मेयर की चेयर

दिनेश भारद्वाज

पांच राज्यों के चुनावी नतीजे क्या आए, हरियाणा की राजनीति पूरी तरह से बदल गई। हिंदीभाषी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की वापसी से स्थानीय कांग्रेसियों के हौसले बुलंद हो गए हैं। सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही हैं। सबसे बड़ी चुनौती 5 नगर निगमों के चुनाव को लेकर है। मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की यह पहली और बड़ी चुनावी परीक्षा है। प्रदेश में पहली बार नगर निगमों में मेयर के चुनाव सीधे जनता कर रही है। निगम चुनाव के मतदान से पहले आए 5 राज्यों के चुनावी नतीजों का सीधा असर निगम चुनावों पर पड़ता दिख रहा है। ऐसे में अब मेयर की चेयर ‘रेयर’ हो गई है। यानी पांचों ही निगमों में कांटे का मुकाबला बन गया है। खुद सीएम मनोहर लाल खट्टर और उनकी कैबिनेट सहित पूरी भाजपा की प्रतिष्ठा दाव पर है। कुछ खुद के और कुछ बाहर के उम्मीदवारों के जरिये भाजपा ने मुकाबले को रोचक तो बना दिया है, लेकिन इन चुनावों में जरा भी चूक हुई तो इसका सीधा असर आगे लोकसभा और फिर विधानसभा चुनावों पर भी पड़ सकता है। भाजपा शुरू से ही निगम के चुनाव अपने सिम्बल पर लड़ती रही है। इस बार प्रमुख विपक्षी दल इनेलो ने भी बसपा के साथ गठबंधन कर सिम्बल पर प्रत्याशी उतारे हैं। कांग्रेस इन चुनावों को सिम्बल पर तो नहीं लड़ रही, लेकिन कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार चुनावी रण में डटे हुए हैं। कांग्रेस समर्थक उम्मीदवारों को वरिष्ठ नेताओं के समर्थन के चलते मुकाबला रोचक हो गया है। कहीं त्रिकोणीय तो कहीं सीधा मुकाबला बना हुआ है। कुरुक्षेत्र से सांसद राजकुमार सैनी की पार्टी लोकतांत्रिक सुरक्षा मंच ने भी उम्मीदवार उतारे हैं, लेकिन माना जा रहा है कि ये उम्मीदवार भी आखिर में भाजपा के लिए ही बड़ा संकट बन सकते हैं। अब तक निगम चुनाव में मेयर का चुनाव चुने हुए पार्षदों द्वारा किया जाता था, लेकिन इस बार खट्टर सरकार ने विधानसभा में निगम एक्ट में संशोधन करके मेयर चुनाव डायरेक्ट करवाने का फैसला लिया। जिन पांच निगमों में चुनाव हो रहे हैं, उनमें 2 से 3 विधानसभा क्षेत्र कवर होंगे। दो नगर पालिकाओं -पुंडरी व जाखल मंडी के भी चुनाव 16 दिसंबर को ही होंगे। ऐसे में 18 विधानसभा क्षेत्र सीधे तौर पर निगम चुनावों से प्रभावित हो रहे हैं। इसी वजह से सीधे तौर पर भाजपा के 11 और एक सरकार को समर्थन दे रहे पुंडरी विधायक दिनेश कौशिक की प्रतिष्ठा दाव पर लगी है। यमुनानगर नगर निगम को 3 हलकों - यमुनानगर, रादौर और जगाधरी तथा करनाल निगम में करनाल, घरौंडा और इंद्री एरिया के गांव शामिल हैं। पानीपत निगम में पानीपत सिटी और ग्रामीण हलके कवर होंगे और रोहतक निगम में रोहतक शहर के अलावा गढ़ी-सांपला किलोई और कलानौर हलके के गांव शामिल हैं। इसी तरह से हिसार निगम में हिसार शहर के अलावा नलवा और आदमपुर हलके का क्षेत्र शामिल है। जाखल मंडल का एरिया भाजपा प्रदेशाध्यक्ष और टोहाना विधायक सुभाष बराला के एरिया के अंतर्गत आता है। इसी वजह से यह माना जा रहा है कि निगम चुनावों की हार-जीत से सीधे तौर पर इनके अधीन आने वाले एरिया के विधायक भी सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। शहरों की सरकार में अगर चूक हुई तो आने वाले विधानसभा चुनावों में संबंधित एरिया के विधायकों की मुश्किल बढ़ना तय है। हरियाणा से पहले मध्य प्रदेश व गुजरात सहित कई अन्य राज्यों में मेयर के चुनाव सीधे जनता से कराए जा रहे हैं। अब हरियाणा में भी मेयर का चुनाव सीधे जनता द्वारा चुने जाने से मेयर, सियासी रूप से विधायकों से भी पावरफुल होगा। हालांकि, प्रोटोकॉल में विधायक ही ऊपर रहेगा, लेकिन ढाई से 3 लाख वोटरों द्वारा मेयर का चुनाव करने से मेयर का दखल अब 2 से 3 विधानसभा क्षेत्रों में रहेगा। ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनावों में विधायक बनने के लिए नेताओं को मेयर की मदद की जरूरत पड़ेगी। डायरेक्ट चुनाव केवल मेयर के लिए ही होंगे। सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर का फैसला पार्षदों द्वारा ही किया जाएगा। मेयर के सीधे चुनाव के प्रयास सफल रहने के बाद आने वाले दिनों में सरकार जिला परिषद चेयरमैन के चुनाव भी सीधे करवाने का फैसला कर सकती है। अभी पंचायती राज संस्थाओं में जिला परिषद चेयरमैन का चुनाव चुने हुए जिला पार्षदों द्वारा सर्वसम्मति या वोटिंग से किया जाता है।

भाजपा के लिए अहम हैं चुनाव सत्तारूढ़ भाजपा के लिए यह चुनाव कितने अहम हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूरी सरकार प्रचार के लिए उतरी हुई है। पार्टी हाईकमान ने हरियाणा मामलों के प्रभारी डॉ. अनिल जैन की भी ड्यूटी लगाई हुई है। जैन लगातार बैठकें ले रहे हैं। 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के बाद पार्टी नेतृत्व निगम चुनावों को लेकर और संजीदा हो गया है।

यह है सियासी गणित

भाजपा पहली बार 47 विधायकों के साथ पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई। कार्यकाल के चार वर्ष पूर हो चुके हैं। अभी तक पंचायतों और निकायों के चुनाव तो हुए लेकिन मेयर के सीधे चुनाव पहली बार हो रहे हैं। चुनाव जीत गए तो अगले चुनावों के लिए पक्ष की हवा चल सकती है। हार हुई तो आगे चुनौतियां और बढ़ेंगी। विधायक पहले से नाराज़ हैं। ऐसे में उनका आक्रोश और भी उग्र हो सकता है। मुख्यमंत्री के खुद के निर्वाचन क्षेत्र - करनाल में मेयर की सीट उलझने की वजह से दूसरे निगमों में भी कम समय दे पाएंगे।

कांग्रेस

लगातार दस वर्षों तक सत्ता में रही। 2014 में पूरी जीटी रोड बैल्ट साफ हो गई। रोहतक की सीट से भी हाथ धोना पड़ा। अब निगम चुनावों के तौर पर बड़ा मौका लग गया है। इन चुनावों में अगर कांग्रेस समर्थित चेहरे जीतते हैं तो आगामी चुनाव की राह आसान हो सकती है। कुछ तो माहौल राजस्थान की जीत ने बदल दिया है। अब अगर कांग्रेसी एकजुट होकर निगम चुनाव में डट जाएं तो परिस्थिति बदल सकते हैं। वैसे कांग्रेसियों के सिर मिलते नज़र नहीं दिखते। इतना जरूर है कि अब कांग्रेस और आक्रामक होकर ये चुनाव लड़ेगी।

इनेलो निगम चुनावों में सबसे बड़ी परीक्षा इनेलो की होगी। इनेलो-बसपा गठबंधन ने चार निगमों में मेयर पद पर सिम्बल पर उम्मीदवार उतारे हैं। परिवार और पार्टी में हुए बिखराव के बाद इनेलो का यह पहला चुनाव होगा। अभय चौटाला अगर इन चुनावों में अपने उम्मीदवारों को जीत दिलवाने में कामयाब रहे तो गठबंधन की हवा बनेगी। अगर चुनावों में शिकस्त हाथ लगी तो वर्करों का मनोबल भी टूटेगा। जननायक जनता पार्टी का गठन करने वाले हिसार सांसद दुष्यंत चौटाला ने निगम चुनाव से दूरी बनाई हुई है।

ये हैं मैदान में

रोहतक की चौधर

22 वार्ड 278 पोलिंग बूथ 328259 मतदाता 150358 महिला वोटर 177901 पुरुष वोटर

(वार्ड नंबर-3 और 6 अनुसूचित जाति, वार्ड-5 और 20 अनुसूचित जाति की महिला, वार्ड-1 व 7 पिछड़ा वर्ग के लिए, वार्ड-2, 12, 13, 16, 18 व 19 महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।) राेहतक पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा का गढ़ माना जाता है। भाजपा इसे खुद का दुर्ग मानती है। वह इसलिए क्योंकि रोहतक पर लम्बे समय तक हरियाणा में भाजपा के सबसे बड़े नेता रहे डॉ. मंगलसेन का कब्जा रहा है। भाजपा ने यहां से पूर्व मंत्री सेठ श्रीकिशन दास के बेटे मनमोहन गोयल को चुनावी मैदान में उतारा है। हुड्डा के समर्थन से नगर सुधार मंडल के पूर्व चेयरमैन सीताराम सचदेवा चुनाव लड़ रहे हैं। यहां मुकाबला रोचक बना हुआ है। हुड्डा यहां से सचदेवा को जीत दिलवा कर भाजपा के हाथों से शहर की सीट वापस लेना चाहते हैं तो यहां से विधायक व सहकारिता मंत्री मनीष ग्रोवर अपनी सीट को बचाने की जुगत में हैं। इनेलो के संचित नांदल और लोकतंत्र सुरक्षा मंच के अरविंद जोगी यहां से चुनाव लड़ रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टी की जगमती सांगवान भी अपनी किस्मत इन चुनावों में आजमा रही हैं।

इनमें मुकाबला

करनाल में कमाल

20 वार्ड 256 पोलिंग बूथ 276068 मतदाता 131118 महिला वोटर 144950 पुरुष वोटर

( वार्ड 1 और 14 अनुसूचित जाति, वार्ड-6 और 16 अनुसूचित जाति की महिला, वार्ड-17 व 20 पिछड़ा वर्ग के लिए तथा वार्ड-2, 3, 4, 8, 11 व 12 महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।) करनाल सीएम मनोहर लाल का निर्वाचन क्षेत्र है और मेयर की कुर्सी महिला के लिए आरक्षित है। यहां से मेयर रही रेणु बाला गुप्ता पर भाजपा ने दांव लगाया है। यहां से इनेलो व कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार उतारने की बजाय निर्दलीय उम्मीदवार आशा मनोज वधवा को समर्थन दिया है। इससे मुकाबले कांटे का बन गया है। राजकुमार सैनी ने भी कोमल चंदेल को चुनाव मैदान में उतारा हुआ है। करनाल में कमाल इस बात को लेकर है कि वधवा को इनेलो-बसपा ने गठबंधन का उम्मीदवार बनाना चाहा था, लेकिन उन्होंने इससे साफ इनकार कर दिया। आशा जब निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरी तो इनेलो-बसपा ने उन्हें समर्थन देने का ऐलान कर दिया। पूर्व सीएम हुड्डा भी अपना समर्थन देकर मुकाबले को रोचक बना चुके हैं। खुद सीएम करनाल में डेरा डाले हुए हैं।

ये हैं आमने-सामने

यमुनानगर का यश

22 वार्ड 225 पोलिंग बूथ 245836 मतदाता 117279 महिला वोटर 128557 पुरुष वोटर

( वार्ड 11-12 अनुसूचित जाति, वार्ड-18-19 अनुसूचित जाति की महिला, वार्ड-4 व 15 पिछड़ा वर्ग के लिए तथा वार्ड-3, 9, 14, 17, 20 व 22 महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।) यमुनागर, जगाधरी और रादौर हलकों के एरिया को जोड़कर यमुनानगर नगर निगम बना। भाजपा ने मदन चौहान को यहां से चुनाव मैदान में उतारा तो गठबंधन की ओर से बसपा के संदीप गोयल मैदान में आ डटे। कांग्रेस ने ब्राह्मण वोट बैंक को साधते हुए राकेश शर्मा को समर्थन दे दिया। यहां मेयर की सीट बुरी तरह से फंसी हुई है। जगाधरी विधायक और स्पीकर कंवरपाल गुर्जर के अलावा यमुनानगर विधायक घनश्याम सर्राफ और रादौर विधायक श्याम सिंह राणा की प्रतिष्ठा का सवाल यह चुनाव बन गया है। मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर का यह कर्मक्षेत्र है। वे भी यहां पूरा जोर लगा रहे हैं। निगम चुनाव के प्रचार की शुरुआत मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने यहीं से की थी। इस जिले की चारा विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है और अब यह सीट उसकी साख का सवाल बनी है।

ये हैं मैदान में

हिसार का मिलाप 20 वार्ड 204 पोलिंग बूथ 226210 मतदाता 106147 महिला वोटर 120063 पुरुष वोटर

(वार्ड नंबर-6 और 9 अनुसूचित जाति, वार्ड-10 अनुसूचित जाति की महिला, वार्ड-7-8 पिछड़ा वर्ग के लिए तथा वार्ड-2, 3, 5, 11, 13 व 20 महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।) हिसार नगर निगम में हिसार शहर के अलावा नलवा और आदमपुर विधानसभा हलके के कुछ गांव भी शामिल हैं। भारतीय जनता पार्टी के डॉ. कमल गुप्ता हिसार से विधायक हैं और नारनौंद हलके से विधायक कैप्टन अभिमन्यु प्रदेश के वित्त मंत्री हैं। भाजपा ने हरियाणा जनहित कांग्रेस से विधानसभा चुनाव लड़ चुके गौतम सरदाना को अपना उम्मीदवार बनाया है। भाजपा के पुराने  नेता हनुमान ऐरन अपनी पत्नी रेखा ऐरन के लिए टिकट मांग रहे थे। लेकिन भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया। इस पर वे बागी के रूप में मैदान में उतर गए। हालात को भांपते हुए भजन लाल और जिंदल परिवार ने हाथ मिला लिया और रेखा ऐरन को कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतार दिया। इंडियन नेशनल लोकदल ने अमित सैनी और लोकतंत्र सुरक्षा मंच ने मास्टर  महावीर सैनी को प्रत्याशी बनाया है। रेखा ऐरन के मैदान में आते ही भाजपा के लिए यह सीट भी फंस गयी है।

ये हैं मैदान में पानीपत का ताप 26 वार्ड 330 पोलिंग बूथ 302026 मतदाता 139520 महिला वोटर 162506 पुरुष वोटर

(वार्ड 2, 6 व 7 अनुसूचित जाति, 19 व 24 अनुसूचित जाति की महिला, वार्ड-11 व 25 पिछड़ा वर्ग के लिए तथा वार्ड-1, 3, 9, 14, 15, 17 व 22 महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।) पानीपत सिटी और पानीपत ग्रामीण हलकों से मिलकर बने पानीपत निगम के सियासी ताप को समझते हुए भाजपा ने अवनीत कौर को अपना प्रत्याशी बनाया। कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार अंशु कौर ने भाजपा के इन जातीय समीकरणों को पूरी तरह से बिगाड़ दिया है। रही-सही कसर इनेलो की प्रियंका सोनी और लोकतंत्र सुरक्षा मंच की सीमा सैनी ने पूरी कर दी। यहां मेयर की सीट पिछड़ा वर्ग की महिला के लिए आरक्षित है। दोनों हलकों में भाजपा विधायक हैं और इसराना विधायक और कैबिनेट मंत्री कृष्णलाल पंवार भी पानीपत में ही रहते हैं। 2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भाजपा को इस इलाके ने पूरा समर्थन दिया। अब मेयर चुनाव में हालात पूरी तरह से बदले हुए हैं। खास बात यह कि भाजपा और कांग्रेस समर्थित दोनों की उम्मीदवारों का मायका और ससुराल निगम क्षेत्र में पड़ता है।

 

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