऐलान हुआ और न ही विशेष ट्रेनों की दूरी बढ़ाने की बात हुई। किराया बढ़ाने-घटाने का जहां तक सवाल है, अब सरकार बजट का इंतजार नहीं करती। जब उसे मौका मिलता है, वह अचानक किराया बढ़ा देती है। इसे लेकर कुछ दिन सुगबुगाहट होती है, और फिर जनता इसे स्वीकार कर लेती है। पिछले साल की आखिरी त्रैमासिकी में ही सरकार ने रेलवे के किरायों में इजाफा किया था। पहले की बनिस्बत रेलवे भाडे़ में भी काफी बढ़ोतरी हुई है। रेलवे को घाटे से उबारने और उसे आधुनिक बनाने के लिए एक बड़े बजट की जरूरत है। रेल मंत्रालय ने सरकार से एक लाख करोड़ बजटीय सहायता की मांग की थी, लेकिन उसकी इस मांग पर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। जाहिर है, जब बजट ही नहीं होगा तो यात्रियों की सुविधाएं कैसे बढ़ेंगी? बुनियादी सुविधाओं का किस तरह से विस्तार होगा? देश के चारों और रेलवे के विकास के लिए जो क्षेत्र रेलवे लाइनों से नहीं जुड़े हैं, उन्हें जोड़ने की जरूरत तो है ही, जहां टेªेन कम हैं, वहां नयी ट्रेनें भी चलाई जानी चाहिए। सरकार ने बजट में हालांकि स्टेशनों और ट्रेनों की साफ-सफाई की बात की है और उसका कहना है कि वह इस पहलु पर खास ध्यान देगी। लेकिन हर मर्ज की तरह, उसने इस मर्ज का इलाज भी पीपापी माॅडल में ही ढ़ूढ़ा है। उसका कहना है कि इस मसले को प्राइवेट कंपनियों के साथ मिलकर सुधारा जाएगा। सच बात तो यह है कि रेलवे का इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारने और उसे विस्तार देने के लिए, बजट में और भी गंभीर प्रयासों की जरूरत थी, जो इस बजट में कहीं नजर नहीं आए। ट्रेन और रेलवे स्टेशनों की सुरक्षा के लिए हर जगह सीसीटीवी कैमरे लगाना मुश्किल काम नहीं है। बजट में इसके लिए खास प्रावधान रखा जाना चाहिए था, लेकिन सरकार का इस पर कोई ध्यान नहीं है। रेलवे के बेहतर परिचालन के लिए कर्मचारियों की जरूरत है, लेकिन रेलवे में फिलहाल 3 लाख से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। जिसमें भी रेल सुरक्षाकर्मियों की एक लाख 62 हजार रिक्तियां हैं। यह पद कब भरे जाएंगे ?, इसका कोई आश्वासन बजट में नहीं है। एक अहम बात और अनेक ट्रेनों में सामान्य दर्जे के कोचों की संख्या आज भी बेहद कम हैं। जबकि निम्न वर्ग की आबादी को देखते हुए और आम आदमी के सुविधा के लिहाज से इन डिब्बों में अब तो इजाफा होना ही चाहिए।

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