पूर्व राज्यपाल वोहरा द्वारा स्थापित मानदंड सार्वकालिक

अरुण जोशी जम्मू-कश्मीर अब भले ही राज्य न रहा हो मगर 10 साल से भी ज्यादा समय तक यहां की सेवा करने वाले पूर्व राज्यपाल एनएन वोहरा द्वारा स्थापित की गयी परिपाटियां राजनीतिक तौर पर नाजुक इस राज्य के लिये मार्गदर्शक सिद्धांत बन गयी हैं। ये परिपाटियां तब ज्यादा प्रासंगिक हो जाती हैं जब मतदाता ने बुरी तरह से खंडित जनादेश दिया हो। हरियाणा और महाराष्ट्र में मिले खंडित जनादेश से यह और भी अहम हो जाता है। पश्चिमी राज्य अभी भी एक साथ आने को लेकर ऊहापोह में है क्योंकि वहां पर वोटर ने किसी को न तो स्पष्ट जनादेश दिया उलटे विरोधी विचारधाराएं भी सुर्खियों में आ गयी हैं। ठीक इसी तरह के हालात जम्मू-कश्मीर में 2014 के विधानसभा चुनाव में हो गये थे। दलों के लिये कॉमन ग्राउंड पर आने के लिये जनादेश एक बड़ी चुनौती था। सबसे अहम ये है कि जिस तरीके से राज्यपाल वोहरा हालात से निपटे और पार्टियों को अपने मसले सुलझाने के लिये वक्त दिया। उन्होंने तब तक राज्यपाल शासन थोंपने की सिफारिश नहीं की जब तक वे ऐसा करने को विवश नहीं हो गये। 23 दिसंबर 2014 को चुनाव परिणाम आ गये। मतदाताओं ने खंडित जनादेश दिया। जनादेश दो विचारधाराओं की लड़ाई से आया था -स्वशासन बनाम भारत के साथ पूरी तरह से एकीकरण। पीडीपी (पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी) 28 सीट लेकर सबसे बड़ा दल बनकर उभरी। भाजपा 25 सीट के साथ दूसरी सबसे बड़ी, नेकां को 15 और कांग्रेस को 12 सीट मिली। इसके अलावा सात अन्य विधायक भी थे। केयरटेकर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्यपाल के लिये एक अजीब सी स्थिति खड़ी कर दी। लंदन से दिल्ली पहुंचने के दो घंटे बाद ही उन्होंने राज्यपाल वोहरा को फोन लगाया, जो उस वक्त दिल्ली में ही थे और उन्होंने यह कहते हुए अपना इस्तीफा सौंप दिया कि वे अब इस पद पर और ज्यादा देर तक नहीं बने रह सकते। वोहरा ने उन्हें मनाने की कोशिश भी की मगर वे अड़ गये। राज्यपाल को उम्मीद थी कि वे नयी सरकार बनने तक अपने पद पर बने रहेंगे या फिर कम से कम 25 फरवरी 2015 तक यानी विधानसभा के कार्यकाल के आखिरी दिन तक। मगर उमर ने कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा जिस कारण उन्हें राज्यपाल शासन लगाने की सिफारिश करनी पड़ी। 2008 के विधानसभा चुनाव भी वोहरा की ही देखरेख में हुए थे। हाल ही के इतिहास के कुछ एेसे वाकये भी हैं, जो दिखाते हैं कि वोहरा इन नाजुक हालात से किस निपुणता से निपटे। उन्होंने संविधान मानदंडों का पालन करते हुए कुछ परिपाटियां स्थापित की, ताकि ऐसे हालात में सकारात्मक नतीजे के लिये इनका अनुसरण कहीं दूसरी जगह भी किया जा सके। वोहरा इस बारे में सचेत थे कि पाकिस्तान मौके की तलाश में था कि कश्मीर में किस तरह से हालात खराब किये जायें और राज्य में सरकार बनाने को लेकर एक अधीरता थी। चुनाव नतीजे आने के 15 दिन तक भी किसी पार्टी ने सरकार बनाने के दावा पेश नहीं किया। वोहरा ने सरकार बनाने के लिये सभी दलों को बारी-बारी से न्योता दिया। पीडीपी व भाजपा ने वक्त मांगा और जो उन्हें दे दिया गया। मगर उमर के इस्तीफे ने उनके हाथ बांध दिये और उन्हें राष्ट्रपति को लिखना पड़ा जिसके बाद 9 जनवरी 2015 को राज्यपाल शासन लागू हो गया। जम्मू-कश्मीर के इतिहास में दर्ज इस प्रकरण का दूसरा संस्करण भी है। पीडीपी-भाजपा गठबंधन के पहले मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की जनवरी 2016 में मृत्यु के बाद, महबूबा मुफ्ती को विधायकों ने उनका उत्तराधिकारी चुन लिया। वोहरा उन्हें उनके पिता के अंतिम संस्कार के बाद ही 7 जनवरी 2016 को पद व गोपनीयता की शपथ दिलाने के इच्छुक थे ताकि राज्यपाल शासन न लगाना पड़े मगर महबूबा ने मना कर दिया। महबूबा लगातार अगले तीन माह तक इससे इनकार करती रही जिससे वोहरा के सामने राज्यपाल शासन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। अंतत: महबूबा ने 4 अप्रैल 2016 को मुख्यमंत्री का पदभार संभाला। इस बीच की अवधि में कई धड़ों ने एक साथ आकर सरकार बनाने के सुझाव दिये मगर वोहरा ने बड़ी अडिगता के साथ इन्हें खारिज कर दिया। उन्होंने यह लाइन तब भी पकड़े रखी जब 18 जून 2018 को महबूबा ने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने विधानसभा निलंबित करने से पहले सभी दलों से मुलाकात की और 20 जून 2018 को राज्यपाल शासन लागू हो गया। जम्मू-कश्मीर का संदर्भ क्यों अहम है? भारत के नक्शे में दिखाये जाने वाले इस संवेदनशील क्षेत्र में बीते वक्त में कई गलत कदम उठाये गये जिसके विनाशकारी नतीजे आये। 1984 में फारूक अब्दुल्ला की सरकार को बर्खास्त करना और फिर 1987 के चुनाव में धांधली एवं आतंकवाद का उभरना। लोकतंत्र को बट्टे खाते डाल दिया गया क्योंकि जम्मू-कश्मीर में 1991 में लोकसभा चुनाव नहीं कराये गये और विधानसभा चुनाव भी 1996 में ही हो पाये। वोहरा को अपने कार्यकाल के दौरान कई बार ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ा लेकिन वे लोकतंत्र के लिये खड़े रहे और राज्य में 25 जून 2008 से लेकर 22 अगस्त 2018 तक कभी भी राष्ट्रपति शासन नहीं लगने दिया। उसके बाद क्या हुआ अब इतिहास बन चुका है।

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