माेहर्रम : शहादत को याद करने का दिन

मोहम्मद अम्मार खान मोहर्रम हिजरी कैलेंडर का पहला महीना है। इस्लाम के आखिरी पैगम्बर और नबी हज़रत मोहम्मद सल्लललाहो आलेही वसल्लम के मक्का से मदीना जाने को हिजरत कहा जाता है। मोहम्मद साहब द्वारा इस्लाम के प्रचार के लिए सऊदी अरब में मक्का से मदीना की गई महत्वपूर्ण यात्रा यानी हिजरत से इस्लामिक कैलेंडर हिजरी सन की शुरुआत हुई थी। पैग़ंबर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद साहब के नवासे (नाती) हज़रत इमाम हुसैन मोहर्रम के महीने में कर्बला की जंग में (680 ईस्वी) हक़ की लड़ाई लड़ते हुए परिवार और दोस्तों के साथ शहीद हो गए थे। यह जंग हज़रत इमाम हुसैन और बादशाह यज़ीद की सेना के बीच हुई थी। जंग के दौरान भी हज़रत इमाम हुसैन ने नमाज़ नहीं छोड़ी थी। नमाज़ की हालत में ही उन पर यजीद की सेना ने हमला कर दिया था। हुसैन की गर्दन जब जमीन पर गिरी तो वह सजदे की अवस्था में थे। मोहर्रम महीने में मुसलमान हज़रत इमाम हुसैन की इसी शहादत को याद करते हैं। इस महीने का दसवां दिन सबसे ख़ास माना जाता है, क्योंकि इसी दिन इस्लाम की रक्षा के लिए हज़रत इमाम हुसैन ने खुद को कुर्बान किया था। शिया समुदाय के लोग इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए मातम मनाते हैं। इस दिन ताजिये भी निकाले जाते हैं। मोहर्रम की 10 तारीख को यौमे आशूरा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन से कई महत्वपूर्ण घटनाएं जुड़ी हुई हैं। यौमे आशूरा के दिन ही आदम अलैहिस्सलाम की तौबा कुबूल हुई थी। इसी दिन अय्यूब अलैहिस्सलाम को लंबी बीमारी के बाद शिफा (आराम) मिला था। लेकिन, इमाम हुसैन की शहादत ने इस दिन का महत्व काफी बढ़ा दिया। इमाम हुसैन की कुर्बानी से मुस्लिम समुदाय यह प्रेरणा लेता है कि ज़ुल्म और ज़ालिम का साथ नहीं देना चाहिए। रोज़ा रखने, गरीबों को खाना खिलाने का महत्व : मोहर्रम की 9 व 10 तारीख को रोज़ा रखने व गरीबों को खाना खिलाने का बहुत महत्व माना गया है। इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोग काफी संख्या में रोज़ा रखते हैं। माना जाता है मोहर्रम के एक रोज़े का सवाब 30 रोज़े रखने के बराबर है।

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