राष्ट्रीय सोच का साथ देता है उत्तराखंड का वोटर

देहरादून, 6 मई  (निस) उत्तराखण्ड राज्य में क्या हरीश रावत कांग्रेस की डूबती नैया को बचा पाने में सफल हो पायेंगे, यह सवाल लाख टके का हो गया है। क्योंकि रावत के इतनी मेहनत करने के बावजूद पार्टी में चुनाव के दौरान शामिल किये गये, कांग्रेस के बागी नेता न तो संगठन के नेताओं से सामंजस्य ही बैठा पाये और न ही स्थापित नेताओं से। वहीं, दूसरी ओर भाजपा में भी अंदरूनी खींचतान तो जरूर नज़र आ रही है, लेकिन मोदी के नाम पर भाजपाइयों की दिखावटी एकता भाजपा को प्रदेश में कांग्रेस के खिलाफ मजबूत भी कर रही है।  वहीं, यह बात काबिलेगौर है कि उत्तराखण्ड का जनमानस  हमेशा राष्ट्रीय राजनीति के साथ कदमताल मिलाकर चलते रहे हैं। 2009 में भी इसी कारण पहाड़ी राज्य के लोगों ने पांचों सीटें कांगे्रस की झोली में डाल दी थीं। उल्लेखनीय है कि लोकसभा चुनाव की रणभेरी बजने के बाद प्रदेश में कांग्रेस व भाजपा नेताओं में वो अफरा-तफरी मची कि अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर किसी नेता ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामा तो किसी ने भाजपा छोड़ कांग्रेस का। यह सिलसिला काफी समय तक प्रदेश में इस चुनाव के दौरान देखने को मिला, जहां कांग्रेस छोड़ भाजपा की शरण में सतपाल महाराज गये तो वहीं कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष रामशरण नौटियाल जैसे लोग भी कांग्रेस से भाजपा में चले गये लेकिन भाजपा से कुछ छुटभैये नेताओं को छोड़ कोई कद्दावर नेता कांग्रेस की नाव में सवार नहीं हुआ। हां, कांग्रेस के ही कुछ बागी जरूर कांग्रेस में लौट आये जो पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस से बागी बनकर कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़कर भाजपा को लाभ दिला गये थे। अब यही नेता इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के सामने परेशानी का सबब बन कर एक बार फिर खड़े हो गये हैं। कांग्रेस के ही लोगों का कहना है कि इनके पुन: कांग्रेस में शामिल होने पर न तो ये कांग्रेस के खांटी नेताओं का ही विश्वास अर्जित कर पाये और न ही इन नेताओं पर ऐसे नेताओं को विश्वास रहा। यही कारण रहा कि खांटी नेता इनके पुन: प्रवेश से नाराज तक नजर आये। वहीं, लोकसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों का चयन भी प्रमुख नुकसानदेह माना जा रहा है। कांग्रेस के सूत्रों का कहना है यदि रेणुका रावत व प्रदीप टम्टा को छोड़ दिया जाये तो प्रदेश में भ्रष्टाचार का पर्याय रहे विजय बहुगुणा के पुत्र साकेत बहुगुणा पर तो कांग्रेस खुद ही दो फाड़ नजर आती है। कांग्रेस के कई कद्दावर नेता साकेत को टिकट देने के कारण ही कांग्रेस से भाग खड़े हुए। हां रेणुका रावत को अपने मुख्यमंत्री पति का जरूर लाभ भी मिलता नजर आ रहा है।

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