बाजवा का केस लड़ने वाले मंत्री फिर कैबिनेट में

इस्लामाबाद, 29 नवंबर (एजेंसी) पाकिस्तान के सेना अध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा को सेवा विस्तार देने के मामले में सुप्रीमकोर्ट में सरकार का पक्ष रखने के लिए कानून मंत्री के पद से त्यागपत्र देने वाले वकील फरोग नसीम को शुक्रवार को दोबारा संघीय मंत्रिपरिषद में शामिल कर लिया गया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने नसीम को संघीय मंत्री के रूप में शपथ दिलाई। हालांकि, उनको मिले विभाग के बारे में अभी विरोधाभासी खबरें आयी हैं। डॉन न्यूज की खबरों में कहा गया है कि नसीम को मिले मंत्रालय की घोषणा नहीं हुई है, जबकि एक्सप्रेस ट्रिब्यून और जियो न्यूज ने कहा कि उन्हें दोबारा कानून मंत्री के रूप में शपथ दिलाई गयी है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने 19 अगस्त को अधिसूचना जारी कर बाजवा का सेवाकाल बढ़ा दिया था, लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने सेवा विस्तार में अनियमितताओं का हवाला देते हुए उसे मंगलवार को रद्द कर दिया था। उसी दिन नसीम ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया और बाजवा के मुकदमे में सरकार का प्रतिनिधित्व करने का निर्णय किया था। प्रधानमंत्री के विशेष सहायक शहजाद अकबर ने कहा था कि नसीम ने स्वेच्छा से इस्तीफा दिया था, क्योंकि कानून मंत्री रहते हुए वह मुकदमा नहीं लड़ सकते थे। उन्होंने यह भी कहा था कि मुकदमा खत्म होने के बाद नसीम पुनः कैबिनेट मंत्री का पद संभालेंगे। बृहस्पतिवार को सुप्रीमकोर्ट ने बाजवा को शसर्त 6 महीने का सेवा विस्तार दिया। इमरान सरकार पर बरसा मीडिया पाकिस्तान में शुक्रवार को प्रमुख अखबारों ने देश के सेना प्रमुख के सेवा विस्तार से संबंधित संवेदनशील मामले से ‘मूर्खतापूर्ण' तरीके निपटने के लिए इमरान खान सरकार की निंदा की और कहा कि लोगों का उनके शासन पर भरोसा ‘सबसे अधिक घटा' है। ‘डॉन' अखबार ने अपने संपादकीय में लिखा कि तीन दिन चले जबरदस्त नाटक के बाद तंत्र को यह हल मिला और संभावित गतिरोध टल गया। अखबार ने लिखा कि सरकार ने 59 वर्षीय बाजवा के सेवा विस्तार को लेकर जब एक नया ‘सार' पेश किया तब यह फैसला सामने आया। यह फैसला उसी वक्त आया जब बाजवा बृहस्पतिवार आधी रात को सेवानिवृत्त होने वाले थे। ‘द न्यूज इंटरनेशनल' ने अपने संपादकीय में लिखा, ‘यह सरकार की सरासर नाकामी है और उसने जो गलती की है, जैसे मूल अधिसूचना पर इतनी जल्दबाजी में कार्रवाई करना और सेना अधिनियम के प्रावधानों या सैन्य नियमों से अनजान प्रतीत होना, यह सब भरोसा जीतने में मदद नहीं करेगा।' ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' ने संपादकीय में लिखा, ‘खुशकिस्मती से हम संकट से बाहर हैं, कम से कम फिलहाल तो।' ‘बिजनेस रिकॉर्डर' ने अपने संपादकीय में जोर दिया कि क्या शीर्ष अदालत ने इसे चुना है, यह तो सरकार और सेना के लिए बहुत बड़ी शर्मिंदगी है।

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