बचपन की यादों के गलियारे से : The Dainik Tribune

बचपन की यादों के गलियारे से

बचपन की यादों के गलियारे से

पुस्तक समीक्षा

डॉ. ज्ञानचंद्र शर्मा

बैकुण्ठपुर का नाम पहले कभी नहीं सुना था। 'बैकुण्ठपुर में बचपन' पुस्तक जब हाथ में आई तो अनुमान लगाया होगी कोई 'अतिकाल्पनिक' रचना। इसके लेखक डॉ. कांति कुमार जैन को जितना मैंने पढ़ा था उसके आधार पर उनकी छवि एक गंभीर लेखक की ही बनती है। चाहता तो मैं भी लिफाफा देखकर खत का मज़मून भांप लेने की प्रवृत्ति के अनुरूप किताब की वर्क गिर्दानी कर और बहुत-सी भर्ती की सामग्री जोड़कर रचना के बारे में चंद पंक्तियां लिख सकता था, परन्तु डॉ. जैन इतना हल्के से लिये जाने वाले लेखक नहीं। इसी भाव से बैकुण्ठपुर में बचपन को भी पढऩा शुरू किया तो डूबकर पार उतरा।बैकुण्ठपुर में लेखक का बचपन बीता—जीवन का सर्वाधिक जिज्ञासापूर्ण और प्रभावग्राही काल। तब की स्मृतियों को उसने अपने जीवन की सबसे मूल्यवान संपदा कहा है। पाठक भी उससे संपन्न होता है। यह $कस्बा तबके छत्तीसगढ़ की भूतपूर्व रियासत कोरिया की राजधानी था। राजधानी कहने से चंडीगढ़, भोपाल या लखनऊ की कल्पना मत कर लीजिये। उसके बारे में तो कहावत थी 'बाघ धरे ना माहुर खाये, मरे का होये तो बैकुण्ठपुर जाये।' न बाघ से न ज़हर से, मरना हो तो बैकुण्ठपुर चले जायें। राज्य की ओर से जिसे सज़ा देनी हो उसे वहां भेज दिया जाता था, वैसे ही जैसे पचास साल पहले भूतपूर्व पैप्सु राज्य में कर्मचारियों को वहां के काला पानी नारनौल जाने का दंड दिया जाता था। तब बैकुण्ठपुर तक पहुंचना भी अति कठिन था। दुर्गम मार्ग, बीहड़ बन-पर्वत, नदियां-नाले, घने जंगल, वन्य जीव, आदिवासी बस्तियां; शहरी सभ्यता और संस्कृति से कोसों दूर । वहीं सन् 1939 में लेखक के पिता इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्ज़ के पद पर नियुक्त थे। तब लेखक सात बरस का बालक था। अगले नौ बरस उसने वहीं गुज़ारे। आज सत्तर बरस बाद उसका कहना है 'बैकुण्ठपुर मेरी स्मृतियों के भीतर तक जिंदा है। मेरा बचपन भी।' इस पुस्तक में न तो लेखक के बचपन का ब्योरेवार वर्णन है और न ही उस क्षेत्र के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अध्ययन।ऐसी रचनाओं में सबसे बड़ी आशंका 'मैं' के अत्यधिक दखल की रहती है जो बात-बेबात महत्वपूर्र्ण होने का यत्न करता है परन्तु 'बैकुण्ठपुर में बचपन' में वह लगभग $गायब है, महत्वपूर्ण है तो स्थान और वहां का परिवेश, वहां के वन पर्वत, जलस्रोत, वनस्पतियां, वन्य जीव, चीते, बाघ, तेंदुए, सांप, बिच्छू, मच्छर, आदिवासी, उनके रीति-रिवाज , खान-पान, रहन-सहन, कस्बाती ज़िंदगी, आचार-व्यवहार, खेलकूद, कुछ विशेष पात्र, उनका आचरण, सबकुछ एक शाब्दिक वृत्तचित्र जैसा।बहुत ही महत्वपूर्ण रहा होगा वह संपूर्र्ण परिवेश जिससे लेखक पाठकों को अवगत करवाता चलता है। वे स्वयं जैसे उसका हिस्सा बन जाते हैं। एक शब्दचित्र देखिये—'बैकुण्ठपुर दिखा-समूचा तो नहीं पर कुछ-कुछ अवश्य।' ठीक सड़क के किनारे मोरों का एक दल नृत्यमुद्रा में तल्लीन था। सड़क के दोनों ओर इंद्रधनुष—इतना रूप, इतने रंग, इतनी रम्यता। बैकुण्ठ यदि कहीं है तो बस यहीं है, यहीं है, यहीं है। लेखक की स्मृतियों में वह छवि कश्मीर के सौंदर्य के अनुरूप है। रचना में ऐसे वर्णन स्थान-प्रतिस्थान मिलेंगे।न शब्दाडम्बर, न पांडित्य का ढोंग। एक सहज अनुभूति। यह लेखक की ही नहीं पाठक का भी अतीत में समावर्तन है।०पुस्तक : बैकुण्ठपुर में बचपन ०लेखक : कान्ति कुमार जैन ०प्रकाशक : सामयिक बुक्स, नयी दिल्ली-110002, ०पृष्ठï संख्या: 224 ०मूल्य : रुपये 360/-.

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