बुनियादी ढांचा ठीक करने की ज़रूरत

तकनीकी  शिक्षा

शशांक द्विवेदी भारत में उच्च शिक्षा की स्थिति दिनोंदिन दयनीय होती जा रही है। तकनीकी शिक्षा के वर्तमान सत्र में आंध्र प्रदेश में इंजीनियरिंग और अन्य पाठ्यक्रमों में शून्य अंक पाने वाले छात्रों को भी प्रवेश मिल रहा है क्योंकि इंजीनियरिंग, एग्रीकल्चर एंड मेडिकल के कॉमन इंट्रेस टेस्ट (ईएएमसीईटी) में बैठे इन छात्रों ने शून्य अंक पाने के बावजूद 12वीं कक्षा में 40 प्रतिशत से ज्यादा अंकों के आधार पर प्रवेश हासिल किये हैं। इस आधार पर संयुक्त प्रवेश परीक्षा में शून्य पाने वाले 78 में 22 छात्रों को दाखिला मिलेगा। राज्य में तकनीकी शिक्षा की कुल 32100 सीटों में 2012-13 में इंजीनियरिंग की करीब एक लाख सीटें खाली रहने का स्पष्ट अनुमान है। उच्च और तकनीकी शिक्षा के ये हालात देश के लगभग सभी राज्यों में हैं। एक तरफ सरकार देश में विदेशी तकनीकी विश्वविद्यालयों को लाने की बात कर रही है दूसरी तरफ देश के मौजूदा ढांचे को ठीक करने की फिक्र किसी को नहीं है। कुछ सालों से तकनीकी शिक्षा का बुनियादी ढांचा चरमरा रहा है और सरकार इसके प्रति गंभीरता से कोई कदम नहीं उठा रही है। देश में तकनीकी और विज्ञान की उच्च शिक्षा की हालत किसी से छिपी नहीं है। ले-देकर आईआईटी और कुछ इंजीनियरिंग कॉलेजों के भरोसे तकनीकी शिक्षा को थोड़ी-बहुत रफ्तार मिली हुई है। अगर हम आईआईटी, आईआईएम और कुछ अन्य गिने-चुने संस्थानों को छोड़ दें, तो पाते हैं कि उच्च शिक्षा का स्तर उभरते हुए भारत की आकांक्षाओं की पूर्ति करने में समर्थ नहीं है। अधिकतर भारतीय विश्वविद्यालय जिन्हें विश्वस्तरीय शोध और बौद्धिक गतिविधियों का केंद्र होना चाहिए था,आज वो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में बहुत पीछे है। भारत में उच्चशिक्षा की स्थिति पर नजर डालें तो शिखर पर कुछ केन्द्रीय विश्वविद्यालय, आईआईटी, आईआईएम, एम्स, एनआईटी जैसी 100 संस्थाएं हैं, जिनमें मुश्किल से एक लाख विद्यार्थी पढ़ते हैं। दूसरी तरफ देश में 538 विश्वविद्यालय और 26478 उच्चशिक्षा संस्थान हैं। जिनमें 1.60 करोड़ नौजवान भीड़ की तरह पढऩे-लिखने की सिर्फ कवायद करते हैं। कुल एनरोलमेंट के लिहाज से यह 12 प्रतिशत है जो ग्लोबल एवरेज से काफी कम है। जबकि केंद्र सरकार ने 2020 तक 30 प्रतिशत एनरोलमेंट का लक्ष्य रखा है। देश में संस्थानों की भीड़ बढ़ाने के लिए पिछले 30 वर्ष में बहुत सारे निजी संस्थान और डीम्ड यूनिवर्सिटीज़ भी खुली हैं, जिनका अपना कोई मानक और स्तर नहीं है, इसी वजह से तकनीकी शिक्षा के पिछले सत्र में पूरे देश में ढाई लाख से ज्यादा सीटें खाली रह गई थीं। इस बार भी ऐसी ही स्थिति बन रही है जिसमे बड़े पैमाने पर सीटें खाली रहेंगी। देश के 153 विश्वविद्यालयों तथा 9875 कॉलेजों में पर्याप्त बुनियादी ढांचे नहीं हैं। विश्व में उच्च शिक्षा ग्रहण करनेवाले छात्रों की संख्या चीन में सबसे अधिक दो करोड़ 53 लाख 50 हजार है जबकि अमेरिका में एक करोड़ 77 लाख 60 हज़ार। तीसरे स्थान पर भारत है जहां एक करोड़ 60 लाख छात्र हैं। लेकिन दाखिले के प्रतिशत की दृष्टि से भारत चीन, ब्राजील, रूस तथा अमेरिका से काफी पीछे है। विश्व का औसतन दाखिला 26 प्रतिशत है जबकि भारत का 12 प्रतिशत। जबकि देश के विकास के लिए हमें अधिक से अधिक योग्य इंजीनियर चाहिए। आज कोरिया में 95 चीन व जर्मनी में 80 आस्ट्रेलिया में 70, ब्रिटेन में 60 फीसदी युवक तकनीकी शिक्षा से लैस हैं, जबकि भारत में तकनीकी शिक्षा पाने वाले युवाओं का प्रतिशत महज 4.8 है। देश की आबादी में प्रतिवर्ष 2.8 करोड़ युवा जुड़ जाते हैं तथा 1.28 करोड़ युवाओं की लेबर फोर्स में एंट्री होती है, लेकिन इनमें से सिर्फ 25 लाख ट्रेंड होते हैं। जबकि जो रोजगार पैदा हो रहे हैं, उनमें 90 फीसदी ऐसे रोजगार हैं, जिनमें तकनीकी शिक्षा की जरूरत होती है। आधुनिक ज्ञान आधारित वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी पूर्ण क्षमता का दोहन करने के लिए भारत को विश्व के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और कालेजों की आवश्यकता है। उच्च शिक्षा का संकट संभवत किसी भी लोकतांत्रिक देश का सबसे गहन संकट होता है। यह संकट भारत के भविष्य को सीधे-सीधे प्रभावित करेगा। वास्तव में मौजूदा नीतियों के आधार पर विश्वस्तरीय संस्थान खड़े करना असंभव होगा। सिर्फ कुछ आईआईटी और आईआईएम के भरोसे हम विकसित राष्ट्र का सपना सच नहीं कर सकते। देश में तकनीकी शिक्षा की कुल सीटों में 95 प्रतिशत निजी कालेजों में हैं बाकी 5 प्रतिशत में आईआईटी, एनआईटी, ट्रिपल आईआईटी है जहां एडमीशन के लिए छात्रों में होड़ है लेकिन देश के विकास के लिए बाकी 95 प्रतिशत कालेजों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। हमें विश्वस्तरीय संस्थान खड़े करने के लिए एक ऐसी राष्ट्रीय नीति की जरूरत है, जो गुणवत्ता, पारदर्शिता, स्वायत्तता, विकेंद्रीकरण, जवाबदेही, विविधता और विश्व दृष्टि जैसे मूल्यों पर आधारित हो। आज देश के युवाओं को ऐसा तकनीकी ज्ञान मिले जो व्यावहारिक और रोजगारपरक हो, जिसे हम देश की परिस्थितियों के हिसाब से प्रयोग कर सकें। देश के नौजवान अपने आपको सिर्फ डिग्री लेने तक ही सीमित न रखें बल्कि उनके अन्दर कुछ सकारात्मक कर पाने के लिए एक उत्साह हो, समझ हो, विश्वास हो। वास्तव में तकनीकी और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बड़े सुधार किए जाने का समय आ गया है। इसमें सुधार के लिए बुनियादी स्तर से काम करना होगा। केंद्र सरकार को आंध्र प्रदेश जैसे उदाहरणों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है क्योंकि शून्य अंक पाने के बावजूद इंजीनियरिंग में प्रवेश से तकनीकी शिक्षा को बहुत नुकसान होगा और विश्वस्तर पर देश की छवि भी धूमिल होगी। तकनीकी शिक्षा के लिए सिर्फ ज्यादा संख्या में कॉलेज खोल देने और विदेशी विश्वविद्यालयों को आमंत्रित करने से कुछ हासिल नहीं होगा बल्कि उनमे गुणवत्ता के लिए पहले से ही कठोर मानक बनाने होंगे, जिनका कड़ाई से पालन किया जाये।

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