पंजाबी फिल्में भी करूंगी चार्मी कौर

लगभग 45 से अधिक दक्षिण भारतीय फिल्मों में अपना जादू चलाने और कई फिल्मों के लिए बेस्ट अभिनेत्री का पुरस्कार पाने के बाद चार्मी कौर ने हिंदी सिनेमा की ओर कदम बढ़ाया है और बुड्ढा होगा तेरा बाप से हिंदी सिनेमा में एंट्री मारी। इन दिनों वे फिर चर्चा में हैं अपनी दूसरी हिंदी फिल्म जिला गाजियाबाद को लेकर। इस फिल्म और उनके अब तक के सफर को लेकर आशुतोष से हुई उनकी लंबी बातचीत के मुख्य अंश -

सबसे पहले तो चार्मी अपने बारे में बाताएं? मैं मूल रूप से हरियाणा में करनाल की रहने वाली हूं। मेरा जन्म और शिक्षा मुंबई में ही हुई। मैं सिख परिवार से हूं। फिल्म उद्योग से रिश्ता कब और कैसे जुड़ गया? बस, किस्मत में जो लिखा होता है वह तो होता ही है। मुझे बहुत जल्दी ही फिल्मों में काम मिलना शुरू हो गया था जो मैं स्वीकारती चली गई। जब मैं 13 साल की थी तब मुझे एक तेलुगू फिल्म का ऑफर आया जिसे मैंने स्वीकार कर लिया। फिल्म का नाम था नी तोडू कावली। इसका मतलब होता है, आई नीड यूअर कंपनी, इसमें मैंने एक हाउसवाइफ का रोल किया था। फिल्म कुछ खास नहीं चली लेकिन उसके बाद मुझे और भी कई फिल्मों के ऑफर आने लगे। लेकिन मुझे पहचान मिली 2004 से जब मैंने एक मलयालम फिल्म की। उसके बाद तो कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आप पंजाबी हैं लेकिन कैरियर बनाने के लिए हैदराबाद चली गई? जहां काम मिलेगा वहीं तो इनसान जाएगा। मुझे जहां से अच्छे ऑफर मिले मैं वहां गई। लेकिन पंजाबी फिल्मों के प्रस्ताव आएंगे तो जरूर करूंगी। मेरी इच्छा भी है कि मैं पंजाबी फिल्में करूं। दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में क्या भाषा की कठिनाई से नहीं गुजरना पड़ा? मैंने 13 साल की उम्र में ही अपने फिल्मी करिअर की शुरुआत कर दी थी। तब से मैं हैदराबाद में रह रही हूं। मुंबई में भी मेरा घर है। मेरे माता-पिता वहीं रहते हैं। लेकिन मेरा अधिकतर समय साउथ में ही बीता। चूंकि उस मैं समय छोटी थी इसलिए आसानी से साउथ की भाषाओं को सीख भी गई। मैं अपनी फिल्मों की डबिंग खुद करती हूं। इसका मतलब आपको कई भाषाएं आती हैं? बिल्कुल। मैं मराठी, अंगे्रजी, हिंदी, पंजाबी, तेलुगू और मलयालम भाषाएं जानती हूं। आपने पहली फिल्म ही अमिताभ बच्चन के साथ की। कैसा लगा? मेरे लिए इससे बड़ी खुशी की बात कोई और हो ही नहीं सकती कि मैंने हिंदी सिनेमा में अपनी शुरुआत अमिताभ बच्चन जी के साथ की। बहुत ही अच्छा अनुभव रहा उनके साथ फिल्म करने का। इस दौरान उनसे मिलने और बातें करने का भी खूब मौका मिला। हम इस बात को लेकर बहुत गर्व फील करते थे कि हम अमिताभ बच्चन के बगल में बैठकर उनसे बात कर रहे हैं लेकिन वे बहुत ही सामान्य इनसान की तरह नज़र आते थे। वे बहुत ही ग्रेट इनसान हैं। बहुत आराम से हमारे साथ बातें करते थे। रिहर्सल करते थे। वे हर कलाकार को रिसपेक्ट देते हैं। आपकी दूसरी हिंदी फिल्म जिला गाजियाबाद में आपकी भूमिका क्या है? इस फिल्म में मैं विवेक ओबरॉय के अपोजिट हूं। फिल्म में मेरा काम रोमांस करना है। फैमिली सेंटीमेंट्स को पेश करना है। यह एक एक्शन मूवी है। जिसकी कहानी बहुत ही अच्छी है। संवाद बहुत ही अच्छे लिखे हुए हैं। और क्या प्रोजेक्ट हैं आपके पास? अभी दो तेलुगू फिल्में हैं जो जल्दी ही रिलीज होंगी। इसके अलावा एक-दो हिंदी फिल्मों का मामला पाइपलाइन में है। साउथ की फिल्मों में काम करने के बाद हिंदी फिल्मों में काम करके मुख्य अंतर क्या महसूस कर रही हैं? अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। चूंकि वहां मैं बहुत काम कर चुकी हूं और यहां अभी केवल दो ही फिल्में की हैं। इसलिए मेरे लिए हिंदी फिल्म उद्योग अभी नया-नया ही है। अभी तो बस सब कुछ यहां नया लग रहा है इसलिए बस काम को इंजॉय कर रही हूं। साउथ की अभिनेत्रियां थोड़ी मोटी होती हैं और हिंदी फिल्में में जीरो फिगर टाइप लड़कियां पसंद की जाती हैं। ऐसे में क्या अपना वजन कम करना पड़ा? दरअसल अब ट्रेंड थोड़ा यहां का भी बदल सा गया है। अब जीरो फिगर वाली सोच कम होती जा रही है। अब लोग सोनाक्षी सिन्हा और विद्या बालन जैसी अभिनेत्रियों को पसंद कर रहे हैं जिसमें एक भारतीय स्त्री नज़र आए। वैसे भी मैं न तो बहुत मोटी हूं और न ही पतली। इसलिए मेरे लिए टेंशन वाली अब कोई बात नहीं रही। आगे किस तरह की फिल्में साइन करने का इरादा है? वैसे तो जो अच्छा काम लगता है, मैं उसे करना पसंद करती हूं। वैसे मुझे मसाला टाइप फिल्में बहुत पसंद हैं। जिनमें हीरो खूब फाइट करे। कॉमेडी भी हो। और रोमांस भी हो।

आशुतोष

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