बिजली संकट से उपजी विकास की चिंताएं

बिजली संकट से उपजी विकास की चिंताएं

दवाब में ग्रिड

शशांक द्विवेदी          देश में बिजली-संकट लगातार गहराता जा रहा है। देश अभी नार्दर्न ग्रिड फेल होने के संकट से पूरी तरह उबर नहीं पाया था कि  नार्दर्न के साथ-साथ ईस्टर्न ग्रिड भी फेल हो गया । फिलहाल देश में काफी हद तक बिजली आपूर्ति बहाल कर दी गयी है । लेकिन इस संकट ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए है क्योंकि इसके चलते देश के 21  राज्यों में पावर सप्लाई ठप पड़ गई थी और लगभग 70 करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं  । देश में मेट्रो और रेल सेवाएं पूरी तरह से ठप पड़ गयी थीं ।  यह उभरते हुए भारत के लिए खतरनाक संकेत है । वास्तव में अगर इस बिजली-संकट को गंभीरता से नहीं लिया गया तो यह भारत के विकास के लिए सबसे बड़ा अभिशाप सिद्ध हो सकता है क्योंकि तरक्की का रास्ता ऊर्जा से ही होकर जाता है । देश में ऊर्जा संकट की  मुख्य वजह   बिजली की मांग व आपूर्ति के अंतर को लेकर है  । लेकिन पिछले दिनों लगभग पूरे भारत में एक साथ बिजली आपूर्ति  बंद होने का प्रमुख कारण देश के अधिकांश राज्यों द्वारा तय सीमा से ज्यादा बिजली उपयोग करने को लेकर है जिसकी वजह से ग्रिड फेल हो गए । देश का  नेशनल ग्रिड पांच क्षेत्रीय जोन में बंटा हुआ है । इस बंटवारे का मकसद बिजली के असमान वितरण पर अंकुश लगाना है । क्योंकि ग्रिड में से कौन राज्य कितनी बिजली लेगा, इसका कोटा तय होता है ।   इस बार ग्रिड के फेल होने की वजह उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब व जम्मू-कश्मीर द्वारा अपने निर्धारित कोटे से ज्यादा बिजली खींचने की कोशिश बतायी जा रही है। ग्रिड अमूमन एक छोटे से फ्रीक्वेंसी बैंड में काम करता है, जो कि 49.5 से 50.2 हट्र्ज के करीब होता है। उत्पादन में कमी की वजह से जब ग्रिड को कम बिजली मिलती है, या किसी इलाके में ज्यादा बिजली खींची जाने लगती है, तो यह फ्रीक्वेंसी नीचे चली जाती है । इसी तरह सप्लाई बढऩे या मांग में कमी होने पर फ्रीक्वेंसी ऊपर चली जाती है । बिजली की कमी के दौरान जब किसी प्वाइंट से तयशुदा कोटे से ज्यादा बिजली लेने की कोशिश होती है, तो  सिस्टम पर दबाव बनता है और वह लाइन ट्रिप हो जाती है । किसी एक ट्रांसफार्मर के ट्रिप हो जाने पर भी यह संकट आ सकता है। इस सिस्टम का लोड ग्रिड के दूसरे हिस्सों पर शिफ्ट हो जाता है । अगर वे सिस्टम भी पूरी तरह लोडेड या ओवर लोडेड हैं, तो वे भी ट्रिप होने लगते हैं और लोड शिफ्ट हो जाता है। यह सिलसिला पूरी ग्रिड को ठप कर देता है। पिछली बार 2001 में उत्तर प्रदेश में एक सब स्टेशन के ठप होने से पूरा नार्दर्न ग्रिड ठप पड़ गया था, उस समय स्थिति को सामान्य बनाने में करीब 18 घंटे का वक्त  लग गया था। उपर्युक्त  स्थिति से निकलने का एक ही रास्ता है कि पूरे बिजली क्षेत्र में जबरदस्त सुधार की प्रक्रिया शुरू की जाए। भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों इसके लिए सरकार को दो काम तुरंत करने चाहिए। पहला, बिजली प्लांटों को कोयले की आपूर्ति सुनिश्चित करवाए। दूसरा, राज्यों के बिजली वितरण निकायों को सुधारे। विशेषज्ञों का कहना है कि देश के आधे हिस्से में एकसाथ बिजली कटौती होने से काफी नकारात्मक संदेश जाएगा। यह न सिर्फ पावर क्षेत्र में निवेश करने की योजना बना रही कंपनियों को डरा सकता है, बल्कि अन्य उद्योगों में पैसा लगाने वाले उद्यमी दोबारा सोचने पर मजबूर हो सकते हैं। खास तौर पर सरकार अभी 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए बिजली परियोजनाओं को अंतिम रूप देने में लगी है। इस योजना में पहले 85 हजार मेगावाट बिजली क्षमता जोडऩे का लक्ष्य रखा गया था। अब आर्थिक विकास दर के घटने की संभावना को देखते हुए सरकार बिजली उत्पादन के संभावित लक्ष्य को भी कम करने पर विचार कर रही है। इस बारे में अगले महीने फैसला होगा। यह तो पहले ही साफ हो गया है कि 12वीं योजना में गैस आधारित बिजली प्लांट नहीं लगेंगे। इसी वजह से गैस आधारित बिजली प्लांटों का भविष्य अनिश्चित दिख रहा है । कोयले की अनिश्चितता से अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट भी लटके हैं । देश के कई राज्य बिजली क्षेत्र में सुधार को आगे बढ़ाने में सुस्ती दिखा रहे है। साथ में कई राज्यों में  बिजली वितरण निकायों की स्थिति बदहाल है । इन सबके साथ ही नीतिगत अस्पष्टता से बैंक प्राइवेट पावर प्लांट  को कर्ज देने में आनाकानी करते हैं जिससे इन योजनाओं पर असर पड़ता है । भारत में 22 हजार मेगावाट बिजली इसलिए नहीं बन पा रही है, क्योंकि उसके लिए पर्याप्त मात्रा में ईंधन नहीं है। वहीं, देश के अधिकांश हिस्से बिजली की भारी कमी से दो-चार हैं। पूरा बिजली क्षेत्र जबरदस्त संकट से गुजर रहा है। नई बिजली परियोजनाओं को कोयला लिंकेज नहीं मिल रहे हैं। जिन बिजली प्लांट को लिंकेज मिले भी हैं  उन्हें पर्याप्त कोयला नहीं मिल रहा है।   देश में  86 बिजलीघरों में कोयले को ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। उद्योग संगठन फिक्की के अनुसार कोयला आपूर्ति में बाधा नहीं दूर की गई तो देश की बिजली इकाइयों के सामने बंदी का संकट पैदा हो सकता है। यह जल्दी ही आने वाले बिजली संकट का संकेत है  जो कि देश के  विकास  को सीधे-सीधे प्रभावित करेगा । इसलिए अब हमें वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर गंभीरता से विचार करना होगा । ऊर्जा के बिना आर्थिक सुधार कार्यक्रमों का भी जारी रखना संभव नहीं हो सकेगा  इसलिए यह भारत के लिए सबसे बड़ा संकट है। लेकिन हमारी सरकार ने ऊर्जा के बारे में इन विभिन्न चुनौतियों को लगातार नजरअंदाज किया है।  देश के अधिकांश  बिजलीघर अपनी उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। इनमें निर्धारित क्षमता का पचास फीसदी उत्पादन भी नहीं होता है। देश में उत्पादित एक तिहाई से अधिक बिजली की डिस्ट्रीब्यूशन, लाइन लॉस के नाम पर चोरी की जाती है। बड़े-बड़े बकायेदारों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती। विकसित भारत के लक्ष्य को बिना  बिजली के कैसे प्राप्त किया जा सकता है? ऊर्जा किसी देश के विकास के इंजन का ईंधन है। प्रति व्यक्ति औसत ऊर्जा खपत वहां के जीवन स्तर की सूचक होती है। इस  दृष्टि से दुनियां के देशों में भारत का स्थान काफी नीचे है । देश की आबादी बढ़ रही है। बढ़ती आबादी के उपयोग के लिए और विकास को गति देने के लिए हमारी ऊर्जा की मांग भी बढ़ रही है। लेकिन उत्पादन में आशातीत बढोतरी नहीं हो पा रही है । पुरानी बिजली परियोजनाएं कभी पूरा उत्पादन कर नहीं पाईं, नई परियोजनाओं के लिए स्थितियां दूभर हैं। खतरा देश की तरक्की की रफ्तार के प्रभावित होने का है। बिजली के इस संकट को अगर अभी दूर नहीं किया गया तो भविष्य में देश के लिए सबसे बड़ा संकट साबित होगा ।

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