पहुंच में हो इलाज

निजी क्षेत्र सहयोग कर जिम्मेदारी निभाये

हैदराबाद के एक निजी अस्पताल की वह घटना विचलित करती है, जिसमें मरणासन्न युवक ने अपने पिता को भेजे वीडियो मैसेज में बताया ‘अस्पताल में मेरे बार-बार कहने के बावजूद वेंटिलेटर हटा दिया गया है, मुझे तीन घंटे से आक्सीजन नहीं मिली है। मैं जा रहा हूं।’ परिजनों ने अस्पताल पर युवक की जान लेने का आरोप लगाया है। हाल ही में मध्य प्रदेश में एक बुजुर्ग को बेड से बांधने का चित्र वायरल हुआ था, आरोप है कि पैसे न मिलने की वजह से उसे बांधा गया था। चित्र वायरल होने पर मुख्यमंत्री ने कार्रवाई की बात कही थी। पिछले दिनों दिल्ली के नामी सरकारी अस्पताल में कोरोना पीड़ितों की बदहाली पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी। निस्संदेह कोरोना काल ने हमारे चरमराते स्वास्थ्य तंत्र की हकीकत उजागर कर दी है। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि देश के सरकारी अस्पताल पहले से ही बीमार हैं। वे सामान्य इलाज भी देने में मरीजों के बोझ से दबे हुए थे, ऐसे में एक अज्ञात महामारी, जिसका उपचार भी उपलब्ध नहीं है, के बेहतर उपचार की उम्मीद करना बेमानी है। वहीं दूसरी ओर, साधन-संपन्न निजी अस्पतालों से क्या उम्मीद रखी जाये, जो इस संकट को कमाई के अवसर के रूप में देख रहे हैं। जब देश में करोड़ों लोगों की नौकरियां जाती रहीं, उद्योग-धंधे ठप पड़े हैं, ऐसे में एक आम आदमी के लिए निजी अस्पताल में इलाज पहुंच से बाहर ही है। कहने को हरियाणा समेत कई राज्यों ने कोविड-19 के उपचार के लिए इलाज की विभिन्न श्रेणियों में दरें तय की हैं, लेकिन कितने अस्पताल होंगे जो ईमानदारी से इन निर्देशों का पालन करेंगे। निजी अस्पताल आम मरीजों के लिए बेड खाली नहीं है, कहकर पहले ही पल्ला झाड़ लेते हैं। यहां तक कि कोरोना नेगेटिव आये मरीजों को पॉजिटिव बताकर उलटे उस्तरे से मूंडने की खबरें भी आई हैं। कहने को तो सरकारी अस्पतालों में कोविड -19 रोगियों का इलाज मुफ्त है, लेकिन सवाल है कि क्या वहां गुणवत्ता के उपचार और वेंटिलेटर आदि की पर्याप्त व्यवस्था है? इलाज से संतुष्ट न होने पर ही मरीज निजी अस्पताल की तरफ मुड़ता है। निजी अस्पताल हैं कि आम मरीजों से कन्नी काट रहे हैं। दरअसल, देश में ऐसा नियामक तंत्र सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बावजूद नहीं बन पाया है जो संकट की इस घड़ी में निजी अस्पतालों की जवाबदेही तय कर सके। ऐसे सख्त प्रावधानों का अभाव है जो निजी अस्पतालों की मनमानी पर अंकुश लगा सकें। मरीज एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के धक्के खाते हुए दम तोड़ रहे हैं। गरीब मरीजों का तो भगवान ही रखवाला है। यह महामारी करोड़ों लोगों को गरीबी के दलदल में धकेल देगी। लोग अपनों को बचाने के लिए चल-अचल संपत्ति दांव पर लगाकर निजी अस्पतालों की मुराद पूरी कर रहे हैं। निस्संदेह हरियाणा सरकार ने नीति आयोग की सिफारिशों के अनुरूप निजी अस्पतालों में कोविड-19 के मरीजों के उपचार हेतु विभिन्न श्रेणियों में फीस की दरें निर्धारित करके सार्थक कार्य किया है, जिसमें आईसीयू, (सामान्य, एसी, नॉन-एसी) और ऑक्सीजन या वेंटिलेटर के साथ प्रतिदिन के हिसाब से दरें तय की हैं। जरूरत इस बात की है कि निर्धारित दरों का अनुपालन सख्ती से किया जाये तथा उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई की जाये। अब समय आ गया है कि पंजाब में भी सरकार निजी अस्पतालों में कोविड-19 के मरीजों के उपचार की दरों को न्यायसंगत बनाने की दिशा में तेजी से बढ़े। वैसे तो यह कोशिश पूरे देश में होनी चाहिए। हर नागरिक का अधिकार है कि  उसे सस्ता व उचित इलाज मिल सके। हाल ही में कई राज्यों में निजी लैबों में कोरोना टेस्टिंग की दरों को आधा करने का सार्थक प्रयास हुआ है। उपचार के खर्च में भी न्यायसंगत एकरूपता लाने का प्रयास किया जाना चाहिए। निजी अस्पतालों को इस मुश्किल वक्त में मानवीय दृष्टिकोण के साथ जिम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए।

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