यहां सरस्वती को शापमुक्त करने आये थे महादेव

प्रो. मोहन मैत्रेय

संगमेश्वर धाम अरुणाय

हरियाणा वैदिक काल से ही आर्य-संस्कृति का केंद्र रहा है। इसे यह गौरव देव-नदी के कारण ही प्राप्त हुआ। सरस्वती ही प्रदेश की हरीतिमा का कारक बनी। सरस्वती के तट पर ऋषि-मुनियों के आश्रमों का उल्लेख मिलता है। यहीं पर वेद-वेदांग का सृजन भी हुआ। सरस्वती तथा इसके तट पर स्थित तीर्थ ‘पृथूदक’ (पिहोवा) की महिमा का विशेष गान  हुआ है। यह एक अकल्पनीय तथ्य है कि जिन ऋषि-मुनियों ने सरस्वती के अमृत-जल का पान किया, ऊर्जावान हो मंत्रद्रष्टा बने, उन्हीं में से दो की प्रतिस्पर्धा के कारण सरस्वती को शापित होना पड़ा। महर्षि विश्वामित्र ऋषि वशिष्ठ के प्रति शत्रुभाव रखते थे। कारण था कि वशिष्ठ ऋषि महर्षि विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि न कहकर राजर्षि कहते थे। वामन पुराण में उल्लेख है कि एक दिन ऋषि वशिष्ठ सरस्वती के पूर्व-तट पर स्थित अपने आश्रम में तपस्यालीन थे (आज का विश्वामित्र टीला)। महर्षि विश्वामित्र ने सरस्वती को आदेश दिया कि वह ऋषि वशिष्ठ को उनके पास उठा लाए। उनकी योजना ऋषि वशिष्ठ के वध की थी। सरस्वती ने आज्ञा पालन तो किया, परन्तु वह ब्रह्म हत्या के पाप की साक्षी न बनने के निश्चय से वशिष्ठ ऋष्िा को पूर्व की ओर बहा ले गई। यही स्थान प्राची तीर्थ बना। क्रुद्ध विश्वामित्र ने सरस्वती को शापित किया कि अब तुम्हारा प्रवाह जल-विहीन, रक्तमय होगा। इस शाप से सरस्वती का जल दूषित हो गया। तीर्थ-यात्री ऋषि-मुनियों ने, कालान्तर में भगवान शिव से प्रार्थना की— हे महादेव। आप सरस्वती को शापमुक्त कीजिए। ऐसा उल्लेख है कि भगवान महादेव कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को सरस्वती की शाप-मुक्ति हेतु यहां पधारे थे। उनका यह कथन था कि जो प्राणी इस दिन इस स्थान पर पूजा-अर्चना करेगा, मैं तत्काल उसकी सभी कामनाओं को पूरा करूंगा। ऐसी मान्यता है कि यह पूजन सरस्वती संगम या ‘श्री संगमेश्वर महादेव’ अरुणाय में हो, तो इसका अधिक महत्व है। एक उल्लेख के अनुसार भगवान शिव अपने परिवार सहित सरस्वती-स्नान को पधारे थे और यहीं देवताओं में गणपति के अग्र-पूजन का निर्णय हुआ था। भगवान् संगमेश्वर के त्रयोदशी-पूजन का शाश्वत विधान है। महर्षि लोमहर्षण ने मुक्ित का कथन किया है - अरुणाया सरस्वत्या संगमे लोक विश्रुते। त्रिरात्रोपोषित: स्नात्वोमुच्यते सर्वकिल्िवषे:।। संगमेश्वर महादेव संबंधी अनेक दंतकथाएं प्रचलित हैं। किसी समय वर्तमान स्थल के निकट एक विशाल वट-वृक्ष स्िथत था। निकट के डेरे में अनेक महात्मा निवास करते थे। उनमें एक महात्मा बाबा गणेश गिरि थे। उन्हें आभास हुआ कि यहां किसी शक्ति का निवास है। रहस्य ज्ञात करने की धुन में उन्हें एक दिन झाड़ियों के मध्य एक बाम्बी मिली। इसे चिमटे से खोदने पर एक पत्थर की पिंडी मिली। खोदने का प्रयास हुआ, परन्तु असफल। स्वप्न में एक रात भगवान्ा‍‍ शिव ने बाबा को स्थान के उद्धार का आदेश दिया। प्रात: बाबा उस स्थान पर गए तो वहां एक मणिमय सर्प को पिंडी पर आसीन पाया। बाबा ने जीवनपर्यन्त सेवा का संकल्प लिया। उनके देहावसान पर उनके शिष्य अरुण गिरि तथा वरुण गिरि यहां सेवा करते रहे। आज यहां पर भव्य मंदिर है। पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी (कनखल) द्वारा स्थान को तीर्थ का रूप मिला। मान्यता है कि मंदिर की सीमा में खाट नहीं बिछाई जा सकती। यहां दूध बिलो कर मक्खन भी नहीं निकाला जा सकता। महाभारत के अनुसार यहां बलराम जी और वामन पुराण के अनुसार प्रहलाद भक्त ने यात्रा की थी। महाभारत के अनुसार सरस्वती नदी यमुनानगर से थोड़ा ऊपर तथा शिवालिक पर्वतमाला के थोड़ा नीचे आदिबद्री नामक स्थान से निकलती थी। वैज्ञानिक खोजों के अनुसार सरस्वती पश्चिम की ओर स्थानांतरित हो गयी।

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