बासठ वर्ष का अन्तराल!

मधु गौतम

वर्तमान के वातायन से हर अतीत सुंदर लगता है हर डाली चंदन लगती है हर कानन नंदन लगता है। बासठ वर्ष पहले विद्यालय का मेरा पहला दिन आज भी मन महका जाता है। अपनी दो बड़ी बहनों को रोज़ यूनिफॉर्म पहन कर स्कूल जाते देख मेरा मन भी उनके साथ जाने को लालायित रहता था। जब मेरे विद्यालय जाने का दिन आया तो मैं खुशी-खुशी तैयार होकर अपनी बड़ी दीदी के साथ स्कूल चली गई। स्कूल पहुंच कर दीदी मुझे मेरी कक्षा पहली-ए में पहली पंक्ति के तीसरे डेस्क के सामने बिछी हुई दरी-पट्टी पर बिठा आयी। पास के डेस्क की दरी पर एक और छात्रा थी। उसने मेरा नाम पूछा, मैंने उसका। वो नीना थी। हमारी ऐसी मित्रता हुई जो आज तक कायम है। पहले दिन अध्यापिका ने सबके नाम पूछे, रजिस्टर में लिखे, मुझे कोई भय नहीं लगा। एक-दो बच्चे क्लास में सो गए। अध्यापिका ने बिना नाराज़ हुए सबको हाथ जोड़ने के लिए कहा और प्रार्थना सिखाई, ‘हम छोटे छोटे बच्चे हैं, हम भगवान से प्रार्थना करते हैं।’ फ़िर दो पंक्तियां स्वयं गाईं। ‘दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना।’ बच्चे इधर-उधर जा रहे थे। हमारी अध्यापिका ने संभवतः उन्हें व्यवस्थित करने के लिए एक कहानी सुनाई। उनका सुनाने का तरीका इतना सजीव था, लग रहा था घटनाएं सामने घट रहीं हों। कहानी शब्दशः तो याद नहीं किन्तु उसका भाव याद है, उनकी कहानी सुनाती हुई छवि अभी भी मन-मस्तिष्क में है--कहानी का भाव था कि दूसरों की सहायता करना अच्छा होता है, हमें दूसरों की मदद करनी चाहिए, ये भाव आज भी मुझे प्रेरणा देता है। पहले स्कूल में आजकल की तरह अतिरिक्त लाड़ नहीं करते थे, न ही दृश्य श्रव्य सामग्री का ज़्यादा प्रयोग होता था। एक तरह की सादगी पूरे वातावरण में विद्यमान थी, जिसकी छवि आज भी मेरे मस्तिष्क में अंकित है।

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