महिलाएं भी कर सकती हैं श्राद्ध!

पितरों की सद‍्गति के लिए अकसर पुरुष ही श्राद्ध करते हैं। लेकिन, विशेष परिस्थितियों में महिलाएं भी श्राद्ध कर सकती हैं। गरुड़ पुराण समेत कई ग्रंथों में इसका उल्लेख है। गरुड़ पुराण के अनुसार पति, पिता या कुल में कोई पुरुष सदस्य नहीं होने पर या उसके होने पर भी यदि वह श्राद्ध कर्म कर पाने की स्थिति में नहीं हो, तो महिला श्राद्ध कर सकती है। वाल्मीकि रामायण में माता सीता द्वारा पिंडदान का संदर्भ आता है। सीता माता के पास परिस्थितियों के कारण श्राद्ध करने के लिए कुछ नहीं था तो उन्होंने महाराज दशरथ का पिंडदान बालू का पिंड बनाकर किया था। कथा है कि वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और सीता पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने के लिए 'गया धाम' पहुंचे। वहां श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने के लिए राम और लक्ष्मण नगर की ओर चल दिए। दोपहर हो गई। पिंडदान का समय निकलता जा रहा था, सीता जी असमंजस में पड़ गईं। आखिरकार उन्होंने वटवृक्ष केतकी के फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर स्वर्गीय राजा दशरथ के निमित्त पिंडदान दे दिया। हिंदू संस्कृति में भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन की अमावस्या तक श्राद्ध कर्म करने का विधान है। पितृपक्ष कहलाने वाले ये दिन शुरू हो चुके हैं और 28 सितंबर को इनका समापन होगा। मान्यता है कि दिवंगत माता-पिता, दादा-परदादा, नाना-नानी आदि का श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होकर खुशियां प्रदान करते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि श्राद्ध से प्रसन्न पितरों के आशीर्वाद से सभी प्रकार के सांसारिक भोग और सुखों की प्राप्ति होती है। पितृगण भोजन नहीं बल्कि श्रद्धा के भूखे होते हैं। वे इतने दयालु होते हैं कि यदि श्राद्ध करने के लिए पास में कुछ न भी हो तो दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आंसू बहा देने भर से ही तृप्त हो जाते हैं। (एजेंसी)

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