प्रकाश पर्व का यथार्थ

ज्ञाानेन्द्र रावत दीवाली कहें या ज्योति पर्व, प्रकाश पर्व कहें या दीपोत्सव, शरद ऋतु के प्रमुख पर्व के रूप में जानी जाती है। इस पर्व पर हमारे यहां ज्योति और प्रकाश की पूजा की प्राचीन परंपरा है। वेदों से लेकर आज तक हमारे देश में किसी न किसी रूप में भगवान सूर्य की पूजा की जाती रही है। मां गायत्री मंत्र यथार्थ में सूर्योपासना का ही मंत्र है। समूचे विश्व में प्रकाश का एकमात्र अनादि और अनंत स्रोत सूर्य ही है। विश्व की प्राचीन संस्कृतियों में बुद्धि को प्रकाश की प्रतिमूर्ति माना गया है। उत्तर वैदिक काल में आकाशदीप के विधान से इसका उल्लेख मिलता है। हमारे शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध पक्ष में अपने पुरखों का आह्वान किया जाता है। इसके उपरांत जब हमारे पूर्वज अपने लोकों को लौटते हैं तो उन्हें दीपक के ज़रिये मार्ग दिखाया जाता है। इसे आकाशदीप कहते हैं। इसे किसी बांस पर बहुत ऊंचाई पर टांग दिया जाता है। आकाशदीप की परंपरा यूनान, चीन, थाईलैंड, जापान और दक्षिण अमेरिका में आज भी दिखाई देती है। बेथेलहम में भी इसका उल्लेख है। इन देशों में आकाशदीप जलाया जाना धार्मिक परंपरा का प्रमुख अंग है। भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या आगमन पर अयोध्या के लोगों ने अपने मकानों की छतों पर ऊंचे बांसों पर आकाशदीप टांगे थे ताकि भगवान राम दीपों को देखकर यह समझ लें कि यही अयोध्या है। प्राचीन काल में राजा और प्रजा सभी कार्तिक माह शुरू होते ही आकाशदीप का जलाना शुभ मानते थे। उस समय इसका काफी महत्व था। खगोल शास्त्रियों का तर्क गौरतलब है और खगोल शास्त्रियों की भी यह स्पष्ट मान्यता है कि आश्विन और कार्तिक तथा फाल्गुन और चैत्र मास के दिनों में दो बार सूर्य विषवत रेखा पर होता है, इसलिए इसे शरद सम्पात और वसंत सम्पात कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे आरमूनल एक्विनोक्स और वर्नल एक्विनोक्स कहते हैं। इस बीच दिन और रात बराबर होते हैं। प्राचीन काल से ही ऐसे समय उत्सवों और त्योहारों के मनाये जाने का उल्लेख मिलता है। इस अवसर पर हर्षातिरेक में जलाशयों, नदियों और नावों पर दीप जलाए जाते थे। इस तरह प्रकाश पर्व मनाने की परंपरा, प्रथा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। इसे नकारा नहीं जा सकता। यदि प्राकृत गाथा सप्तशती की मानें तो उसके अनुसार दीपोत्सव का समय दो हजार वर्ष से भी पहले का माना गया है। इसमें महिलाओं द्वारा दीपक रखकर किसी पर्व को मनाए जाने का उल्लेख है। वात्सयायन के कामसूत्र में अमावस्या को यक्षरात्रि उत्सव मनाए जाने का उल्लेख मिलता है। इसमें संगीत, नृत्य और अन्य क्रीड़ाओं के साथ खुशियां मनायी जाती हैं। यक्ष संस्कृति को हमारे यहां जीवन के स्वस्थ उपभोग की संस्कृति के रूप में माना गया है। उसी आधार पर कार्तिक माह की अमावस्या को परंपरानुसार इस तरह के उत्सव आयोजित किए जाने के उल्लेख मिलते हैं। ज्योति पर्व का महत्व दरअसल दीवाली का पर्व प्रकाश पर्व है और इस पर्व को प्रकाशमान करता है दीपक, जिसका महत्व इस पर्व पर सर्वोपरि है। इस तथ्य को स्पष्ट और परिभाषित करते हुए ओशो यानी रजनीश का कहना है कि इस अवसर पर मिट्टी के दीये में ज्योति जलाना इस बात का प्रतीक है कि मिट्टी के दीये में अमृत ज्योति संभाली जा सकती है क्योंकि मिट्टी पृथ्वी की और ज्योति प्रकाश का प्रतीक है। मिट्टी के दीयों की जगमगाती माला यथार्थ में ज्योति पर्व का नाम सार्थक करती है। अनन्य विशेषताओं से परिपूर्ण दीपक जहां ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक है, वहीं वह त्याग, बलिदान, साधना और उपासना का भी प्रतीक है। यही नहीं, वह तप और त्याग की महत्ता का परिचायक भी है। यह हमारी संस्कृति का मंगल प्रतीक है जो अमावस्या के घनघोर अंधकार में असत्य से सत्य और अंधेरे से प्रकाश की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। अंधकार को परास्त करते हुए वह संदेश देता है कि अंतःकरण को शुद्ध एवं पवित्र रखते हुए और अपनी चेतना, अपनी आत्मा में प्रकाश का संचार करते हुए ज्ञान का, धर्म का और कर्म का दीप जलाओ। तब गहन तमस में जो प्रकाश होगा, उससे अंतःकरण में जो आशा, धैर्य और प्रभु भक्ति के संचार के साथ-साथ हर्ष और उल्लास से हृदय पुलकित हो उठेगा, सत्य और न्याय की चहुं दिशाओं में विजय पताका फहरायेगी और धन-धान्य, यश- वैभव की अपार संपदायें तुम्हारे लिए अपने द्वार खोल देंगी। यथार्थ में सूर्य के उत्तराधिकारी दीपक का इस पर्व पर यही प्रमुख संदेश है। यही कारण है कि हम दीवाली के पर्व पर ‘दीपोज्योति नमोस्तुते’ कहकर दीपक को सादर नमन करते हंै। सच तो यह है कि प्रकाश की यह पूजा ही दीवाली का आधार है। लक्ष्मी-गणेश का आह्वान हमारी संस्कृति में इस पर्व पर समुद्रमंथन से निकले 14 रत्नों में सर्वश्रेष्ठ वैभव यानी संपदा की देवी लक्ष्मी की सुख-समृद्धि की कामना से और बुद्धि-विवेक के स्वामी गणेश की न्याय-नीति के आधार पर बुद्धि के उपयोग हेतु आराधना को प्रमुखता दी गई है। वैसे दीवाली की ऐतिहासिक-पौराणिक प्राचीन पृष्ठभूमि अनंत प्रेरणाओं से परिपूर्ण है जो लक्ष्मी के उचित उपार्जन एवं उपयोग का संदेश देती है। इस पर्व की एक महान धार्मिक एवं राष्ट्रीय पर्व के रूप में महत्ता सर्वविदित है। इस अवसर पर लक्ष्मी-गणेश पूजन के साथ लक्ष्मी स्रोत, गौ एवं गौद्रव्य पूजन एवं दीपदान आदि मांगलिक कार्य उन प्रेरणाओं के परिचायक हैं जो सामाजिक व्यवस्था में आर्थिक संयम और पवित्र जीवन के लिए परमावश्यक हैं। यही कारण है कि इस दिन राजमहल हो या गरीब की झोपड़ी, को दीयों से सजाने की परंपरा है। वैसे इस पर्व से अनेकानेक घटनाएं एवं प्रसंग जुड़े हैं, जिनके उपलक्ष्य में सर्वत्र दीपमाला जलाए जाने के उल्लेख मिलते हैं। यह उल्लेख इस कथन के प्रमाण हैं कि इस पर्व को समूचे वर्ष के धार्मिक उत्सव के रूप में ही प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं है बल्कि इसे लोकोत्सव, धान्योत्सव और जनता के महापर्व का भी गौरव प्राप्त है। यही नहीं, यह पर्व समृद्धि पर्व के रूप में भी प्रतिष्ठित है। परंपराओं के नाम पर... इसमें किंचित मात्र भी संदेह नहीं है कि दीपावली ही नहीं वरन अन्य भारतीय पर्व भी सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण सहायक की भूमिका का निर्वहन करते हैं। लेकिन सच यह भी है कि आज दीपावली का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। आज न पुरानी मान्यताएं रहीं हैं, न परंपराएं ही शेष हैं। हां उनके नाम पर अपने- अपने वैभव प्रदर्शित किये जाने की प्रक्रिया अवश्य जारी है। सच तो यह है कि देश के मुट्ठीभर लोगों के लिए तो जिंदगी का हरेक दिन दीवाली सरीखा होता है। जबकि देश की बहुसंख्यक आबादी के जीवन का अंधकार तो वर्तमान में आज भी दीवाली के दिन मिट्टी के दीयों के स्थान पर जगमगाते सैकड़ों-हजारों बल्बों की चुंधियाती रोशनी भी दूर नहीं कर पाती है। दावे कुछ भी किये जायें, असलियत तो यही है कि आज दीवाली अभिजात्यों, नवकुबेरों, अधिकारी, नौकरशाह, नेता, दलाल, व्यापारी, रिश्वतखोर व ठेकेदारों की है, वह आम गरीब, किसान-मजदूर की नहीं रह गयी है, जिनके लिए दो जून रोटी का जुगाड़ कर पाना आसमान से तारे तोड़ने के समान है। उनके लिए चंद लम्हों में करोड़ों की आतिशबाजी फूंक देना सामर्थ्य के बाहर की बात है। ऐसा कर पाना तो उनके लिए एक सपना सरीखा है जबकि मुट्ठीभर सरमाएदार लोगों के लिए यह एक शौक के अलावा कुछ भी नहीं है। हां सामान्य जन कहें या देश का गरीब तबका दीपावली के दिन दीये जलाकर इस पर्व की औपचारिकता पूरी कर अपनी संतुष्टि जरूर कर लेता है। सौभाग्य और दुर्भाग्य का चक्र असलियत में ऐसे माहौल में दीवाली के दिन दीपक जलाने से न तो हमारे आंतरिक जीवन में प्रकाश आयेगा और न ही बाह्य जीवन के अंधकार ही दूर हो पायेंगे। जुआ जो एक समय जीवन में सौभाग्य और दुर्भाग्य के चक्र को बेरोकटोक जारी रहने का अनुभव हासिल करने का प्रतीकात्मक सबक था, वह अब व्यसन बन चुका है। देखा जाये तो अपव्यय जैसी बुराइयों के यथावत रहने से वर्तमान में दीवाली का मूल प्रयोजन ही नष्टप्राय हो गया है। ऐसी स्थिति में समाज को प्रकाशित करने व उसके विकास की आशा बेमानी ही होगी। आज जब एकल परिवार का युग है, यह बात दीगर है कि कुछ लोग आज भी संयुक्त परिवार प्रथा के हामी हैं, सामाजिक विद्वेष चरम पर है, सांप्रदायिक सद्भाव नाममात्र की वस्तु रह गयी है, जातिगत विषमता ने समाज में विष घोल दिया है और आतंकवाद की काली छाया के चलते सर्वत्र भय व्याप्त है। हम दिखावा कुछ भी करें, इसमें दो राय नहीं और वर्तमान में यह कटु सत्य भी है कि दीवाली जैसे त्योहार की अब पहले जैसी बात नहीं रही। न पहले जैसी उत्सव प्रियता और हंसी के दर्शन होते हैं, न प्रेम और सद्भाव के ही। सर्वत्र दिखावा, प्रतिस्पर्धा, बनावट और स्वार्थ का बोलवाला है। लोग स्वार्थ, बेईमानी और धोखाधड़ी में अंधे हुए जा रहे हैं। हर तरफ धोखा ही धोखा है। नैतिकता, चरित्र और मूल्यों की बात बेमानी हो चुकी है। अब तो बाज़ारीकरण के दौर में त्योहारों की, संस्कृति की, मन-मस्तिष्क में मात्र स्मृतियां ही शेष रह गई हैं। बाकी तो सब औपचारिकता ही है और कुछ नहीं। आज तो यही दीवाली है। हमारे लिए तो यही उचित है कि हम मानवता के कल्याण के लिए प्रतिपल अपनी श्रद्धा के दीप जलाएं और यथासंभव दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा दें। प्रकाश पर्व का वर्तमान में यही पाथेय है।

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