प्रवासी पक्षियों की नैसर्गिक यात्राएं

रमेश चन्द्र त्रिपाठी

अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी से दूर कुछ दिन कहीं प्रवास पर जाकर सुकून के दिन बिताना किसे अच्छा नहीं लगता? बदलाव की यह नैसर्गिक आकांक्षा सिर्फ इनसानों में ही नहीं अपितु पक्षियों में भी पाई जाती है। तेज बारिश एवं कड़ी धूप में भी हजारों मील का सफर तय करके पक्षी अपने पर्यटन की आकांक्षा पूरी करते हैं। भारत में शरद ऋतु के प्रारम्भ होने के साथ ही प्रवासी विदेशी पक्षियों का आना शुरू हो जाता है। भारत के विभिन्न अभयारण्य के जल-थल एवं नभ पर विविध गुंजन, कूक-कलरव क्रीड़ारत चित्ताकर्षक महाकुंभ का दृश्य उपास्थित करते हैं। ये पक्षी कुछ समय के प्रवास के लिए 15-20 हजार फीट ऊंची बर्फीली चोटियों को पार कर एशिया एवं उत्तरी यूरोप से भारत के आंतरिक क्षेत्रों में आते हैं। पंजाब से केरल, गुजरात से असम तक ये पक्षी अपने अनुकूल प्रवास के लिए अपने स्थान को चुन लेते हैं। राजस्थान के भरतपुर केशेतर के घना पक्षी अभयारण्य व केवला देव राष्ट्रीय उद्यान तथा मध्य प्रदेश के शिवपुरी क्षेत्र के दिहाला झील और बरखेड़ा तालाब में प्रति वर्ष सौ प्रकार की जातियों से भी अधिक के पक्षी प्रवास के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। काफी समय से वैज्ञानिक यह जानने की प्रयास कर रहे हैं कि ये पर्यटक पक्षी किन कारणों से इतनी लंबी यात्राएं करते हैं? इनका मार्ग निर्देशन कौन करता है? कौन इन्हें उपयुक्त समय की सूचना देता है? किस प्रयोजन से बच्चे, बूढ़े, जवान पक्षी अपनी मंजिल की ओर द्रुत गति से चले जाते हैं। पक्षी विशेषज्ञों ने इस संबंध में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए निरंतर अनेक प्रयोग किये, किन्तु इस संबंध में बहुत-सी अभी भी अबूझ हैं। इसके लिए एक तरीका अपनाया गया है, जो लाभदायक सिद्ध हुआ है और वह है इन पर्यटक पक्षियों के पैरों में धातु के बने छल्ले पहना देना। छल्ले पर छल्ले पहनाने वाले का नाम, पता व छोटा सा अनुरोध लिखा रहता है कि यदि कोई इस पक्षी का शिकार करे तो इस छल्ले पर लिखे पते पर शिकार के स्थान का उल्लेख करते हुए वापस कर दे। यह विधि लगभग 65 वर्षों से सफल रूप में लायी जा रही है। इससे यह पता चलता है कि पर्यटक पक्षी 2000 मील की यात्रा करते हैं। कई खंजन पक्षी जो सिर्फ शरद ऋतु में उत्तर भारत में दिखाई देते हैं, सुदूर साईबेरिया में मारे गए। उनके पैर के छल्लों को देखने से यह मालूम हुआ कि वे छल्ले उन्हें जाड़े के दिनों में सिंधु तीर पर भारत में उन्हें पहनाए गए थे। यह भी पता चला है कि कुछ पक्षी 27000 मील तक का सफर भी करते हैं। इंग्लैंड में एक ऐसी जाति है, जिसमें वयस्क और बूढ़े पक्षी पहले उड़कर चले जाते हैं और बच्चों को पीछे आने का आदेश दे जाते हैं। यह बच्चे बिना किसी अनुभव के लंबे अनजान रास्ते को तय करते हैं और परिवार के वयस्कों के पास ठीक जगह के पास पहुंच जाते हैं। किस प्रकार ये अपना रास्ता सही-सही तय कर लेते हैं, यह जानकारी अभी पूरी नहीं मिल पाई है। सैलानी पक्षी समूह में तथा एकाकी प्रति वर्ष हजारों-लाखों की संख्या में एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश की यात्रा करते हैं। हिमालय की ऊंचाइयां एवं प्रशांत महासागर की गहराइयां भी मार्ग की बाधाएं नहीं बन पातीं। ये पक्षी खासकर, शरद ऋतु में देखने को मिलते हैं। ऋतु समाप्त होते ही वे अदृश्य हो जाते हैं और दूसरे वर्ष उसी ऋतु के आरंभ होते ही पुनः आ जाते हैं। छोटी-छोटी जैसे गौरैया आदि फसल तैयार होने के समय किसी अज्ञात प्रेरणाशक्ति द्वारा शहरी इलाके को छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों की ओर उड़ जाती है। ऐसा ये इसलिए करती हैं ताकि उन्हें खेत में गिरे दाने अथवा फसल चुगने का अवसर मिले। फसल कट जाने के बाद जब खेत अन्न कणों से रिक्त हो जाते हैं, तब वे पुनः वापस हो जाती हैं। भारत के प्रमुख पर्यटक पक्षियों में खंजन, राजहंस एवं चक्रवाक हैं। हंसों का सबसे प्रिय निवास स्थान मानसरोवर है। पहचानने के अतिरिक्त कुछ और परीक्षण भी इस विषय पर विस्तृत जानकारी हासिल करने के लिए किए गए हैं। इनमें से एक है बर्डकास्ट नामक एक कार्यक्रम द्वारा रडारों से पक्षियों के प्रवास की पूरी जानकारी एकत्र करना। एक अन्य तकनीक बायोएकास्टिक यह बता पाएगी कि आसमान में उड़ने वाले पक्षी कौन सी प्रजाति के हैं। प्रवास का दृश्य सूर्यास्त में दिखने वाले पक्षियों के झुंड से अलग होता है। साथ ही बड़ा भी। ये सिर्फ एक छोटा झुंड न होकर सैकड़ों-हजारों पक्षियों का होता है। पक्षी विज्ञान की इस राडार कार्यक्रम बर्डकास्ट द्वारा पक्षी प्रवास को ऑनलाइन फोरकास्ट किया जाता है।

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