मां के अनमोल शब्द

स्कूल में पहला दिन

सोहन लाल गौड़ स्कूल का पहला दिन हर व्यक्ति के लिए बेहद खास होता है। मेरा भी स्कूल का पहला दिन मेरे लिए यादगार है। स्कूल जाने से पहले मेरी मां ने मेरे लिए प्लास्टिक के थैले का बहुत सुंदर स्कूल बैग तैयार किया। मैं बहुत खुश था क्योंकि घर वाले कह रहे थे कि कल तुम्हारा दाखिला करवा दिया जाएगा। मुझे ये मालूम नहीं था कि दाखिला करवाने के बाद स्कूल में रहना पड़ेगा। अगले दिन बैग में कायदा, पैंसिल, कापी और ग्लूकोज बिस्कुट का पैकेट लेकर मैं अपने बड़े भाई शमशेर के साथ खुशी-खुशी स्कूल गया। स्कूल में गांव के ही अध्यापक दीदार सिंह ने मेरा दाखिला कर लिया। दाखिला करते समय जन्मतिथि की जरूरत पड़ी तो बड़ा भाई बताने में कन्फ्यूज हो गया। इसलिए मास्टर जी ने मेरी जन्मतिथि 02 अक्तूबर लिख दी। मास्टर जी खुद मुझे कक्षा में छोड़कर आए और कक्षा अध्यापक से कहा-ये हमारे मुनीम साहब का लड़का है पंडित जी, इसका विशेष ध्यान रखना। पिताजी को सब गांववासी मुनीम के नाम से जानते हैं। कुछ समय बाद मैं घर जाने की ज़िद करने लगा लेकिन अध्यापक ने मुझे बाहर नहीं जाने दिया। हमारे स्कूल में पीने के पानी का प्रबंध नहीं था, इसलिए सभी बच्चे पानी पीने के लिए आसपास के घरों में जाते थे। पहले दिन मास्टर जी ने मुझे पानी पीने के लिए भी बाहर नहीं जाने दिया लेकिन अब मेरे पास आधी छुट्टी में घर जाने का मौका था। आधी छुट्टी में मैं भी घर आ गया। मैंने कहा कि अब मैं स्कूल नहीं जाऊंगा। घरवाले बोले कि आपका दाखिला करवा दिया है, इसलिए अब हर रोज स्कूल जाना है। मैंने कहा कि जब दाखिला सुबह करवा दिया था तो बार-बार स्कूल क्यों जाना पड़ेगा। मैं रोया भी परंतु मेरी मां ने मुझे समझाया कि आज तुम्हारे स्कूल का पहला दिन है। यदि आज ही ऐसे करेगा तो आगे सारी साल यही हाल होगा। आधा दिन स्कूल गया है तो तेरा आधा सिर दर्द होगा। तब मैं स्कूल चला गया। पूरी छुट्टी के बाद जब मैं घर आया तो मेरी मां मेरा इंतजार कर रही थी। मां ने मुझे गोद में उठा कर कहा कि आ गया मेरा मास्टर। मास्टर शब्द सुनकर मेरे दिमाग में दिन भर का क्रियाकलाप घूमने लगा। मैंने उसी दिन संकल्प कर लिया कि कोई काम अधूरा नहीं छोड़ना। उसके बाद मैं हर रोज खुश होकर स्कूल जाने लगा। मैं अब भी हर रोज स्कूल जाता हूं। एक निजी स्कूल में अध्यापक हूं। मैं जब स्कूल से घर आता हूं तो यह सुनकर मेरा मन भर आता है कि ‘आ गया मेरा मास्टर’ क्योंकि ये शब्द अब मेरी मां नहीं, मेरी पत्नी कहती है। काश मैं अपनी मां की आंखों के सामने मास्टर बन गया होता!

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