प्रेम से खिलता है भक्ति का फूल

ओशो सिद्धार्थ औलिया परम शिखर तक जाने के अनेक मार्ग हैं। उनमें से आठ मुख्य हैं। ये आठों हमारे शरीर के आठ चक्रों से संबंधित हैं। भक्तियोग का संबंध अनाहत या हृदय चक्र से है और प्रेम तथा राग भी इसी चक्र से संबंधित हैं। राग अथवा प्रेम के मार्ग से जो यात्रा हम चैतन्य की करते हैं, अपनी आत्मा तक की जो यात्रा हम हृदय के मार्ग से करते हैं, उसी का नाम है- भक्तियोग। यह प्रेम का, हृदय का, भाव का, श्रद्धा का मार्ग है। प्रेम योग कैसे बन सकता है? सूफी कहते हैं, प्रेम-प्रेम में भी भेद है। लेकिन जिसे लौकिक प्रेम का अनुभव नहीं है, उसे पारलौकिक प्रेम का अनुभव होना कठिन है। संवेदना ही किसी को बुद्ध, नानक या कबीर बनाती है। संवेदनहीनता हमें बुद्धू बना देती है। बुद्धू से बुद्धत्व तक की यात्रा संवेदना की यात्रा है। संवेदना न हो तो हृदय पाषाण हो जाए। अगर आपके पास हृदय है तो आपको प्रेम होगा ही, चाहे जिससे हो। प्रेम भाई से हो कि पत्नी से, प्रेमिका से हो या प्रेमी से, आपका प्रेम किससे है, यह बात गौण है। आपको प्रेम है, यह है मुख्य बात। अगर संसार में ऐसा कोई न हो जिसे आप प्रेम कर सकें, जिसे आप अपना कह सकें तो फिर जीने का उद्देश्य भी क्या है? यह जीवन तभी तक प्यारा है, जब तक आपके जीवन में कोई ऐसा हो जिसे आप अपना कह सकें। जब आप प्रेम के लिए किसी की ओर हाथ बढ़ाते हैं तो दूसरा भी आपको प्रेम करने लगता है। अगर आपको किसी से प्रेम न हो और आप सोचें कि जगत आपको प्रेम करे, तो यह संभव नहीं। हम जो देते हैं, जगत वही हजार-हजार गुना करके हमें लौटाता है। इसलिए, जिसे प्रेम की आकांक्षा हो, वह पहले देना सीखे। तभी वह घड़ी आएगी जब कोई आपको भी प्रेम करेगा और आप पाएंगे कि कोई है, जिसकी जिंदगी में आप अहम स्थान रखते हैं, जिसके लिए आपका होना जरूरी है। तब पहली बार आपको अपना मूल्य समझ में आता है और आप स्वयं को भी प्रेम करना शुरू कर देते हैं। इसी प्रेम से भक्तियोग की शुरुआत होती है। इसकी दो दिशाएं हैं- आत्मविस्मरण और आत्मस्मरण। जब आप किसी को इस प्रकार प्रेम करते हैं जो आपको आत्मविस्मरण में ले जाए, तो वह अशुद्ध प्रेम है, क्योंकि वह आपको वासना की ओर ले जा रहा है। वह प्रेम जिसमें आप खुद को भूल जाएं, आपको स्वयं का ही स्मरण न रह जाए, वह शुद्ध प्रेम नहीं हो सकता। शुद्ध प्रेम आपको आत्मस्मरण में ले जाता है। जब आप किसी को याद करते हैं, तो आपकी चेतना उसकी ओर जाती है और तब आप अपने को भूल जाते हैं। लेकिन आप किसी को यदि ऐसे याद करें कि मानो उसके प्रेम की तरंगें आपकी ओर आ रही हैं तो यह हुआ स्वकेंद्रित प्रेम। यही शुद्ध प्रेम है। तब आप अपने को भूल न सकेंगे। तब आप दुखी या चिंतित भी नहीं हो पाएंगे। वासनारहित प्रेम वरदान है। सामान्यतः, प्रेमी दुखी हो जाते हैं क्योंकि प्रेम करने की कला उनको नहीं आती। असली प्रेम वह है जो आपको स्वकेंद्रित प्रेम में ले जाता है और जब आप ऐसा महसूस करने लगें कि आपके प्रेमपात्र की प्रेम तरंगें आपकी ओर बरसात के झोंके की तरह आ रही हैं तो वही है शुद्ध प्रेम। इसी भावदशा में प्रेमयोग की पूर्णता है। यह प्रेम योग ही भक्तियोग का पहला कदम है। जो प्रेम कर सकते हैं, भक्तियोग उन्हीं के लिए है। प्रेम और श्रद्धा में है अंतर प्रेम और श्रद्धा में थोड़ा भेद है। प्रेम बराबर वालों में होता है, श्रद्धा अपने से बड़ों के प्रति होती है, जैसे-माता-पिता या गुरु के प्रति। प्रेम का ऊर्ध्व रूप है- श्रद्धा। प्रेम का अर्थ है- आप देना चाहते हैं और स्वयं को देने लायक समझते हैं। देने का भाव ही प्रेम है। श्रद्धा में भी आप देना तो चाहते हैं, लेकिन आपके भीतर भाव यह रहता है कि हमारे पास है ही क्या देने को? गुरु के प्रति ऐसा ही भाव होता है शिष्य के भीतर। श्रद्धा का अर्थ है कि आपके भीतर सब कुछ दे देने का मन है, लेकिन आप देने के लिए स्वयं को अपात्र समझते हैं। किंतु, यदि श्रद्धा ऐसी हो, आप अपने गुरु का स्मरण ऐसे करते हों कि स्वयं को ही भूल जाएं और आपकी चेतना में केवल आपके गुरु ही शेष रह जाएं तो यह भी श्रद्धा का अशुद्ध रूप है। अपना ख्याल जिसे बिल्कुल नहीं रह जाता, वह अंधश्रद्धा में होता है। गुरु का स्मरण भी ऐसे होना चाहिए, मानो गुरु का आशीष आप पर बरस रहा है और आप उसकी बारिश में भीग रहे हैं। ऐसी स्वकेंद्रित श्रद्धा ही शुद्ध श्रद्धा है। निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज स्वामी विवेकानंद ने ‘भक्ति-योग’ पुस्तक में लिखा है कि निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज ही भक्तियोग है। इस खोज का आरंभ, मध्य और अंत प्रेम में होता है। नारद अपने भक्तिसूत्र में कहते हैं, ‘भगवान का परम प्रेम ही भक्ति है। जब मनुष्य इसे प्राप्त कर लेता है, तो सभी उसके प्रेम-पात्र बन जाते हैं। वह किसी से घृणा नहीं करता; वह सदा के लिए संतुष्ट हो जाता है। इस प्रेम से किसी काम्य वस्तु की प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जब तक सांसारिक वासनाएं घर किये रहती हैं, तब तक प्रेम का उदय ही नहीं होता। भक्ति स्वयं ही साध्य और साधनस्वरूप है।’ भक्तियोग का एक बड़ा लाभ यह है कि वह हमारे चरम लक्ष्य (ईश्वर) की प्राप्ति का सब से सरल और स्वाभाविक मार्ग है।

(लेखक ओशोधारा के संस्थापक हैं)

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