बड़े संकट की आहट, अब नहीं चेते तो बहुत देर हो जाएगी

कृष्ण प्रताप सिंह

पिछले साल इन्हीं दिनों हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला का भीषण जल-संकट से सामना हुआ। इसके चलते वहां प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय ग्रीष्मोत्सव स्थगित करना पड़ा। पर्यटकों से वहां न जाने की अपीलें की गईं। कई राज्यों में इस बार भी पेयजल को लेकर ऐसे ही हालात हैं। जानकारों ने आशंका जताई है कि अगर हम अब भी देश के प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध उपभोग करते रहे तो आने वाले समय में पहाड़ों की रानी शिमला की पुरानी पहचान खत्म हो जायेगी। बहुत संभव है कि आने वाली पीढ़ियां इसे किसी और रूप में पहचानें। सरकार की ओर से पूंजी को ब्रह्म और मुनाफे को मोक्ष मानकर संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को बढ़ावा देने वाली भूमंडलीकरण व्यवस्था को बदलने की उम्मीद तो नहीं की जा सकती, लेकिन वह यह भी नहीं कर रही कि पेयजल को कुछ लोगों के व्यावसायिक नफे-नुकसान के लिए इस्तेमाल होने से रोक दे। यही कारण है कि इस बार गर्मियों में हम शहरों-कस्बों व गांवों के साथ-साथ कई प्रदेशों की राजधानियों में भी पेयजल संकट का विकराल रूप देख रहे हैं। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में कई जगह लोगों में पेयजल के लिए हिंसक झड़पें हुईं। ऐसी ही एक झड़प के बाद राज्य के विधानसभा अध्यक्ष के ड्राइवर को गिरफ्तार किया गया। गुजरात में भी पेयजल संकट की विकटता ऐसी है कि भारतीय जनता पार्टी के विधायक बलराम थवानी ने अहमदाबाद के नरोडा क्षेत्र में पानी की किल्लत की शिकायत लेकर आई महिला कार्यकर्ता नीतू तेजवानी पर अपने कार्यालय के बाहर समर्थकों के साथ लात, घूंसे और थप्पड़ बरसा डाले। इस बार गर्मियों में पेयजल के लिए पहले से ज्यादा हाय-तौबा मची हुई है। बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं और बड़े-बड़े सुझाव दिये जा रहे हैं, जो यकीनन संकट से फौरी राहत मिलते ही भुला दिये जाने के लिए हैं। इसी प्रवृत्ति का फल है कि भरपूर दोहन से दंशित देश के प्रायः सारे महानगरों के पारंपरिक जलस्रोतों-पहाड़ी नालों, झरनों, अभयारण्यों, कुंओं और बावड़ियों की कोई कद्र नहीं रह गई है। वे लुप्त होने के कगार पर हैं, लेकिन उन्हें पुनर्जीवित करने की परियोजनाओं की पहल करने वाला कोई नहीं है। देश की राजधानी दिल्ली भी इसका अपवाद नहीं है। देश में कहीं भी जब जल-संकट मुंह फैलाने लगता है तो पहली कोशिश यही होती है कि फौरी राहतों के शोर के बीच इस समस्या के मूल को दरकिनार कर दिया जाये। ऐसे में किसी न किसी को तो कर्णधारों से पूछना चाहिए कि उन्हें पहले चेत क्यों नहीं आयी? उनकी नींद तब क्यों टूटी, जब पानी सिर से ऊपर पहुंच गया? यह सवाल पूछा जाना इसलिए भी जरूरी है कि इसका जवाब मिल जाये तो देश के शहरों और महानगरों से जुड़े कई और सवालों के जवाब मिल जायेंगे। भू-वैज्ञानिकों का मानना है कि दुनियाभर में जिस तरह से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है, उससे पानी की पूर्ति के लिए एक नहीं 4 पृथ्वियां भी कम पड़ेंगी। लोग हवा-पानी, नदी-पहाड़, जंगल-जानवर हर किसी का अनवरत दोहन करने के बाद साल में एक दिन पर्यावरण संरक्षण दिवस मनाकर अपने प्रायश्चित और कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। ऐसे हाल में भी ऐसे लोग कम नहीं हैं, जो अपनी धरती, शहरों व गांवों के प्रति दायित्व गंभीरतापूर्वक निभा रहे हैं। बिहार में अनिल राम नाम के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी अब तक सड़क किनारे अकेले डेढ़ हजार पेड़ लगा चुके हैं। राहगीरों की प्यास बुझाने के स्वैच्छिक प्रयास भी अभी कम भले ही हुए हैं, बंद नहीं हुए हैं। यह भी नहीं कहा जा सकता कि जलसंकट के पारंपरिक और बेहद कम खर्चे वाले समाधान सुझाने वाली देशज ज्ञान से संपन्न प्रतिभायें नहीं रह गई हैं, लेकिन विडम्बना यह है कि सरकारों की ऐसी प्रतिभाओं और उनकी योजनाओं में दिलचस्पी नहीं है। जिन योजनाओं का बजट भारी भरकम न हो और जिनमें ‘जेबें भरने’ की गुंजाइश न हो, उनसे उनके सरोकार नहीं हैं। लेकिन यही हाल रहा और इस संकट को महज जल का संकट समझकर उसे फौरी उपायों के सहारे उस पर जैसे-तैसे पार पायी गयी और उसके असकी कारण दूर करने की ओर नहीं बढ़ा गया तो एक दिन हमारे गांव और शहर सब दुर्निवार संकटों के सामने खड़े दिखेंगे। सवाल यह है कि क्या हमारा तंत्र उस दिन से पहले चेतेगा? और जवाब यह कि उसे चेतना ही होगा, बशर्ते जब भी हमारी सरकार हमें 2024 तक देश की अर्थव्यवस्था के 5 लाख करोड़ डाॅलर की हो जाने का सपना दिखाये, हम उससे यह जरूर पूछें कि उस अर्थव्यवस्था में देश के सारे लोगों को पीने काे पानी मयस्सर होगा कि नहीं?

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