मीरा: गीत विरह के, बात प्रेम की

जयंती आज

ओशो सिद्धार्थ औलिया

मीरा का एक प्रसिद्ध पद है- हे री मैं तो प्रेम दिवानी मेरो दरद न जाने कोय... हैंबड़े आश्चर्य की बात है कि जो ओंकार के साथ एक हो गया हो, उसके स्वर से विरह के गीत क्यों फूटते हैं। यह एक अबूझ पहेली है। केवल मीरा की बात नहीं है, गुरु नानक, गुरु अर्जुनदेव जी और वाजिद भी विरह के गीत गाते हैं। जितने भी संत गाते हैं, सब विरह के गीत गाते । क्या कारण हो सकता है? प्रभु से मिलने संत चलता है और जब मिलन की घड़ी आती है, तब वह मिट जाता है। उस क्षण में एक हो जाता है गोविन्द के साथ। फिर, वहां कोई अनुभव नहीं बचता। और, जब लौटता है, तो विरह की आग फिर पैदा हो जाती है। मिलन की प्यास फिर जग जाती है। इसलिए मीरा का विरह भी कोई सामान्य विरह नहीं है। यह मिलन के बाद का विरह है। और सच कहो तो मिलन के बाद जो विरह पैदा होता है, वही असली विरह है। मिलन के पहले का विरह असली नहीं है, क्योंकि वह तो अभी कल्पना में है। उस विरह में सच्चाई नहीं है। उस विरह में त्वरा नहीं है, उस विरह में आग नहीं है। प्रभु का विरह जिसको मिलता है, वह धन्यभागी हो जाता है। जिसे प्रभु के विरह की पीड़ा न मिली, समझिए उसका जीवन खाली ही चला गया। जब विरह वेदना की आग, जब विरह की पीड़ा हिमालय-सी बन जाए, तभी उससे अध्यात्म की, प्रेम की गंगा निकलती है। लेकिन, प्रभु के विरह की पीड़ा और सांसारिक प्रेम के विरह की पीड़ा में बड़ा भेद है। सांसारिक प्रेम की पीड़ा तुम्हें दुःख में ले जाती है। लेकिन, प्रभु प्रेम की पीड़ा आनंद में ले जाती है। प्रभु की पीड़ा जितनी बढ़ती है, उस पीड़ा में जितने आंसू गिरते हैं, आनंद उतना ही बढ़ता जाता है। मगर कौन समझेगा इस बात को, भक्तों के दर्द को कौन समझेगा। कहती हैं मीरा- ‘घायल की गति घायल जाने, की जिन लाई होय।’ ‘जिन लाई होय’ अर्थात किसी और ने नहीं दिया, बल्कि मैंने खुद ही पैदा किया है इस पीड़ा को। इस विरह में इतना आनंद है कि मीरा कहती है- मैंने खुद ही इन ज़ख्मों को पैदा कर लिया है। इस जख्म को वही जान सकता है, जो स्वयं प्रभु के विरह में रहा हो; इस दर्द को वही जान सकता है जिसे स्वयं प्रभु विरह का घाव मिला हो। इसी तरह, अध्यात्म की गति को कोई दूसरा नहीं, बल्कि केवल सद‍्गुरु ही जान सकता है कि प्रभु कितना अमोल है, कितना दुर्लभ है। ध्यान रहे, छात्र नहीं जान सकता। छात्र को घायल होने की कला मालूम ही नहीं होती। छात्र गुरु के, गोविन्द के प्रेम में नहीं होता, क्योंकि वह तो मस्तिष्क से संचालित होता है। लेकिन जो शिष्य हो जाता है, जो गुरु के प्रेम में पड़ जाता है, भक्त हो जाता है, जो भगवत्ता के, भगवान के प्रेम में पड़ता है, केवल वही जान सकता है कि मीरा किस प्रेम की, किस विरह की बात कर रही हैं। अध्यात्म की यह पूरी यात्रा विश्वास से श्रद्धा तक की यात्रा है। विश्वास का क्या मतलब हुआ? विश्वास का मतलब है- जानने से पहले ही मान लेना। सारी दुनिया विश्वास में जीती है, लेकिन विश्वास पर जब तक तुम अटके हो, तब तक तुम प्रभु की ओर कदम नहीं बढ़ा सकते। विश्वास से ऊपर उठना होगा। कैसे उठोगे? ‘हाइपोथेटिकल’ श्रद्धा चाहिए। ‘हाइपोथेटिकल’ श्रद्धा का मतलब है- कहीं सत्संग में जाते हो और वहां कोई संत कुछ बात कहता है, तो यूं ही मत मान लो। तुम प्रयोग करने के लिए उत्सुक हो जाओ कि आप जो कहते हो उसे हम प्रयोग करेंगे। जैसे कोई संत कहता है कि अगर तुम साक्षी हो जाओगे तो शून्यता में चले जाओगे, निर्विचार अवस्था में चले जाओगे। इसको मानो नहीं, अब साक्षी होकर देखो। अगर तुमने साक्षी होकर देखना शुरू किया तो ये एक ‘हाइपोथेटिकल’ श्रद्धा हुई कि चलो श्रद्धा करके देखते हैं, कल्पना में ही सही, चलते हैं थोड़ी दूर। लेकिन, जब साक्षी होकर ध्यान की निर्विचार अवस्था को उपलब्ध होते हो, तब तुम असली श्रद्धा को उपलब्ध होते हो। अब तुमने जान लिया। जानने के बाद मानने का नाम है- श्रद्धा। मीरा कहती हैं- ‘दरद की मारी बन-बन डोलूं, वैद मिला नहिं कोय।’ जगह-जगह जाती हूं। जहां भी जाती हूं, वहीं गोविन्द की याद हो आती है। फूल खिलता है तो गोविंद की विरह की आग पैदा हो जाती है। चांद उगता है तो गोविंद की याद पैदा हो जाती है। जहां जाती हूं, वहीं उसकी याद पैदा हो जाती है, वहीं उसकी विरह वेदना जग जाती है। एक विरह लेकर जी रही हूं। एक ऐसा ज़ख्म है मेरे हृदय में। जो इसका इलाज जानता हो वो वैद्य कौन है? मीरा कहती हैं- ‘मीरा के प्रभु पीर मिटेगी जब वैद सांवलिया होय।’ अर्थात, ये पीड़ा ऐसे मिटने वाली नहीं है। जब गोविंद खुद गुरु बनकर आएंगे, तब ये विरह वेदना मिटेगी। सारे ध्यान का मकसद यही है कि उस गोविंद को वैद्य के रूप में जान लो, निमंत्रित कर लो। उद्देश्य केवल इतना है कि अनहद का संगीत सुनाई दे और सद‍्गुरु दिखाई दे। मीरा जिस ओंकार की, जिस ओंकार रूपी सद‍्गुरु की बात कह रही हैं, उसे जानना ही सहज योग है। (लेखक मुरथल स्थित ओशोधारा के संस्थापक हैं)

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