यूरोप-सा खूबसूरत ताशकंद

अमिताभ स. उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद की सड़कों पर घूमते-फिरते लगता है कि एशियाई नहीं, बल्कि यूरोपीय सिटी में हैं। ट्रैफिक जाम होता नहीं और सड़कों पर पुलिस गश्त लगाती भी नज़र नहीं आती। ताशकंद महज़ एक शहर या पर्यटन स्थल नहीं है बल्कि हम हिन्दुस्तानियों के दिलों में बसी एक याद है। खासकर ताशकंद समझौता, जो भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री तथा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयूब खां की लंबी बातचीत के बाद 10 जनवरी 1966 को हुआ था। लेकिन इसके बाद भारत ने अपने प्रिय नेता और देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को खो दिया था। खैर हिन्दुस्तानियों के लिये ताशकंद हमेशा पर्यटन का पसंदीदा स्थल रहा है। दिल्ली से जाते ही ताशकंद की सड़कों पर चलते-फिरते सुकून मिलता है। एक तो सड़कें खासी चौड़ी हैं और ट्रैफिक न के बराबर है। बाइक-टू व्हीलर और साइकिल तो ढूंढे नहीं दिखते। कारों में शेवरलेट ही छाई है। लेफ्ट हैंड ड्राइव है, वाहन सड़क के दाईं तरफ दौड़ते हैं। अंडरग्रांउड मेट्रो है, पब्लिक बसें हैं और टैक्सियां भी हैं। बसें नान एसी हैं, मिनी बसें भी कई हैं। बस स्टैंडों पर इंतजार करते मुसाफिरों के बैठने की व्यवस्था है और साथ ही जुड़ी एक छोटी-सी दुकान भी है। सड़कों पर घूमते-फिरते लगता है कि किसी यूरोपीय सिटी में हैं। ज्यादातर बिल्डिंगों पर यूरोपीय टच झलकता है। सड़कों पर पैदल चलने वालों की खासी कद्र है। ज़ेबरा क्रॉसिंग की धारियां दिल्ली से बेशक ज़रा जुदा हैं, लेकिन इन पर सड़क पार करते लोगों को हर कार-बस अहमियत देती है। पुलिस गश्त नहीं लगाती, कहीं-कहीं एसी पुलिस बूथ और सामने खड़ी पुलिसिया स्कूटी नज़र आती है। दिल है आमिर तैमूर स्क्वेयर ताशकंद का दिल है आमिर तैमूर स्क्वेयर। साल 1996 में यहां घोड़े पर सवार आमिर तैमूर की भव्य प्रतिमा लगाई गई है। समूचे भूभाग पर आमिर तैमूर की बादशाही रही है, बाद में इसी खानदान के बाबर और अगली पीढ़ियों ने हिन्दुस्तान तक हुकूमत की। खैर, स्क्वेयर के सामने ही ट्विन क्लॉक टॉवर है और उज्बेकिस्तान होटल भी। वहीं से जुड़ती एक सड़क ब्रॉडवे स्ट्रीट मोस्ट हैप्पनिंग प्लेस है। यहां पैदल ही एंजॉय कर सकते हैं। बच्चे-बड़ों के लिए करने के लिए बड़ी मौज-मस्ती है। साइकिल राइड, स्टापू, टॉय ट्रेन, किस्म-किस्म की राइड्स, खेल-करतब क्या-क्या नहीं है। वेज-नॉन वेज फूड के कई स्टॉल हैं-आइसक्रीम तो इस कदर अदाकारी से पेश करते हैं कि खाने वाला हंस-हंस कर लोटपोट हो जाए। शास्त्री स्ट्रीट और उनकी प्रतिमा भारतीय टूरिस्ट्स के लिए खास अट्रेक्शन है ताशकंद की शास्त्री स्ट्रीट और वहीं बगीचे में लगी लाल बहादुर शास्त्री की प्रतिमा। शास्त्री स्ट्रीट करीब 1 किलोमीटर लम्बी है और प्रतिमा के इर्द-गिर्द नमन करते टूरिस्ट्स बढ़-चढ़ कर फोटो खिंचवाते हैं। ऊंचे पेड़ों के झुरमुट के बाग में फूलों की क्यारियां मन मोहती हैं। बेंच लगे हैं, लोग बैठे-टहल कर टाइम पास करते हैं। असल में, जून 1966 में, कश्मीर मुद्दे पर, ताशकंद समझौता करने यहां आए हमारे पूर्व प्रधानमंत्री शास्त्री का आकस्मिक निधन हो गया था। आकर्षण और भी हैं टीवी टॉवर भी अट्रेक्शंस में शुमार है। ऊंचाई करीब 375 मीटर है, बना था 1985 में। ऊपर दो रिवॉल्विंग रेस्टोरेंट्स हैं- एक यूरोपीय फूड, तो दूसरा उज्बेकी फूड परोसता है। रेस्टोरेंट हर एक घंटे में पूरा चक्कर लगाता है, जिससे खाते-पीते समूचे ताशकंद का हवाई नज़ारा बखूबी देखने का मौका मिलता है। झूले से हवाई नज़ारा देखने के लिए ‘नवरोज पार्क’ का रुख कर सकते हैं। करीब 73 मीटर ऊंचा जाइंट वील उज्बेकिस्तान का सबसे ऊंचा झूला है। ‘शहीद लोगों का मैदान’ का अपना रुतबा है। अभी 2000 में ही बन कर तैयार हुआ है। म्यूज़ियम है और बगल में बुसू नदी बहती है। उज्बेकिस्तान की आज़ादी के लिए शहीद हुए हजारों लोगों की कुर्बानी की याद में बनाया गया है। सामने सड़क पार संगमरमर से बनी ‘मीनार मस्जिद’ है। खूबसूरत इतनी कि बाहर और भीतर से देखते ही आंखें फटी की फटी रह जाती हैं। दमक ऐसी कि हाथ लगाते ही मैली होती है। बाहरी-भीतरी नक्काशी और रंगभराई सजावट दंग कर देती है। बड़ी भी खूब है—एक साथ 4000 से 5000 लोग नमाज़ अता कर सकते हैं। ज्यादा पुरानी नहीं है, 2014 में ही बनी है। उधर ‘ओपेरा एंड बैलेट ग्रेंड एकेडेमिक थियेटर’ तो सोवियत संघ के ज़माने से है। आजादी के जश्न को बयां करता ‘इंडपेंडेंस स्क्वेयर’ भी दिलकश बगीचे से घिरा है। साल 1966 में आए जोरदार भूकम्प में मारे गए लोगों की याद में बने ‘मॉन्यूमेंट ऑफ करेज’ भी लोग देखने जाते हैं। सबसे पुरानी मार्केट चौरसू बाजार ‘समरकंद दरवाजा’ सबसे बड़ा शॉपिंग मॉल है। जबकि ओल्ड टाउन स्थित ‘चौरसू बाज़ार’ तो देखने लोग सारी दुनिया से उमड़ते हैं। यही ताशकंद की सबसे पुरानी मार्केट है। किसी ज़माने में, सिल्क रोड पर आने की वजह से चौरसू एशिया की सबसे बड़ी मंडी थी। हर वक्त खचाखच भरी रहती है। यहां फल, सब्जियां, घरेलू साजो-सामान, गहने, जूते-चप्पल, बेकरी, हैंडक्राफ्ट, लोकल ड्रिन्क वगैरह तमाम खरीदारी कर सकते हैं। ‘ओलाए बाजार’ और ‘यूनस आबाद’ नाम का सिटी सेंटर भी शानदार है। फाइव स्टार होटल ‘हयात रेजेंसी’ हालिया सालों में शुरू हुआ है। आइसक्रीम और चॉकलेट से ज्यादा लोग ब्रेड-बन खाने के शौकीन हैं। हर उज्बेकी रेस्टोरेंट और घर के टेबल पर किस्म-किस्म के ब्रेड-बन की टोकरी हरदम सजी रहती है। फल और ड्राईफ्रूट्स भी खूब मिलते हैं। सबसे फेवरेट फल तरबूज़ है। ‘शालीमार’, ‘फ्लेवर्स’ जैसे कई इंडियन रेस्टोरेंट्स हैं, लेकिन ‘ली ग्रेंड होटल’ में ‘राज कपूर’ नाम का रेस्टोरेंट दशकों से लाजवाब इंडियन लंच-डिनर का लोकप्रिय ठिकाना है। ‘मैकडॉनल्डस’, ‘डॉमिनोज’ वगैरह इंटरनेशनल फास्ट फूड आउटलेट्स नहीं हैं, केवल ‘के एफ सी’ है। करंसी : 100 रु. की वैल्यू 12,500 सोम उज्बेकिस्तान की करेंसी सोम है। आजकल एक अमेरिकी डॉलर के बदले करीब 8,560 सोम आते हैं। इस हिसाब से, अपने 100 रुपये वहां करीब 12,500 सोम बन जाते हैं। भारत के मुकाबले मंहगाई कम है। बादाम, किशमिश, अखरोट वगैरह ड्राईफ्रूट्स तो करीब-करीब आधे से भी कम दामों पर मिलते हैं। साढ़े 5 घंटे दूर फ्लाइट से दिल्ली से ताशकंद पहुंचने में करीब साढ़े 5 घंटे लगते हैं। और समय के लिहाज से दिल्ली से आधा घंटा पीछे है। सर्दियों के 3 महीने (दिसम्बर, जनवरी और फरवरी) जम कर बर्फ पड़ती है। मई-जून में तापमान 40 से 42 डिग्री सेल्सियस तक चढ़ जाता है। लेकिन दिल्ली की माफिक पसीना नहीं आता क्योंकि वहां उमस नहीं है। कहां है, कैसा है मध्य एशिया का देश है उज्बेकिस्तान और कैपिटल व सबसे बड़ा शहर ताशकंद है। 1991 तक उज्बेकिस्तान सोवियत संघ का हिस्सा था, अब आजाद देश है। आबादी करीब साढ़े 3 करोड़ है और ताशकंद की करीब 30 लाख। लोकतंत्र है, हर 5 साल में राष्ट्रपति के चुनाव होते हैं। अस्सी फीसदी आबादी मुस्लिम है, बाकी ईसाई और अन्य धर्मों के लोग हैं। नेशनल लेंग्वेज उज्बेक है, रूसी भी समझी-बोली जाती है। ज्यादातर लोग अंग्रेजी नहीं समझते-बोलते। कहीं-कहीं तो अपनी बात समझाने के लिए गूगल ट्रांसलेट की मदद लेनी पड़ती है।

सभी फोटोः अमिताभ स.

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