मुस्लिम महिलाओं के प्रतिरोध के स्वर

शाहीन बाग़ का संदेश

रिजवान अंसारी सफेद चिड़िया को फारसी में शाहीन कहते हैं, जिसकी रफ्तार काफी ज्यादा होती है। आजकल दिल्ली के शाहीन बाग इलाके की महिलाएं भी शाहीन चिड़िया की तरह ही उड़ान भरती नजर आ रही हैं। जामिया मिल्लिया इस्लामिया से सटे शाहीन बाग इलाके में औरतें पिछले चार सप्ताह से लगातार धरना प्रदर्शन कर रही हैं। यह प्रदर्शन नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ है। दिल्ली की इस सर्दी और बारिश में भी महिलाएं, लड़कियां और छोटे-छोटे बच्चे दिन-रात शाहीन बाग में जुटे हुए हैं। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा इसे तवज्जो देने का ही नतीजा है कि यह इलाका विरोध का प्रतीक बन गया है। हालांकि, यहां पर मौजूदगी तो सभी धर्म की महिलाओं की है लेकिन, मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी चर्चा का विषय बना हुआ है। इन महिलाओं ने सभी मान्यताओं को तोड़ दिया है और सरकार से लेकर पितृसत्ता समाज के पुरुषों तक को चौंका दिया है। 90 साल तक की मुस्लिम औरतों ने जिस तरह उम्र की सीमा को तोड़ा है, वह हैरान कर देने वाला है। इससे भी ज्यादा हैरानी की बात तो यह है कि ये वही मुस्लिम औरतें हैं, जिन्हें पर्दा और घूंघट की बेड़ियों में जकड़ी हुई महिला की संज्ञा दी जाती रही है। ये वही मुस्लिम महिलाएं हैं, जिनके बारे में एक सोच है कि उनकी कोई सोच नहीं होती और उन्हें घर में खाने की टेबल पर जगह भी नहीं मिलती। लेकिन, गौर करें तो, हिन्दुस्तान की तारीख में शायद पहली बार इतनी बड़ी तादाद में मुस्लिम औरतें प्रदर्शन के लिए न केवल सड़कों पर निकली हैं। जो औरतें समाज में पतियों के जुल्म और दकियानूसी सोच की शिकार के कारण दबी-कुचली और एक असहाय महिला की प्रतीक बनी हुई थीं, उन्हें अब मुस्लिम कहलाने में न तो डर है और न ही कोई शर्म। हिजाब और बुर्के में रह कर ये औरतें अपनी पहचान को नए सिरे से गढ़ने में मशगूल हो गई हैं। इस कड़ाके की सर्दी में हिजाब पहनी महिलाएं पुलिस को चुनौती दे रही हैं। तमाम बातों के बावजूद ये महिलाएं विरोध प्रदर्शन की मशाल जलाए दिख रही हैं। ये महिलाएं आत्मविश्वास से लबरेज, स्पष्ट और मुखर हैं। इस प्रदर्शन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका कोई नेता नहीं है। और न ही किसी सियासी दल की इसमें दखल है। ये औरतें ख़ुद इन प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रही हैं और विरोध की इस आवाज में अपनी पहचान भी बना रही हैं। अगर यह कहा जाए कि ये महिलाएं मुस्लिम महिला प्रतिनिधित्व की मिसाल बन रही हैं तो कोई गलत नहीं होगा। शायद ही किसी को उम्मीद रही हो कि ये ‘कमजोर’ औरतें इस विरोध को ऐतिहासिक बना देंगी और महिलाओं की नुमाइंदगी करने लगेंगीं। दरअसल, शाहीन बाग की ये महिलाएं तीन तलाक के मामले, बाबरी मस्जिद पर कोर्ट के फैसले, अनुच्छेद-370, मॉब लींचिंग, ध्रुवीकरण की राजनीति आदि से अंजान नहीं थीं। फिर भी वे घरों में रहीं। लेकिन नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में इन्होंने अपने घरों को छोड़ा और एक तंबू के नीचे सड़क पर जम गईं। ये वही महिलाएं हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी मां-बहन कह कर तीन तलाक जैसी कुप्रथा से निजात दिलाने के लिए एक कानून को स्थापित किया। लेकिन, उन मां-बहनों की आवाज सत्ताधीशों को सुनाई नहीं दे रही है जो सर्दी की खामोश रातों में भी अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं। सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री आवास के कुछ ही किलोमीटर दूर प्रदर्शन कर रही इन महिलाओं की आवाज को प्रधानमंत्री वाकई नहीं सुन रहे हैं? सरकार भले ही इन महिलाओं की आवाज को अनसुना कर रही है लेकिन, सबसे सुकून वाली बात यह है कि ये महिलाएं गांधी के विचारों को सार्थक करती हुई प्रतीत हो रही हैं। 1920 के बाद आंदोलनों में प्रमुखता से गांधी के पदार्पण के बाद महिलाओं की भूमिका निर्णायक तौर पर उभर कर सामने आई। असहयोग आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक में महिलाओं की भूमिका से कोई इनकार नहीं कर सकता। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में तो महिलाओं ने तो बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। महिलाओं को आगे करने के पीछे गांधीजी की सोच थी कि महिलाएं अहिंसक और सहनशील होती हैं। सत्ता के खिलाफ आंदोलन छेड़ने के लिए इन दोनों ही गुणों का होना जरूरी है। उनका मानना था कि आंदोलनों के प्रभावी होने के लिए उसका अहिंसक होना जरूरी है और लंबे समय तक जारी रखने के लिए सहनशीलता की जरूरत है। लिहाजा, आंदोलनों को लंबे समय तक जारी रखने के लिए उन्होंने महिलाओं की भागीदारी को जरूरी समझा। महिला केंद्रित आंदोलन के चार सप्ताह के बाद ऐसा लग रहा है मानो जैसे शाहीन बाग की ये महिलाएं गांधी की उसी सोच को सार्थक करने की मुहिम में जुट गई हों।

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