फीमेल गेटअप में हीरो

असीम चक्रवर्ती आयुष्मान खुराना अपनी नई फिल्म ‘ड्रीमगर्ल’ के कई सीन में महिला के गेटअप में दिखाई दिये हैं। देखा जाए तो यह मसाला फिल्मों का ऐसा फॉर्मूला है जो कई एक फिल्मों में दोहराया जा चुका है। आयुष्मान कहते हैं-मुझे यह किरदार करने में बहुत मज़ा आया, क्योंकि यह पात्र कहानी का हिस्सा है। मेरे ख्याल से आगे भी महिला बनने में मुझे कोई गुरेज नहीं होगा। बशर्ते वह पात्र बेहद तार्किक हो।’ वैसे ऐसी ढेरों फिल्में हैं, जिनमें हीरो को किरदार की मांग के चलते लेडीज गेटअप धारण करना पड़ा है। अब जैसे कि साजिद खान की एक फिल्म ‘हमशक्ल’ में सैफ, रितेश और राम कपूर कुछ देर के लिए सजी-धजी युवती के रूप में दिखाई पड़े थे। कभी रानी मुखर्जी ने ‘दिल बोले हडिप्पा’ में पुरुष पात्र का रूप धरा था। सच तो यह है कि विपरीत लिंग के किरदार को अभिनीत करने का कौतूहल अभिनेता और अभिनेत्री दोनों में समान रूप से देखने को मिलता है। हालांकि इस मामले में हमारे हीरो ज्यादा भाग्यशाली साबित हुए हैं। बहुत कम नायिकाएं ही पर्दे पर पुरुष पात्रों को जीवंत करती नज़र आयी हैं, जबकि हमारे ज्यादातर हीरो ही महिला बन कर ढेरों फिल्मों में नायिका के साथ फ्लर्ट करते नज़र आये हैं। संजीदा अभिनेता नसीरुद्दीन शाह कहते हैं, ‘इस तरह के किरदार एक अजीब तरह का माहौल पैदा कर देते हैं। दर्शकों को मजा आता है और आपको एक तरह से जोकर बनकर दर्शकों का मनोरंजन करना पड़ता है। इससे बचने का कोई सवाल ही नहीं उठता क्योंकि ऐसा पात्र हमारे अभिनय का एक हिस्सा होता है।’ काॅमेडी पैदा करने की कोशिश नसीर की इस बात से स्वाभाविक रूप से अनिल शर्मा की फिल्म ‘तहलका’ की याद आना लाजिमी है। इसमें उन्होंने जावेद जाफरी और आदित्य पंचोली के साथ खुद भी युवती का रूप धर कर विलेन डांग यानी स्व. अमरीश पुरी के अड्डे पर खूब तहलका मचाया था। पर ये पात्र दर्शकों की दृष्टि में यादगार नहीं बन पाये। शोला और शबनम, आंटी नं. वन आदि कुछेक फिल्मों में जवां लड़की का रोल कर चुके अभिनेता गोविंदा कहते हैं, ‘इसकी एक बड़ी वजह यह है कि इस तरह के करेक्टर अक्सर हास्य पैदा करने के लिए पेश किए जाते हैं। जब भी हीरोइन का बाप या कोई रिश्तेदार, हीरो को उससे मिलने में अड़चनें पैदा करता है, हीरो को उसकी सहेली या आंटी बनकर उससे मिलना पड़ता है। जबकि हीरोइन के सामने ऐसी स्थिति कम ही आती है, उसे यदा-कदा ही किसी नये रूप में आना पड़ता है।’ अशोक कुमार, प्राण से लेकर शाहरुख खान-अक्षय तक ऐसे अभिनेताओं की एक लंबी फेहरिस्त है, जिन्होंने कभी न कभी महिला वेश धारण किया है। चुनौती भी कम नहीं याद है कभी फिल्म ‘अपना सपना मनी मनी’ में अभिनेता रितेश देशमुख ने एक युवती का रूप धरा था। इस फिल्म के प्रदर्शन से पहले उनके इस गेटअप की जितनी चर्चा हुई थी, फिल्म के आने के बाद यह रोल दर्शकों के लिए एक छलावा साबित हुआ। यह दीगर बात है कि इसमें रितेश के भाव-अभिव्यक्ति की काफी सराहना हुई थी, पर यह गेटअप उनके लिए विशिष्ट नहीं बना था। रितेश कहते हैं, ‘ऐसे रोल तभी विशेष बनते हैं, जब वो फिल्म की कहानी का अटूट हिस्सा हो। मेरा ख्याल है, ‘अपना सपना मनी मनी’ या ‘हमशक्ल’ में मेरे द्वारा निभाये गये किरदार में कोई कमी जरूर रह गयी थी।’ कई फिल्मों में इस तरह का गेटअप ले चुके हास्य अभिनेता जाॅनी लीवर इस किरदार को भी एक चुनौती की तरह लेते हैं, ‘मैं कोई उदाहरण नहीं देना चाहता हूं, लेकिन एक अच्छा अभिनेता ऐसे महिला पात्रों को भी यादगार बनाने की क्षमता रखता है।’ आमिर भी लगा चुके हैं 'बाज़ी' कमल या आमिर जैसे दो परफेक्शनिस्ट अभिनेताओं के संदर्भ में देखें तो यह एक बात एकदम तार्किक लगती है कि पर्दे पर कुछ नया करने का अंदाज एकदम ठूंसा हुआ नहीं लगता है। शायद यह भी वजह है कि टाटा स्काई के एड में महिला बने आमिर की अदा भी दर्शकों को लुभा गयी थी। बहुत कम लोगों को पता होगा कि 1996 में आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘बाजी’ में भी उन्होंने एक कैबरे नर्तकी जूली ब्रगेंजा के रोल में दर्शकों को काफी आकर्षित किया था। पर उनका यह किरदार फिल्म की कहानी का एक छोटा-सा हिस्सा था। 'आसां नहीं ऐसे किरदार' युवा डिजाइनर उमैर जाफर ने अभी हाल में अपनी एक नयी फिल्म के कुछ पात्रों के लिए ऐसी ड्रेस डिजाइनिंग की है। उमैर बताते है, ‘यदि आप संजीदा ढंग से कुछ करना चाहते हैं तो ऐसे पात्रों के लिए डिजाइन करना वाकई में बहुत कठिन होता है। चूंकि हमको पहले से पता होता है कि ये परिधान एक पुरुष पात्र को पहनाये जायेंगे, इसलिए अपनी ओर से हमें इस बात का विशेष ध्यान रखना पड़ता है कि उक्त परिधान को पहन कर वो पात्र महिला लगे।’ कभी रफूचक्कर में एक लड़की का रोल कर चुके अभिनेता ऋषि कपूर अपनी इस बहुत पुरानी फिल्म को एक रोचक अनुभव मानते हैं, ‘यदि इस तरह का पात्र कहानी का मुख्य हिस्सा हो तो यह वाकई में बहुत कठिन होता है। मैं रफूचक्कर के अपने रोल के बारे में किसी भी चर्चा को अप्रासंगिक मानता हूं, मगर ‘चाची 420’ में कमल को चाची के रोल में देखकर मैं दंग रह गया था। इस तरह से अपने आपको बदल कर प्रूव करना सारे अभिनेताओं के वश की बात नहीं है।’ उल्लेखनीय है कि कमल हासन ने उसके बाद ‘दशावतारम’ में एक नब्बे साल की वृद्धा का किरदार भी किया। ट्रेड विश्लेषक आमोद मेहरा कहते हैं, ‘अच्छे अभिनेता ही ऐसे रूप परिवर्तन में एक संजीदगी ला पाते हैं, वरना ज्यादातर मौकों पर किसी अभिनेता द्वारा निभाये गये ऐसे पात्रों को बहुत साधारण ढंग से लिया गया। ’ महिला पात्र को जीवंत करने वाले कुछ अभिनेता फिल्म 'लावारिस' के एक गाने 'मेरे अंगने में' के लिए महिला वाला किरदार निभाया था। उन्होंने गाने में कई बार कॉस्ट्यूम बदल कर अलग-अलग महिलाओं का किरदार निभाया था। संजय दत्त फिल्म 'मेरा फैसला' में महिला के किरदार में दिखे थे। ऋषि कपूर ने फिल्म 'रफूचक्कर' में बता दिया था कि वो खूबसूरत हीरोइन भी बन सकते हैं। सैफ अली खान और राम कपूर दोनों ने महिला वाले रोल से फिल्म 'हमशक्ल' में हमें हंसाया था। इनके अलावा अशोक कुमार, किशोर कुमार, विश्वजीत, जाॅय मुखर्जी, शम्मी कपूर, महमूद, शशि कपूर, पेंटल, विनोद मेहरा, अनिल कपूर, शाहरुख़ खान से लेकर यह फेहरिस्त बहुत लंबी है।

गेटअप अहम होता है -आमिर ‘मैं अपने गेटअप को लेकर शुरू से ही बहुत गंभीर रहा हूं। सिर्फ कुछ नया करने के लिए एक गेट अप ओढ़ लिया, यह बात मुझे पचती नहीं है। मैंने बहुत सोच-समझ कर ही अपनी एक फिल्म ‘बाजी’ में महिला बनना मंजूर किया था और यह जिम्मेदारी मैंने पूरी तरह से अपने मेकअप मैन पर नहीं छोड़ी थी। मुझे यह अच्छी तरह से मालूम था कि इस करेक्टर को पर्दे पर मुझे पेश करना है, इसलिए इसके गेटअप को लेकर मेरा संतुष्ट होना बहुत ज़रूरी था। आज भी वो बात कायम है। गजनी के लिए इसी तरह से मैंने अपना गेटअप बदला था। मगर मानना पड़ेगा कि महिला पात्रों का गेटअप बहुत कठिन होता है। इसके लिए आपको पूरी तरह से किरदार में डूब कर महिलाओं जैसे आचार-व्यवहार को आत्मसात करना पड़ता है। इससे खुद की संतुष्टि के साथ-साथ दर्शकों को भी मनोरंजन मिलता है।’

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