बहादुर जिसे अपना नहीं समझा गया

कहानी/ बहादुर अमरकांत अनुपम कुमार बारह-तेरह वर्ष की उम्र। ठिगना शरीर, गोरा रंग और चपटा मुंह। वह सफेद नेकर, आंधी बांह की ही सफेद कमीज और भूरे रंग के पुराने जूते पहने था। उसके गले में स्काउटों की तरह एक रुमाल बंधा था। उसको देखकर परिवार के अन्य लोग खड़े थे। यह परिचय किसी प्रतियोगिता में मेडल जीतने वाले किसी छात्र का नहीं बल्कि उस बच्चे का है जो मध्यवर्गीय समाज में बहुत सारे घरों की जिम्मेदारी संभाले रखता है। न काम का समय निर्धारित और न ही पगार। अपने कॅरियर की परवाह किए बिना दूसरों की इज्जत और शान के प्रतीक ऐसे आज हजारों बालक हैं जो गांव से लेकर शहर तक रोजमर्रा सुबह से शाम तक बड़े-बड़े घरों में काम में लगे रहते हैं। उनकी गिनती आमतौर पर नागरिक के रूप में नहीं की जाती है। उनकी सुध भी लेने वाला कोई नहीं होता। लेकिन लेखक अमरकांत का ‘बहादुर’ ऐसा ही बच्चा है जिसे उन्होंने अपनी संवेदना का पात्र बनाया है। अमरकांत की कहानी का यह बहादुर ऐसे पिता का बेटा है जिसने देश और समाज के लिए जान तो दे दी, लेकिन बदले में समाज ने उसे अनाथ घोषित कर दिया। लेखक आगे उसका परिचय देते हुए कहता है, शरारती स्वभाव के इस बालक को मां की पिटाई का खमियाजा भुगतना पड़ा। उसे घर से भागने को मजबूर होना पड़ा। उसका पूरा नाम दिलबहादुर था। लेकिन जब भागकर शहर में लेखक के घर नौकर के रूप में आया तो उसे शॉर्टकट में सब लोग ‘बहादुर’ कहने लगे। आमतौर पर कामचोर समझे जाने वाला यह बालक लेखक की नजर में हंसमुंख और मेहनती निकला। परिवार में जल्द ही घुलमिल गया। लेकिन कुछ दिन बाद उसके साथ बुरे बर्ताव शुरू हो गए। उसे एक फटी-पुरानी दरी मिल गई थी। रात को काम-धाम करने के बाद वह भीतर के बरामदे में एक टूटी हुई बंसखट पर अपना बिस्तर बिछाता था। जिस परिवार में वह नौकर बना, जिनकी सुख-सुविधाओं को ख्याल रखने लगा उनके दिन बदल गए। लेखक के शब्दों में, ‘दिन मजे में बीतने लगे।.....मैं अपने को ऊंचा महसूस करने लगा था।’ क्योंकि नौकर रखना समाज में अपना स्टेटस उंचा करना था। बहादुर की वजह से सबको खूब आराम मिल रहा था। आगे चलकर परिवार के सदस्य उस पर रौब-दाब करने लगे। लेखक के बड़े लड़के ने अपने सभी काम बहादुर को सौंप दिए। जब फरमाइश पूरी नहीं होती या गड़बड़ी हो जाती तो बहादुर को मिलने लगी गालियां और फिर मारपीट। स्थिति तो तब बदतर हो गई जब एक अतिथि के कहने पर परिवार के ज्यादातर लोग चोरी के आरोप में उस पर शक करने लगे। उसके साथ मारपीट की। इसके बाद घर के सभी लोग उसको कुत्ते की तरह दुरदुराया करते थे। घर के सदस्यों की इस हरकत और दुर्व्यवहार से एक दिन तंग आकर बहादुर बिना कुछ सामान और पगार लिए चुपके से भाग निकला। लोग अफसोस करने लगे। शहर छान मारा लेकिन बहादुर नहीं मिला। सबको अपने किए पर पछतावा होने लगा। उसके साथ किए गये अत्याचार पर लेखक को भी अपने को छोटे होने का बोध होने लगा। बहादुर उन लोगों को अपने किए का अहसास बखूबी करा रहा था। समाज में ऐसे बहादुर और भी हैं जिन्हें आए दिन इस तरह के अत्याचार, अन्याय और मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं। वह बहुत कुछ सहकर भी दूसरों की शान-शौकत और मान-मर्यादा को कायम रखे हुए है। जरूरत है उनके प्रति अपनी नजर बदलने की। उन्हें सही तरीके से देखने और समझने की।

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