भाग्य नगर का कैदी नि•ााम हैदराबाद

  • प्रेम पखरोलवी

समीक्ष्य पुस्तक एक ऐतिहासिक उपन्यास है जिसमें वर्णित है हैदराबाद की दिलचस्प दास्तान निजाम हैदराबाद के अद्भुत एवं सनकी व्यक्तित्व के कारण यह काफी रहस्यपूर्ण हो गई है श्री तेजपाल धामा द्वारा विरचित उपन्यास 'भाग्य नगर का कैदी' उसी कथा का जीवन और प्रधान चरित नायक है। यह एक संयोग ही तो था कि नि•ााम हैदराबाद आधा हिंदू और आधा मुसलमान था। वह जागते में (दिन को) भी सपने देखने का शौकीन था। बचपन में ही वह हैदराबाद के शाही महल में कैदी बनाकर ही लाया गया था। परिस्थितियों ने या फिर भाग्य चक्र ने उस कैदी को युवा होने पर उस रियासत का निजाम (प्रमुख हाकिम) बना डाला। वह न केवल भारत का वरन् विश्व का सबसे धनवान व्यक्ति शुमार किया जाने लगा था। पूरे भारत वर्ष में वह अपने समय का सबसे शक्तिशाली शासक भी कहलाया। उपन्यासकार धामा ने आंध्रप्रदेश के भौगोलिक अस्तित्व, तेलगू भाषा एवं संस्कृति को भली-भांति आत्मसात् करने के पश्चात समीक्षाधीन पुस्तक के कथ्य को बड़े साहित्यिक सलीके से प्रस्तुत किया है। हैदराबाद का प्राचीन नाम भाग्य नगर था...क्योंकि छठे प्रमुख हाकिम की प्रेमिका का नाम भाग्य लक्ष्मी था। एक मुसलमान सम्राट के एक आर्य कन्या भाग्य लक्ष्मी से व्यक्तिगत संबंध बन चुके थे। इतिहास की पृष्ठïभूमि में हिंदू-मुस्लिम सामाजिक व धार्मिक संबंधों की टकराहट भी इस उपन्यास के कथ्य का मुखर आयाम बना है। मुगलों और ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ निजाम के व्यवहार एवं संवाद के नरम-गरम मामलात भी कथानक को रोचक बनाते हैं। भारत आजाद हुआ... पर उसका काफी भूभाग कट कर पाकिस्तान नाम से नया राष्ट्र बना। नि•ााम हैदराबाद अन्य रियासतों की तरह भारत में शामिल होने से परहेज करता रहा। आखिर साबिका पड़ा भारत के उपप्रधान मंत्री (एवं गृहमंत्री) सरदार पटेल से। निजाम की मन्शा तो थी पाकिस्तान में मिलना या स्वतंत्र रहना। मगर विवश होकर उसे लौह पुरुष स. पटेल के समक्ष हथियार डालने पड़े। निजाम ने आजादी के पश्चात भारत में शामिल होने से क्यों संकोच दिखाया...क्यों इनकार किया... और क्यों वह पाकिस्तान में शामिल होने को तत्पर था...जबकि वह रक्त से हिंदू था...उसका असली बाप एक हिंदू (मारवाड़ी)था। इतिहास के इन्हीं चंद जरूरी सवालों के रहस्य से पर्दा उठाया है पत्रकार लेखक तेजपाल सिंह धामा ने। एतदर्थ उन्होंने आंध्रप्रदेश में रहकर वहां की संस्कृति और तेलगू भाषा को भी भली-भांति ग्रहण किया है। यह कबूलना होगा कि धामा जी ने अपने चित्रों व उनसे संबद्ध तथ्यों और ऐतिहासिक परिवेश के प्रभाव को बड़ी सावधानी से, बड़ी सरल भाषा में प्रस्तुत किया है। पुस्तक भारत के स्वतंत्रता विषयक इतिहास पर भी पर्याप्त प्रकाश डालती है। स्पष्टï है कि भामा जी का लेखकीय रुझान ऐतिहासिक तथ्यों के शोध की ओर है। अब तक लेखक ने 16 ऐतिहासिक उपन्यास, 5 काव्य संग्रह और एक महाकाव्य मां भारती के भंडार को भेंट किये हैं। एक शोध ग्रंथ भी उनकी उपलब्धि है। संयोग की बात यह है कि जब निजाम शाही महल में दाखिल हुआ तब एक बंदी बनाकर लाया गया था और जब वह निजाम था और राज प्रमुख बनाया जा चुका था तब भी उसकी नाक में गृहमंत्री ने, नकेल डाल रखी थी। इन्हीं कुछ ऐतिहासिक तथ्यों एवं घटनाओं की रोचक दास्तान धामा जी ने भाग्यनगर के कैदी नामक इस उपन्यास में बयान की है। कथोपकथनों की भाषा चुस्त-दुरुस्त और प्रभावित करने वाली है। विचित्र यही है कि एक कैदी होकर भी निजाम इतने दीर्घ समय तक देश की सबसे अमीर रियासत का प्रमुख हाकिम (निजाम) बना रह सका। कथ्य में प्रवाह है, रस है...और पुस्तक हाथ में आते ही मन करता है कि 154 पृष्ठï पलट कर ही पुर्णाहुति डाली जाए। लेखक बधाई एवं साधुवाद पाएंगे, ऐसा विश्वास है।

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