मास्टर जी की मुस्कान

विजेन्द्र सिंह चौहान

5 साल की उम्र में मुझे स्कूल भेजा गया था। बचपन में बीमार रहता था तो दादा-दादी बहुत लाड से रखते थे। उन्हें मुझे स्कूल भेजने की कोई जल्दी नहीं थी, उनके मुताबिक मैं अभी 2-4 साल बाद भी स्कूल जा सकता था। ऐसे में पिताजी की भूमिका बहुत जागरूक नागरिक की थी। वे अपने घर के सारे बच्चों के साथ -साथ पड़ोसियों के बच्चों को भी जल्द ही आंगनवाड़ी या स्कूल भेजने के लिये कहते रहते थे। पड़ोस के लोगों में बचपन में मेरी छवि एक बेचारे बच्चे की थी। मैं 10 तक का पहाड़ा, गुणा-जोड़ के साथ-साथ एबीसीडी और अक्षर जोड़ स्कूल जाने से पहले ही घर पर सीख गया था। इसमें ताऊजी मेरी मदद करते थे। पास में उन दिनों कई पब्लिक स्कूल नहीं था, शिमला या सोलन जाकर रहना हिमाचल के इस दूरदराज के गांव के लोगों के लिये उन दिनों थोड़ा मुश्किल भरा था। खैर पास के राजकीय प्राथमिक विद्यालय में मुझे 5 साल में केवल इसलिये भेजा जाने लगा ताकि मैं घर पर निठल्ला न हो जाऊं। स्कूल में दाखिला 6 साल में मिलता था, लेकिन उन दिनों मास्टर जी के कहने पर दाखिला मिल जाता था। बशर्ते बच्चा पढ़ने में होशियार हो। पहले दिन करीब डेढ़ किलोमीटर का फासला तय कर पिताजी के साथ पैदल, बड़े चचेरे भाइयों और बहनों के साथ मैं भी स्कूल की तरफ चल पड़ा। शायद उस दिन मैंने अपना स्कूल पहली बार देखा था। मास्टर जी गांव में खूब आना-जाना करते थे और परिवार के साथ काफी घुल-मिल कर रहते थे, लिहाज़ा मुझे बड़े प्यार से रखते थे। उस दिन स्कूल में मुझे देखकर उनके चेहरे पर जो मुस्कान थी वह आज भी याद है। अब भी जब उनसे मिलता हूं वही मुस्कान उनके होंठों पर खिली रहती है। खैर मास्टर जी मुझे सीधे चौथी और पांचवी कक्षा के बच्चों के बीच ले गये। पिताजी को विदा कर कह दिया कि इसी साल दाखिल कर देंगे और लड़का कक्षा में प्रथम आएगा। उस कक्षा में मेरे ही गांव के न जाने कितने बच्चे थे। उन दिनों सरकारी स्कूल में चौथी कक्षा से अंग्रेज़ी के अल्फाबेट सिखाए जाते थे। जो कई बच्चों को 5वीं तक भी याद नहीं होते थे। ऐसे में मेरे हाथ में चॉक का डुकड़ा थमाकर जब मास्टर जी ने ब्लैक बोर्ड पर मुझे एबीसीडी लिखवाई और जोड़-घटाव के सवाल हल कराए तो सारे बच्चे टकटकी लगाये मेरी तरफ देख रहे थे। मास्टर जी बड़ी -बड़ी तारीफें कर मेरा हौसला बढ़ा रहे थे। रटे-रटाये पहाड़े एक लय में सुनाकर जब मैं रुका तो मास्टर जी ने एक बच्चे को भेजकर मेरे लिये पानी मंगवाया और खूब शाबाशी दी। उनके प्रयत्नों की बदौलत मैं पांचवीं तक हर कक्षा में प्रथम आता रहा। इसके बाद मेरा स्कूल बदल गया। आज भी गांव जाता हूं तो स्कूल की इमारत देखकर पुरानी यादों में खो जाता हूं।

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