भाईचारे का पाठ

अमृत मदान

देश के विभाजन से पहले की बात है जब मुझे सन‍् 1946 में क़स्बे के स्कूल में पढ़ने के लिये भेजा गया । हम तब ज़िला डेरा ग़ाज़ी खान के अर्ध पहाड़ी क़स्बे तौंसा शरीफ़ (अब पाकिस्तान) में रहते थे । हमारे पड़ोस में एक मुस्लिम मास्टर जी भी रहते थे जो उस मिडिल स्कूल में पढ़ाते थे। वह कभी-कभी मुझे मेरे घर के चूल्हे से अपने हुक्के की चिलम पर अंगारे रख लाने को भी कहते। वह मेरे ताया तगा राम के मित्र भी थे जो पक्के आर्य समाजी होने के साथ साथ राष्ट्रवादी भी थे । मैं उनके जलसे-जुलूसों में कुछ अन्य बच्चों के साथ नारे लगाने जाता था । इनमें एक था 'नहीं बनेगा पाकिस्तान।' एक दिन पिताजी सरकारी दौरे पर थे। मेरे ताया जी मुझे स्कूल में दाख़िल कराने गये और मास्टर जी को सौंप कर चले गये। उन दिनों बच्चों के बस्ते आज की तरह 'स्मार्ट पिट्ठू' नहीं हुआ करते थे । एक खद्दर के साफ़ चौकोर कपड़े के बीच में क़ायदा, कापी व स्लेट रख कर आमने-सामने के दो-दो कोनों या एक साथ चारों कोनों की गांठें बांध कर कसा हुआ बस्ता तैयार किया जाता था और हाथ में होती थी तख्ती । पहले दिन छुट्टी होने पर मुझसे बस्ता ढंग से न बांधा गया । कभी कोई गांठ रह जाती तो कभी कोई खुल जाती। मुझे परेशान देख मास्टर जी टाट पट्टी पर बैठ गये। मेरे सिर पर स्नेह से हाथ फेरा, बस्ते के चारों कोनों को एक साथ कस कर बांध कर बोलने लगे 'हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई , आपस में सब भाई भाई ।' यह कहते हुए उन्होंने मेरी चोटी भी सहलाई और बस्ता मुझे थमा दिया। मेरे मन-मस्तिष्क में तभी से ये चारों बातें किसी गांठ की तरह कस कर बंधी हुई हैं।

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