प्रभाती गाइए, नन्हो को जगाइए

कृष्णलता यादव

जिस प्रकार बच्चे को सुलाने के लिए लोरी गाई जाती है, उसी प्रकार उसे जगाने के लिए प्रभाती गाई जाती है। प्रभाती को ‘जागरण गीत’ भी कहते हैं। इसमें सूर्योदय से कुछ समय पहले से लेकर कुछ समय बाद तक का वर्णन होता है। प्रभातियों का भावक्षेत्र व्यापक और दैनिक जि़न्दगी के अधिक निकट होता है। इनमें केवल कोमल भावनाएं ही नहीं बल्कि वीरता, साहस और उत्साह की बातें भी कही जाती हैं। कुछ कवियों ने तो प्रभातियों में राष्ट्रीय प्रेम के भाव भी पिरोए हैं। प्रभाती सीखने के लिए प्रशिक्षण की ज़रूरत नहीं होती। एक ने गाई, दूसरी ने अपनाई और तीसरी तक पहुंचाई—गीतों की माला के रूप में। स्पष्ट है कि प्रभाती गढ़ने के लिए कागज-कलम लेकर नहीं बैठना होता। इनके बोल अपने आप होंठों पर आते चले जाते हैं। इनमें छंद का ध्यान नहीं रखा जाता। तुकबंदी व गेयता का ध्यान ज़रूर रखा जाता है। प्रभाती सुनाकर नन्हो को नींद से जगाना आसान होता है। इससे अभिभावक व बच्चे के रिश्ते में अधिक प्रगाढ़ता-तरलता आती है। बच्चा ठुनकना छोड़कर, संगीत-संसार से सम्बंध जोड़कर बिस्तर छोड़ देता है। जगाने वाले को भी सुकून मिलता है कि चलो बिना ज्यादा हीला-हवाली के बच्चा समय पर जाग गया है। आज की व्यस्त दिनचर्या में अभिभावकों के पास या तो प्रभाती गाने का समय नहीं या इसे अनावश्यक कहकर उपेक्षित किया जाता है। कभी-कभी इसके महत्व की भी जानकारी नहीं होती। सच तो यह है कि अभिभावकों का सामाजिक, आर्थिक स्तर कुछ भी हो, प्रभाती साझी बपौती है, जिसे हर क्षेत्र में वहां की स्थानीय बोली में गाया जाता है और सच मानें तो गायक-श्रोता दोनों निहाल हो जाते हैं। आप भी प्रभाती गढ़िए और नए-पुराने को मिलाकर अपने नन्हे-मुन्नों को संगीत-लोक की सैर कराइए। दावा है, इसमें खोना कुछ नहीं, पाना ही पाना है। बानगी स्वरूप प्रस्तुत हैं चंद मौलिक प्रभातियां - मुन्नी जागो, रात गई, सपनों वाली बात गई। उठो करो सबको प्रणाम, उसके बाद संभालो काम। मंजन-अंजन, नहाना-धोना, समय कीमती तुम न खोना। कुहु-कुहु कर कोयल बोली, चिड़ियों ने गाया सहगान। अब उठ जाओ सोने वालो, मुख पर लिए मधुर मुस्कान।। रात गई अब हुआ सवेरा, किरणों ने डाला है डेरा। बोलो-बोलो तुम क्यों मौन? देर तलक सोया है कौन ? मुर्गा बोला कुकड़ू कू, हुआ सवेरा सोया क्यूं? मुन्ने अपना बिस्तर त्याग, देखो समय रहा है भाग। चिड़िया और कबूतर बोले, डाली-डाली कौआ डोले। नाच रहा बगिया में मोर, जागो-जागो हो गई भोर। खो देता है सोने वाला, जगने वाला पाता है। सही समय पर उठने वाला, बालक सबको भाता है।।

टिक-टिक करती घड़ी चली, सर-सर करती पवन बही। झटपट कर जो बिस्तर छोड़े, शाला पहुंचे समय सही।।

पूर्व दिशा से सूरज आया, संग अपने उजियारा लाया। तुम भी अपना बिस्तर छोड़ो, निंदिया से अब नाता तोड़ो। सही समय पर सदा उठेंगे, दुनिया की हम सैर करेंगे। पार करें पर्वत मैदान, देखे जगत हमारी शान। सबसे पहले जगने वाला, चांद खिलौना पाएगा। चंदा के संग तारे पाकर, खिल-खिल हंसता जाएगा।।

झूला झूले प्यारी मुनिया, मन ही मन मुस्काती है। दादी जी से प्रभाती सुन, ठीक समय उठ जाती है।।

टिम-टिम करते तारे बोले, समय हुआ अब जाने का। तुम भी उठो घूम लो दुनिया, समय नहीं सुस्ताने का।।

मीठी-मीठी लोरी गाकर, मम्मी तुझे सुलाती है। प्रभाती की टेर लगाकर, दादी तुझे जगाती है।।

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