प्रेम की राह से ईश्वर की खोज

स्वामी विवेकानंद का मंत्र निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज को भक्तियोग कहते हैं। इस खोज का आरंभ, मध्य और अंत प्रेम में होता है। ईश्वर के प्रति एक क्षण की भी प्रेमोन्मतता हमारे लिए शाश्वत मुक्ति देने वाली होती है। भक्तिसूत्र में नारदजी कहते हैं, भगवान के प्रति उत्कट प्रेम ही भक्ति है। जब मनुष्य इसे प्राप्त कर लेता है, तो सभी उसके प्रेम-पात्र बन जाते हैं। वह किसी से घृणा नहीं करता, वह सदा के लिए संतुष्ट हो जाता है। इस प्रेम से किसी काम्य वस्तु की प्राप्ति नहीं हो सकती, क्याेंकि जब तक सांसारिक वासनाएं घर किये रहती हैं, तब तक इस प्रेम का उदय ही नहीं होता। क्योंकि इन सबका एक न एक लक्ष्य है, पर भक्ति स्वयं ही साध्य और साधनस्वरूप है। भक्तियोग का एक बड़ा लाभ यह है कि वह हमारे चरम लक्ष्य (ईश्वर) की प्राप्ति का सबसे सरल और स्वाभाविक मार्ग है। पर साथ ही उससे एक विशेष भय की आशंका यह है कि वह अपनी निम्न या गौणी अवस्था में मनुष्य को बहुधा भयानक मतान्ध और कट्टर बना देता है। हिंदू, इस्लाम या ईसाई धर्म में जहां कहीं इस प्रकार के धर्मान्ध व्यक्तियों के दल हैं, वह सदैव ऐसे ही निम्न श्रेणी के भक्तों द्वारा गठित हुए हैं। वह इष्ट-निष्ठा, जिसके बिना यथार्थ प्रेम का विकास संभव नहीं, अक्सर दूसरे सब धर्मों की निंदा का भी कारण बन जाती है। प्रत्येक धर्म और देश में जितने सब दुर्बल और अविकसित बुदि्ध वाले मनुष्य हैं, वे अपने आदर्श से प्रेम करने का एक ही उपाय जानते हैं और वह है अन्य सभी आदर्शों को घृणा की दृष्टि से देखना। पर यह आशंका भक्ति की केवल निम्नतर अवस्था में रहती है। इस अवस्था को ‘गौणी’ कहते हैं। लेकिन जब भक्ति परिपक्व होकर उस अवस्था को प्राप्त हो जाती है, जिसे हम ‘परा’ कहते हैं, तब इस प्रकार की भयानक मतान्धता और कट्टरता की फिर आशंका नहीं रह जाती। इस ‘परा’ भक्ति से अभिभूत व्यक्ति प्रेमस्वरूप भगवान के इतने निकट पहुंच जाता है कि वह फिर दूसरे के प्रति घृणा-भाव के विस्तार का यंत्रस्वरूप नहीं हो सकता है। समष्टि से प्रेम किये बिना हम व्यष्टि से प्रेम कैसे कर सकते हैं? ईश्वर ही वह समष्टि है। सारे विश्व का यदि एक अखंड रूप से चिंतन किया जाये, तो वही ईश्वर है, उसे अलग-अलग रूप में देखने पर वही यह दृश्यमान संसार है- व्यष्टि है। भक्त कहता है, ‘सब कुछ उन्हीं का है, वे मेरे प्रियतम हैं, मैं उनसे प्रेम करता हूं।’ इस प्रकार भक्त को सब कुछ पवित्र प्रतीत होने लगता है, क्योंकि वह सब आखिर उन्हीं का तो है। सभी उनकी संतान हैं, उनके अंग-स्वरूप हैं। उनके रूप हैं। तब फिर हम किसी को कैसे चोट पहुंचा सकते हैं? दूसरों को बिना प्यार किये हम कैसे रह सकते हैं? भगवान के प्रति प्रेम के साथ ही, सर्व भूतों के प्रति प्रेम अवश्य आएगा। हम भगवान के जितने समीप जाते हैं, उतने ही अधिक स्पष्ट रूप से देखते हैं कि सब कुछ उन्हीं में है। ज्ञान, भक्ति और योग यह संभव नहीं कि इसी जीवन में हममें से प्रत्येक, सामंजस्य के साथ अपना चरित्रगठन कर सके, फिर भी हम जानते हैं कि जिस चरित्र में ज्ञान, भक्ति और योग- इन तीनों का सुंदर सम्मिश्रण है, वही सर्वोत्तम कोटि का है। एक पक्षी को उड़ने के लिए तीन अंगों की आवश्यकता होती है- दो पंख और पतवारस्वरूप एक पूंछ। ज्ञान और भक्ति मानो दो पंख हैं और योग पूंछ, जो सामंजस्य बनाये रखता है। जो इन तीनों साधनाप्रणालियों का एक साथ, सामंजस्य सहित अनुष्ठान नहीं कर सकते और इसलिए केवल भक्ति को अपने मार्ग के रूप में अपना लेते हैं, उन्हें यह सदैव स्मरण रखना आवश्यक है कि यद्यपि बाह्य अनुष्ठान और क्रियाकलाप आरंभिक दशा में नितांत आवश्यक हैं, फिर भी भगवान के प्रति प्रगाढ़ प्रेम उत्पन्न कर देने के अतिरिक्त उनकी और कोई उपयोगिता नहीं। पूर्ण ज्ञान, पूर्ण भक्ति यद्यपि ज्ञान और भक्ति दोनों ही मार्गों के अाचार्यों का भक्ति के प्रभाव में विश्वास है, फिर भी दोनों में कुछ थोड़ा-सा मतभेद है। ज्ञानी की दृष्टि में भक्ति मुक्ति का एक साधन-मात्र है, पर भक्त के लिए वह साधन भी है और साध्य भी। मेरी दृष्टि में तो यह भेद नाममात्र है। वास्तव में जब भक्ति को हम एक साधन के रूप में लेते हैं, तो उसका अर्थ केवल निम्न स्तर की उपासना होता है। और यह निम्न स्तर की उपासना ही आगे चलकर ‘परा’ भक्ति में परिणत हो जाती है। ज्ञानी और भक्त दोनों ही अपनी-अपनी साधना-प्रणाली पर िवशेष जोर देते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि पूर्ण भक्ति के उदय होने से पूर्ण ज्ञान बिना मांगे ही प्राप्त हो जाता है अौर इसी प्रकार पूर्ण ज्ञान के साथ पूर्ण भक्ति भी स्वयं ही आ जाती है।

(स्वामी विवेकानंद की ‘भक्तियोग’ से साभार)

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